सिंहासन बत्तीसी

सिंहासन बत्तीसी: बीसवीं पुतली – ज्ञानवती

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सिंहासन बत्तीसी: बीसवीं पुतली – ज्ञानवती ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य के दरबार में लोग केवल न्याय पाने के लिए ही नहीं आते थे, बल्कि ऐसे कठिन प्रश्न भी लेकर आते थे जिनका उत्तर उन्हें कहीं और नहीं मिलता था। राजा विक्रम अपनी बुद्धिमत्ता और अनुभव से हर प्रश्न का ऐसा समाधान देते थे कि प्रश्न पूछने वाला पूर्णतः संतुष्ट होकर लौटता था।

एक दिन उनके दरबार में दो तपस्वी आए। दोनों के बीच एक गंभीर विवाद चल रहा था। पहला तपस्वी कहता था कि मनुष्य का मन ही उसके सभी कर्मों को नियंत्रित करता है और मनुष्य कभी भी अपने मन के विरुद्ध कार्य नहीं कर सकता। दूसरा तपस्वी उससे सहमत नहीं था। उसका कहना था कि मनुष्य का ज्ञान ही उसके कर्मों का वास्तविक नियंत्रक होता है और मन भी ज्ञान के अधीन होकर कार्य करता है।

राजा विक्रमादित्य ने दोनों की बातें ध्यानपूर्वक सुनीं, किन्तु तत्काल कोई निर्णय नहीं दे सके। उन्होंने दोनों तपस्वियों से कुछ समय बाद आने को कहा। उनके जाने के बाद भी राजा का मन उसी प्रश्न में उलझा रहा। कभी उन्हें लगता कि मनुष्य का चंचल मन ही उसे भोग-विलास और वासनाओं की ओर खींच ले जाता है, तो कभी यह विचार आता कि ज्ञान ही मनुष्य को सही और गलत का भेद सिखाता है तथा मन पर नियंत्रण रखने की शक्ति देता है।

राजा विक्रमादित्य ऐसे जटिल प्रश्नों का उत्तर प्रजा के जीवन से खोजने में विश्वास रखते थे। इसलिए वे साधारण नागरिक का वेश धारण कर नगर और आसपास के क्षेत्रों में निकल पड़े। कई दिनों तक घूमने के बाद भी उन्हें ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिला जिससे उनके प्रश्न का समाधान हो सके। एक दिन उन्होंने एक निर्धन युवक को पेड़ के नीचे बैठे देखा। उसके कपड़ों और चेहरे से उसकी विपन्नता स्पष्ट झलक रही थी। पास ही उसकी बैलगाड़ी खड़ी थी जिससे वह जीविका कमाता था।

राजा ने जब उसके निकट जाकर ध्यान से देखा तो उसे पहचान गए। वह उनके पुराने मित्र सेठ गोपाल दास का छोटा पुत्र था। सेठ गोपाल दास नगर के अत्यन्त धनी और प्रतिष्ठित व्यापारी थे। उनके पुत्र की ऐसी दयनीय अवस्था देखकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने युवक से उसकी दुर्दशा का कारण पूछा। युवक समझ गया कि सामने वाला व्यक्ति उसके परिवार के बारे में सब कुछ जानता है। उसने भारी मन से अपनी कहानी सुनानी शुरू की।

उसने बताया कि पिता की मृत्यु के बाद सम्पत्ति और व्यापार दोनों भाइयों में बराबर बाँट दिए गए थे। उसका बड़ा भाई बुद्धिमान और संयमी था। उसने धन को व्यापार में लगाया, अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखा और मेहनत करके व्यापार को कई गुना बढ़ा लिया। लेकिन उसने अपने हिस्से की अपार सम्पत्ति को देखकर अहंकार कर लिया। वह शराब, जुए और व्यभिचार जैसी बुरी आदतों में पड़ गया। उसके बड़े भाई ने उसे कई बार समझाने की कोशिश की, पर उसे भाई की बातें कटु लगती थीं। धीरे-धीरे उसकी सारी सम्पत्ति समाप्त हो गई और एक वर्ष के भीतर वह निर्धन हो गया।

नगर के लोग उसकी दुर्दशा पर हँसने लगे। भूख और अपमान से परेशान होकर वह नगर छोड़कर दूर चला आया और मजदूरी करके जीवन बिताने लगा। उसने कहा कि जब उसके पास धन था तब वह अपने मन पर नियंत्रण नहीं रख सका, लेकिन जब उसने कठिनाइयों और अपमान का सामना किया तब उसे सच्चा ज्ञान प्राप्त हुआ। अब वह समझ चुका है कि मनुष्य यदि विवेक से काम न ले तो उसका मन उसे विनाश की ओर ले जाता है।

सिंहासन बत्तीसी

राजा विक्रमादित्य को अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था। उन्होंने युवक को अपना वास्तविक परिचय दिया, उसे कुछ स्वर्ण मुद्राएँ प्रदान कीं और समझदारी से नया व्यापार शुरू करने की सलाह दी। फिर वे महल लौट आए। कुछ समय बाद दोनों तपस्वी पुनः दरबार में उपस्थित हुए। तब राजा ने उन्हें समझाया कि मनुष्य का मन अत्यन्त चंचल होता है और वह बार-बार मनुष्य को भटकाने की कोशिश करता है, किन्तु ज्ञान और विवेक ही उसे सही मार्ग पर बनाए रखते हैं। यदि मनुष्य केवल मन के अधीन हो जाए तो उसका पतन निश्चित है। मन यदि रथ है तो ज्ञान उसका सारथि है। बिना सारथि के रथ दिशाहीन हो जाता है।

राजा ने सेठ के पुत्र का पूरा प्रसंग सुनाकर अपने निर्णय को स्पष्ट किया। दोनों तपस्वी उनकी बुद्धिमत्ता से अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने राजा को एक चमत्कारी खड़िया भेंट की। उस खड़िया से बनाई गई तस्वीरें रात के समय जीवित होकर बातें करने लगती थीं। राजा विक्रमादित्य ने उसकी परीक्षा के लिए कई चित्र बनाए और सचमुच उनमें प्राण आ गए।

वे चित्रों को देखकर और उनकी बातें सुनकर अपना मनोरंजन करने लगे। धीरे-धीरे वे उनमें इतने मग्न हो गए कि अपनी रानियों तक की सुध भूल बैठे। जब कई दिनों बाद रानियाँ उनके पास पहुँचीं और उन्हें चित्र बनाते देखा, तब राजा मुस्कराए और बोले कि वे स्वयं भी कुछ समय के लिए अपने मन के वश में हो गए थे, लेकिन अब उन्हें अपने कर्तव्य का स्मरण हो गया है।

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सिंहासन बत्तीसी भारतीय संस्कृति और लोककथाओं का अद्भुत संग्रह है, जिसमें राजा विक्रमादित्य की वीरता, न्यायप्रियता और बुद्धिमानी की 32 प्रेरणादायक कहानियाँ वर्णित हैं। हर कहानी एक नई सीख देती है और सत्य, धर्म, दया तथा न्याय के महत्व को दर्शाती है। ये कथाएँ मनोरंजन के साथ जीवन को सही दिशा देने की प्रेरणा भी प्रदान करती हैं।

 लेखक / मूल रचनाकार: सिंहासन बत्तीसी
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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