पंचतंत्र की कहानी: भेड़िया और मेमना
बहुत समय पहले, एक घने जंगल में एक भेड़िया रहता था। जंगल पहाड़ियों और घाटियों से घिरा हुआ था और उसमें से एक छोटी नदी बहती थी।
एक दिन भेड़िया नदी के उद्गम स्थल पर पानी पी रहा था। तभी उसने कुछ दूरी पर एक छोटे से मेमने को उसी नदी से पानी पीते देखा। मेमना सीधा-सादा और भोला था, लेकिन भेड़िया बहुत चालाक और क्रूर था। वह मेमने को खाकर अपना पेट भरना चाहता था। अब वह उसे मारने के लिए कोई बहाना ढूंढने लगा।
भेड़िया गुस्से में चिल्लाया, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरा पानी गंदा करने की?”
बेचारा मेमना डरते हुए बोला, “महोदय, आप गलत समझ रहे हैं। पानी तो आपकी ओर से मेरी ओर बह रहा है। मैं आपका पानी कैसे गंदा कर सकता हूं?”
मेमने की बात सुनकर भेड़िया कुछ पल के लिए चुप हो गया, लेकिन वह किसी भी तरह उसे खाना चाहता था। इसलिए उसने दूसरा आरोप लगाया।
भेड़िया बोला, “क्या तुम्हें याद है, एक साल पहले तुमने मेरा अपमान किया था और मुझे बुरा-भला कहा था?”
मेमना कांपती आवाज में बोला, “महाराज, मैं तो एक साल पहले पैदा भी नहीं हुआ था।”
यह सुनकर भेड़िया और अधिक क्रोधित होने का नाटक करते हुए बोला, “अगर तुम नहीं थे, तो जरूर तुम्हारे पिता ने मेरा अपमान किया होगा।”
मेमना विनम्रता से बोला, “यदि मेरे पिता से कोई गलती हुई हो तो मैं उनकी ओर से आपसे क्षमा मांगता हूं।”
लेकिन भेड़िया तो पहले ही तय कर चुका था कि उसे मेमने को खाना ही है। उसने गुर्राते हुए कहा, “तुम लोग पहले गलती करते हो और फिर बहाने बनाते हो। अब मैं तुम्हें सबक सिखाऊंगा।”
इतना कहते ही भेड़िया मासूम मेमने पर टूट पड़ा और उसे मारकर खा गया।
नैतिक शिक्षा : अत्याचारी व्यक्ति अपने अन्याय और अत्याचार के लिए हमेशा कोई न कोई बहाना ढूंढ ही लेता है।
2. चतुर खरगोश और शेर
किसी घने वन में एक बहुत बड़ा शेर रहता था। वह रोज शिकार पर निकलता और एक ही नहीं, दो नहीं बल्कि कई-कई जानवरों का शिकार कर डालता। जंगल के सभी जानवर उसके आतंक से भयभीत रहने लगे। उन्हें डर था कि यदि शेर इसी प्रकार रोज शिकार करता रहा, तो जल्द ही जंगल में कोई भी जानवर जीवित नहीं बचेगा। पूरे जंगल में भय और चिंता का माहौल फैल गया।
शेर को रोकने के लिए सभी जानवरों ने एक सभा बुलाई। बहुत सोच-विचार के बाद उन्होंने निश्चय किया कि वे स्वयं शेर के पास जाकर उससे विनती करेंगे। अगले दिन जानवरों का एक दल शेर के पास पहुँचा। जानवरों को अपनी ओर आते देख शेर गरजकर बोला, “क्या बात है? तुम सब यहाँ क्यों आए हो?”
जानवरों के मुखिया ने हाथ जोड़कर कहा, “महाराज, आप हमारे राजा हैं और हम आपकी प्रजा। जब आप शिकार करने निकलते हैं, तो बहुत सारे जानवरों को मार डालते हैं। आप उन्हें पूरा खा भी नहीं पाते। इस तरह जंगल में जानवरों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। यदि ऐसा ही चलता रहा, तो कुछ ही दिनों में जंगल में आपके अलावा कोई नहीं बचेगा। प्रजा के बिना राजा भी कैसा? इसलिए हमारी विनती है कि आप शिकार पर निकलना छोड़ दें। हम प्रतिदिन स्वयं आपके भोजन के लिए एक जानवर भेज दिया करेंगे।”
शेर को उनकी बात उचित लगी। उसने कहा, “ठीक है, मैं तुम्हारी बात मान लेता हूँ। लेकिन याद रखना, जिस दिन मेरा भोजन समय पर नहीं पहुँचा, उस दिन मैं जितने चाहूँगा उतने जानवर मार डालूँगा।”
उस दिन के बाद से रोज बारी-बारी से एक जानवर शेर के भोजन के लिए भेजा जाने लगा। कुछ दिनों बाद खरगोशों की बारी आई। शेर के भोजन के लिए एक छोटा-सा खरगोश चुना गया। वह छोटा जरूर था, लेकिन बहुत चतुर और बुद्धिमान था। उसने सोचा कि बिना प्रयास किए मरना मूर्खता होगी। उसे कोई ऐसी युक्ति सोचनी चाहिए जिससे न केवल उसकी जान बच जाए, बल्कि पूरे जंगल को भी शेर के आतंक से मुक्ति मिल जाए।
बहुत सोचने के बाद खरगोश को एक उपाय सूझ गया। वह जानबूझकर धीरे-धीरे चलता हुआ शेर के पास पहुँचा। रास्ते में उसने इतना समय लगाया कि शेर के पास पहुँचते-पहुँचते काफी देर हो गई। भूख से तड़प रहे शेर का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने खरगोश को देखते ही दहाड़ते हुए कहा, “इतनी देर क्यों हुई? और ऊपर से तुम इतने छोटे हो! मेरा पेट तुमसे कैसे भरेगा? जिन मूर्खों ने तुम्हें भेजा है, मैं उन सबको मार डालूँगा!”
नन्हे खरगोश ने विनम्रता से सिर झुकाकर कहा, “महाराज, इसमें मेरा या किसी और जानवर का कोई दोष नहीं है। जंगल वालों ने तो आपके लिए छह खरगोश भेजे थे, लेकिन रास्ते में हमें एक दूसरा शेर मिल गया। उसने पाँच खरगोशों को खा लिया और मुझे आपके पास भेज दिया।”
यह सुनते ही शेर क्रोध से काँप उठा। उसने गरजकर कहा, “क्या कहा? दूसरा शेर! इस जंगल में दूसरा शेर होने की हिम्मत कैसे हुई? कहाँ है वह?”
खरगोश बोला, “महाराज, वह बहुत बड़ा और घमंडी शेर है। वह ज़मीन के नीचे बने एक किले जैसी गुफा में रहता है। उसने कहा कि वही इस जंगल का असली राजा है और आपको चोर कहकर चुनौती दी है।”
शेर गुस्से से आग-बबूला हो गया। उसने दहाड़ते हुए कहा, “मुझे तुरंत उसके पास ले चलो। आज मैं उसे मारकर ही दम लूँगा।”
खरगोश शेर को धीरे-धीरे जंगल के बीच एक पुराने कुएँ के पास ले गया। वहाँ पहुँचकर उसने कहा, “महाराज, वह दुष्ट शेर इसी किले के अंदर छिपा हुआ है। सावधान रहिएगा।”
शेर ने कुएँ में झाँककर देखा। पानी में उसे अपनी ही परछाईं दिखाई दी। उसने गुस्से में जोर से दहाड़ मारी। कुएँ के अंदर से उसकी आवाज़ गूँजकर वापस आई। शेर को लगा कि दूसरा शेर भी उसे चुनौती दे रहा है। क्रोध में अंधा होकर वह तुरंत कुएँ में कूद पड़ा। कुएँ की दीवारों से टकराकर वह पानी में गिरा और डूबकर मर गया।
इस प्रकार बुद्धिमान खरगोश ने अपनी चतुराई से क्रूर शेर का अंत कर दिया और पूरे जंगल को उसके आतंक से मुक्त करा दिया। शेर के मरने की खबर सुनते ही जंगल के सभी जानवर खुशी से झूम उठे और खरगोश की बुद्धिमानी की प्रशंसा करने लगे।
नैतिक शिक्षा : बुद्धि और चतुराई के सामने सबसे बड़ी शक्ति भी हार जाती है।
3. लोहे के तराजू और व्यापारी के बेटे की कहानी
एक कस्बे में ज्वेरनाधना नाम का एक व्यापारी का बेटा रहता था। समय के साथ उसकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई और वह अत्यंत गरीब हो गया। गरीबी और अपमान से दुखी होकर उसने सोचा कि अब इस नगर को छोड़कर कहीं और जाकर धन कमाना चाहिए, क्योंकि संसार में लोग उसी व्यक्ति का सम्मान करते हैं जिसके पास धन होता है।
उसके पास अपने पूर्वजों से मिला एक बहुत भारी लोहे का तराजू था। वह तराजू उसके परिवार की आखिरी मूल्यवान वस्तु थी। ज्वेरनाधना ने उस तराजू को एक दूसरे व्यापारी के पास सुरक्षित रखने के लिए जमा करा दिया और फिर दूसरे प्रदेशों की यात्रा पर निकल गया।
कई वर्षों तक परदेश में व्यापार करने और धन कमाने के बाद वह वापस अपने नगर लौटा। लौटते ही वह उस व्यापारी के पास गया और बोला, “भाई, कृपया मेरा वह लोहे का तराजू मुझे वापस कर दीजिए, जो मैंने आपके पास सुरक्षित रखा था।”
व्यापारी लालची था। उसने तराजू बेच दिया था और अब उसे लौटाना नहीं चाहता था। इसलिए उसने झूठ बोलते हुए कहा, “भाई, मैं क्या करूँ? तुम्हारा तराजू तो चूहों ने कुतर-कुतर कर खा लिया।”
ज्वेरनाधना समझ गया कि व्यापारी झूठ बोल रहा है, लेकिन उसने तुरंत क्रोध नहीं किया। वह शांत स्वर में बोला, “यदि ऐसा है तो इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं। संसार में सब कुछ नश्वर है। अच्छा, अब मैं नदी में स्नान करने जा रहा हूँ। कृपया अपने पुत्र धनदेव को मेरे साथ भेज दीजिए ताकि वह मेरा सामान संभाल सके।”
व्यापारी को डर था कि कहीं उसका सामान चोरी न हो जाए, इसलिए उसने अपने बेटे से कहा, “बेटा, तुम इनके साथ जाओ और इनका सामान संभालना।”
धनदेव खुशी-खुशी ज्वेरनाधना के साथ नदी पर गया। जब ज्वेरनाधना स्नान कर चुका, तब उसने व्यापारी के बेटे को पकड़कर नदी किनारे की एक गुफा में छिपा दिया और गुफा के द्वार पर एक बड़ा पत्थर लगा दिया। फिर वह अकेला व्यापारी के घर लौट आया।
अपने बेटे को साथ न देखकर व्यापारी घबराकर बोला, “मेरा बेटा कहाँ है?”
ज्वेरनाधना ने शांत स्वर में कहा, “क्या बताऊँ भाई, जब तुम्हारा बेटा नदी किनारे खड़ा था तभी एक बड़ा राजहंस आया और उसे उठाकर उड़ गया।”
व्यापारी क्रोध से चिल्लाया, “तुम झूठ बोल रहे हो! भला कोई राजहंस किसी बच्चे को उठाकर ले जा सकता है?”
ज्वेरनाधना बोला, “यदि चूहे लोहे का भारी तराजू खा सकते हैं, तो राजहंस बच्चे को भी उठाकर ले जा सकता है।”
दोनों में झगड़ा बढ़ गया और मामला राजदरबार तक पहुँच गया। व्यापारी ने राजा से शिकायत की, “महाराज, इस व्यक्ति ने मेरे बेटे का अपहरण कर लिया है।”
राजा और न्यायाधीशों ने ज्वेरनाधना से पूछा, “सच-सच बताओ, व्यापारी का बेटा कहाँ है?”
ज्वेरनाधना ने वही उत्तर दिया, “महाराज, उसे तो राजहंस उठाकर ले गया।”
न्यायाधीश बोले, “तुम झूठ बोलते हो। कोई राजहंस किसी बच्चे को लेकर नहीं उड़ सकता।”
तब ज्वेरनाधना मुस्कराकर बोला, “महाराज, यदि इस संसार में चूहे लोहे का भारी तराजू खा सकते हैं, तो राजहंस बच्चे को भी उठा सकता है।”
राजा को पूरी बात समझ में आ गई। उन्होंने व्यापारी से सच्चाई पूछी। डर के मारे व्यापारी ने स्वीकार कर लिया कि उसने लोहे का तराजू हड़प लिया था और झूठ बोला था।
राजा ने आदेश दिया कि व्यापारी तुरंत ज्वेरनाधना का तराजू वापस करे। बदले में ज्वेरनाधना ने भी व्यापारी के बेटे को सुरक्षित वापस लौटा दिया। इस प्रकार दोनों के बीच समझौता हो गया और न्याय की विजय हुई।
नैतिक शिक्षा : जैसे को तैसा व्यवहार करने से ही कभी-कभी चालाक और बेईमान लोगों को सबक सिखाया जा सकता है।

4. राजा और मूर्ख बन्दर
बहुत पुरानी बात है। एक राजा के राजमहल में एक बन्दर सेवक के रूप में रहता था। वह राजा का अत्यंत विश्वासपात्र था और हमेशा उसकी सेवा में लगा रहता था। राजा भी उस पर बहुत भरोसा करता था। यही कारण था कि बन्दर को महल के हर भाग में आने-जाने की अनुमति थी, यहाँ तक कि वह अन्तःपुर में भी बेरोक-टोक जा सकता था।
एक दिन दोपहर के समय राजा अपने कक्ष में विश्राम कर रहे थे। बन्दर उनके पास बैठा पंखा झल रहा था ताकि राजा को आराम से नींद आ सके। तभी एक मक्खी उड़ती हुई आई और बार-बार राजा की नाक पर बैठने लगी। बन्दर उसे पंखे से उड़ाता, लेकिन थोड़ी ही देर बाद वह फिर आकर राजा की नाक पर बैठ जाती।
मक्खी के इस बार-बार परेशान करने से राजा की नींद में बाधा पड़ रही थी। राजा आधी नींद में कभी हाथ से मक्खी उड़ाते तो कभी करवट बदल लेते। बन्दर यह सब देख रहा था। वह पूरी कोशिश कर रहा था कि मक्खी राजा को परेशान न करे, लेकिन मक्खी बार-बार लौट आती।
काफी देर तक यही चलता रहा। आखिरकार बन्दर को बहुत क्रोध आ गया। उसने सोचा कि इस मक्खी को हमेशा के लिए खत्म कर देना चाहिए। पास में ही राजा की तलवार रखी हुई थी। बन्दर ने तुरंत तलवार उठा ली और मक्खी पर नजर गड़ाकर बैठ गया।
कुछ ही क्षण बाद मक्खी फिर उड़कर राजा की नाक पर बैठ गई। बन्दर ने बिना सोचे-समझे पूरी ताकत से तलवार का वार मक्खी पर कर दिया। मक्खी तो उड़ गई, लेकिन तलवार का भयानक वार सीधे राजा की नाक पर पड़ा और उनकी नाक कट गई।
राजा दर्द से चीख उठे। इस प्रकार बन्दर की मूर्खता और बिना समझदारी के की गई हरकत ने अपने ही स्वामी को भारी नुकसान पहुँचा दिया।
नैतिक शिक्षा : मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु अधिक अच्छा होता है।
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पंचतंत्र भारत की प्राचीन और प्रसिद्ध नीति कथाओं का संग्रह है, जिन्हें आचार्य विष्णु शर्मा द्वारा रचित माना जाता है। इन कहानियों के माध्यम से बुद्धिमानी, मित्रता, नीति, व्यवहार और जीवन की महत्वपूर्ण सीख सरल और रोचक तरीके से दी जाती है। आज भी पंचतंत्र की कथाएँ बच्चों और बड़ों दोनों के बीच समान रूप से लोकप्रिय हैं क्योंकि हर कहानी अपने भीतर एक गहरी नैतिक शिक्षा छुपाए होती है।
लेखक / मूल रचनाकार: आचार्य विष्णु शर्मा
प्रस्तुति: Saying Central Team





