सिंहासन बत्तीसी: ग्यारहवीं पुतली त्रिलोचनी ने राजा भोज को यह कथा सुनाई— राजा विक्रमादित्य अपनी प्रजा से अत्यंत प्रेम करते थे। उन्हें हर समय अपने राज्य की सुख-समृद्धि और जनता के कल्याण की चिंता बनी रहती थी। एक बार उन्होंने संपूर्ण राज्य की मंगलकामना के लिए एक भव्य महायज्ञ कराने का निर्णय लिया। इस महायज्ञ में दूर-दूर के राजा-महाराजा, विद्वान पंडित और महान ऋषि-मुनियों को आमंत्रित किया गया। इतना ही नहीं, राजा ने देवताओं को भी इस यज्ञ में आमंत्रित करने का निश्चय किया। उन्होंने स्वयं पवन देवता को निमंत्रण देने का संकल्प लिया और समुद्र देवता को आमंत्रित करने का कार्य एक योग्य ब्राह्मण को सौंप दिया।
राजा विक्रमादित्य अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए वन की ओर निकल पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने योग-साधना के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया कि पवन देवता इस समय कहाँ निवास कर रहे हैं। अपनी साधना से उन्हें ज्ञात हुआ कि पवन देवता सुमेरु पर्वत पर विराजमान हैं। उन्होंने तुरंत निर्णय लिया कि वहीं जाकर उनका आवाहन किया जाए। इसके बाद उन्होंने अपने दोनों बेतालों का स्मरण किया। बेताल तत्काल उपस्थित हो गए और राजा की इच्छा जानने के बाद कुछ ही क्षणों में उन्हें सुमेरु पर्वत की ऊँची चोटी पर पहुँचा दिया।
सुमेरु पर्वत की चोटी पर भयंकर वेग से हवा चल रही थी। बड़े-बड़े वृक्ष और विशाल चट्टानें तक हवा में उड़ती दिखाई दे रही थीं। वहाँ खड़ा रहना भी अत्यंत कठिन था, लेकिन राजा विक्रमादित्य तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे योग और तपस्या में निपुण थे। उन्होंने एक स्थान पर स्थिर होकर ध्यान लगाना शुरू कर दिया और पवन देवता की आराधना में पूरी तरह लीन हो गए। उन्होंने भोजन, जल, आराम और नींद सबका त्याग कर दिया। कई दिनों तक वे एकाग्रचित्त होकर साधना करते रहे।
अंततः उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर पवन देवता प्रकट हुए। अचानक तेज़ आँधी थम गई और वातावरण शांत हो गया। मंद-मंद बहती शीतल वायु राजा के शरीर की सारी थकान हरने लगी। तभी आकाशवाणी हुई— “हे राजा विक्रमादित्य, हम तुम्हारी साधना से प्रसन्न हैं। अपनी इच्छा प्रकट करो।” यह सुनते ही राजा ने आँखें खोलीं और हाथ जोड़कर विनम्रता से कहा कि वे अपने महायज्ञ में पवन देवता की उपस्थिति चाहते हैं। उनका मानना था कि पवन देवता के आगमन से यज्ञ की शोभा और पवित्रता कई गुना बढ़ जाएगी।
राजा की बात सुनकर पवन देवता मुस्कुरा उठे। उन्होंने समझाया कि उनका सशरीर यज्ञ में पहुँचना संभव नहीं है। यदि वे अपने वास्तविक रूप में वहाँ आए, तो उनके साथ प्रचंड आँधी और तूफान भी आएँगे, जिससे खेत, वृक्ष, घर और महल सब नष्ट हो जाएँगे। उन्होंने कहा कि वे संसार के प्रत्येक कोने में विद्यमान हैं, इसलिए वे अदृश्य रूप से उस महायज्ञ में उपस्थित रहेंगे। राजा विक्रमादित्य ने उनकी बात को समझ लिया और शांत भाव से सिर झुका दिया। पवन देवता राजा की विनम्रता और प्रजाप्रेम से अत्यंत प्रसन्न हुए।
उन्होंने राजा को आशीर्वाद देते हुए कहा कि उनके राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ेगा और उनकी प्रजा को दुर्भिक्ष का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसके बाद उन्होंने राजा को कामधेनु गाय भेंट की और कहा कि उसकी कृपा से राज्य में कभी दूध और समृद्धि की कमी नहीं होगी। इतना कहकर पवन देवता अदृश्य हो गए। उनके जाने के बाद राजा विक्रमादित्य ने पुनः दोनों बेतालों का स्मरण किया और वे उन्हें सुरक्षित उनके राज्य की सीमा तक पहुँचा गए।
उधर जिस ब्राह्मण को समुद्र देवता को निमंत्रण देने भेजा गया था, वह भी कठिन यात्रा तय करते हुए समुद्र तट तक पहुँच गया। उसने समुद्र में कमर तक उतरकर समुद्र देवता का आवाहन करना शुरू किया। वह बार-बार कहता रहा कि महाराजा विक्रमादित्य महायज्ञ कर रहे हैं और वह उनके दूत के रूप में निमंत्रण देने आया है। काफी देर बाद समुद्र की अथाह गहराइयों से स्वयं समुद्र देवता प्रकट हुए। उन्होंने ब्राह्मण से कहा कि उन्हें पवन देवता के माध्यम से महायज्ञ की सारी जानकारी मिल चुकी है।
समुद्र देवता ने कहा कि वे भी विक्रमादित्य के आमंत्रण का सम्मान करते हैं, लेकिन सशरीर यज्ञ में उपस्थित होना उनके लिए संभव नहीं है। जब ब्राह्मण ने इसका कारण पूछा, तो उन्होंने बताया कि यदि वे अपने वास्तविक स्वरूप में वहाँ जाएँगे, तो उनके साथ अथाह जल भी चलेगा, जिससे रास्ते में आने वाली हर वस्तु डूब जाएगी और चारों ओर प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि वे जल की प्रत्येक बूंद में निवास करते हैं, इसलिए यज्ञ में प्रयुक्त जल में भी उनकी उपस्थिति महसूस की जाएगी।
इसके बाद समुद्र देवता ने ब्राह्मण को पाँच बहुमूल्य रत्न और एक अद्भुत घोड़ा भेंट करते हुए कहा कि वह इन्हें राजा विक्रमादित्य को सौंप दे। ब्राह्मण उन उपहारों को लेकर वापस चल पड़ा। लंबी यात्रा के कारण वह पैदल चल रहा था, तभी वह दिव्य घोड़ा मनुष्य की भाषा में बोला और उससे अपनी पीठ पर बैठने का आग्रह करने लगा। पहले तो ब्राह्मण संकोच करता रहा, लेकिन घोड़े ने समझाया कि वह राजा का दूत है, इसलिए उसे यह अधिकार प्राप्त है।
आखिरकार ब्राह्मण घोड़े पर सवार हो गया। वह घोड़ा पवन के समान तेज़ गति से उसे सीधे राजा विक्रमादित्य के दरबार तक ले आया। यात्रा के दौरान ब्राह्मण के मन में इच्छा जागी कि काश यह अद्भुत घोड़ा उसका अपना होता। जब उसने दरबार में पहुँचकर समुद्र देवता के साथ हुई सारी बातचीत विस्तार से सुनाई और उपहार राजा को सौंपे, तब विक्रमादित्य ने मुस्कुराते हुए कहा कि वे रत्न और घोड़ा उसी ब्राह्मण के योग्य हैं। उन्होंने कहा कि राज्य के कार्य के लिए उसने कठिन यात्रा और कष्ट सहन किए हैं, इसलिए इन उपहारों पर उसी का अधिकार है। यह सुनकर ब्राह्मण अत्यंत प्रसन्न हो गया और राजा की उदारता की प्रशंसा करता हुआ वहाँ से चला गया।
सिंहासन बत्तीसी: बारहवीं पुतली पद्मावती
सिंहासन बत्तीसी: बारहवीं पुतली पद्मावती ने कथा सुनाई वो इस प्रकार हैं – बारहवीं पुतली पद्मावती ने राजा भोज को यह कथा सुनाई तो एक रात की बात है जब राजा विक्रमादित्य अपने महल की छत पर बैठे चाँदनी रात का आनंद ले रहे थे। पूर्णिमा का चाँद अपने पूरे सौंदर्य के साथ आकाश में चमक रहा था और चारों ओर ऐसी उजली रोशनी फैली थी मानो दिन हो। प्रकृति की सुंदरता में डूबे हुए राजा अचानक एक स्त्री की भयभीत चीख सुनकर चौंक उठे। वह स्त्री लगातार सहायता के लिए पुकार रही थी। राजा ने तुरंत आवाज़ की दिशा का अनुमान लगाया, अपनी ढाल और तलवार उठाई तथा अस्तबल से घोड़ा निकालकर उसी दिशा में तेज़ी से बढ़ चले।
कुछ ही देर में वे उस स्थान पर पहुँच गए जहाँ से चीखें आ रही थीं। वहाँ उन्होंने देखा कि एक युवती भयभीत होकर “बचाओ-बचाओ” चिल्लाती हुई भाग रही थी और उसके पीछे एक भयानक राक्षस उसे पकड़ने के लिए दौड़ रहा था। राजा ने बिना देर किए घोड़े से छलांग लगा दी। वह युवती भागकर उनके चरणों में गिर पड़ी और अपनी रक्षा की गुहार लगाने लगी। राजा ने उसे उठाकर बहन कहकर सांत्वना दी और भरोसा दिलाया कि जब तक राजा विक्रमादित्य जीवित हैं, तब तक उस पर कोई संकट नहीं आ सकता।
राजा की बात सुनकर वह राक्षस ज़ोर से हँस पड़ा। उसने विक्रमादित्य का उपहास करते हुए कहा कि एक साधारण मनुष्य उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वह उन्हें भी कुछ ही क्षणों में चीर-फाड़ देगा। इतना कहकर वह विक्रमादित्य की ओर झपटा। राजा पूरी तरह सावधान थे। जैसे ही राक्षस ने उन पर आक्रमण किया, उन्होंने फुर्ती से स्वयं को बचाते हुए तलवार से उस पर वार किया। राक्षस भी अत्यंत चालाक और शक्तिशाली था। उसने अपने को बचा लिया और दोनों के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया।
काफी देर तक दोनों में घमासान युद्ध चलता रहा। अंततः विक्रमादित्य ने अवसर देखकर अपनी तलवार से राक्षस का सिर धड़ से अलग कर दिया। मगर अगले ही क्षण वह सिर फिर अपने स्थान पर जुड़ गया और राक्षस पहले से अधिक क्रोध में भरकर लड़ने लगा। इतना ही नहीं, जहाँ-जहाँ उसका रक्त धरती पर गिरा, वहाँ एक नया राक्षस उत्पन्न हो गया। यह देखकर राजा क्षणभर के लिए अवश्य चकित हुए, लेकिन उन्होंने धैर्य नहीं खोया। उन्होंने एक साथ दोनों राक्षसों का सामना करना शुरू कर दिया। रक्त से उत्पन्न राक्षस ने जब उन पर हमला किया, तो राजा ने एक ही वार में उसकी भुजाएँ और दूसरे वार में उसकी टाँगें काट डालीं।
दर्द से तड़पता हुआ वह दूसरा राक्षस ज़मीन पर गिर पड़ा। और यह दृश्य देखकर पहला राक्षस भयभीत हो गया और अवसर मिलते ही वहाँ से भाग निकला। चूँकि उसने युद्धभूमि छोड़ दी थी, इसलिए विक्रमादित्य ने पीठ पीछे उस पर वार करना उचित नहीं समझा। युद्ध समाप्त होने के बाद राजा उस युवती के पास पहुँचे। वह अब भी भय से काँप रही थी। राजा ने उसे ढाढ़स बंधाया और अपने साथ महल चलने को कहा ताकि उसे सुरक्षित उसके माता-पिता तक पहुँचाया जा सके।
उस युवती ने दुःखी स्वर में बताया कि संकट अभी समाप्त नहीं हुआ है। वह राक्षस अभी भी जीवित है और वापस लौटकर उसे फिर पकड़ ले जाएगा। राजा ने जब उसका परिचय पूछा, तो उसने बताया कि वह सिंहुल द्वीप के एक ब्राह्मण की पुत्री है। एक दिन वह अपनी सखियों के साथ तालाब में स्नान कर रही थी, तभी उस राक्षस ने उसे देख लिया और उसके सौंदर्य पर मोहित होकर उसे उठा लाया। वह उसे अपनी पत्नी बनाना चाहता था, लेकिन उसने प्रण किया था कि वह अपने प्राण दे देगी, पर अपनी पवित्रता पर आँच नहीं आने देगी।
राजा ने उसे आश्वासन दिया कि वे उस राक्षस का अंत करके ही लौटेंगे। जब उन्होंने राक्षस के पुनर्जीवित होने का रहस्य पूछा, तो युवती ने बताया कि उसके पेट में एक मोहिनी रहती है। जैसे ही राक्षस मरता है, वह उसके मुँह में अमृत डालकर उसे फिर जीवित कर देती है। उसने यह भी बताया कि रक्त से उत्पन्न दूसरे राक्षस को वह जीवित नहीं कर सकती। यह सुनकर राजा ने प्रण किया कि चाहे कितनी भी कठिनाई क्यों न आए, वे उस राक्षस का वध अवश्य करेंगे।
इसके बाद राजा एक वृक्ष की छाया में विश्राम करने लगे। तभी अचानक झाड़ियों में से एक विशाल सिंह निकलकर उन पर झपटा। पहला हमला इतना अचानक था कि सिंह उनकी बाँह पर घाव कर गया। मगर अब राजा पूरी तरह सतर्क हो चुके थे। जैसे ही सिंह ने दोबारा आक्रमण किया, विक्रमादित्य ने उसके पैरों को पकड़कर उसे पूरी शक्ति से दूर फेंक दिया। सिंह ज़मीन पर गिरते ही भयानक गर्जना करने लगा और अगले ही क्षण उसने फिर से उसी राक्षस का रूप धारण कर लिया। राजा समझ गए कि वह छल से उन्हें मारना चाहता था।
इसके बाद दोनों के बीच एक बार फिर भीषण युद्ध शुरू हुआ। लंबे संघर्ष के बाद जब राक्षस की शक्ति क्षीण होने लगी, तब विक्रमादित्य ने अपनी तलवार उसके पेट में घोंप दी। राक्षस पीड़ा से तड़पकर ज़मीन पर गिर पड़ा। राजा ने तुरंत उसका पेट चीर डाला। पेट फटते ही उसमें रहने वाली मोहिनी बाहर निकलकर अमृत लाने के लिए भागी। उसी समय विक्रमादित्य ने अपने दोनों बेतालों का स्मरण किया और उन्हें मोहिनी को पकड़ने का आदेश दिया। अमृत न मिल पाने के कारण वह राक्षस तड़प-तड़पकर मर गया।

मोहिनी ने राजा को बताया कि वह भगवान शिव की गणिका थी। किसी भूल के कारण उसे दंडस्वरूप उस राक्षस की सेवा में रहना पड़ा था। राजा विक्रमादित्य उसे अपने साथ लेकर महल लौटे। उन्होंने ब्राह्मण कन्या को सकुशल उसके माता-पिता को सौंप दिया और बाद में विधिपूर्वक मोहिनी से विवाह कर लिया।
सिंहासन बत्तीसी: तेरहवीं पुतली कीर्तिमती
तेरहवीं पुतली कीर्तिमती ने राजा भोज को यह कथा सुनाई— एक बार राजा विक्रमादित्य ने अपने राजमहल में एक भव्य महाभोज का आयोजन किया। उस विशाल भोज में अनेक विद्वान, ब्राह्मण, व्यापारी और दरबारी आमंत्रित थे। भोजन के दौरान चर्चा इस विषय पर होने लगी कि संसार का सबसे बड़ा दानी कौन है। सभा में उपस्थित लगभग सभी लोगों ने एक स्वर में राजा विक्रमादित्य को पृथ्वी का सर्वश्रेष्ठ दानवीर घोषित कर दिया। राजा सबकी बातें शांत भाव से सुन रहे थे। तभी उनकी दृष्टि एक ऐसे ब्राह्मण पर पड़ी जो इस चर्चा में मौन बैठा था। उसके चेहरे के भाव स्पष्ट बता रहे थे कि वह बाकी लोगों की राय से सहमत नहीं है
राजा विक्रमादित्य ने उस ब्राह्मण से उसकी चुप्पी का कारण पूछा। ब्राह्मण पहले तो घबराया, फिर बोला कि यदि वह अपनी अलग राय प्रकट करेगा तो संभव है कि लोग उसकी बात स्वीकार न करें। राजा ने उसे निडर होकर सत्य कहने का आदेश दिया। तब उसने विनम्र स्वर में कहा कि राजा विक्रमादित्य निस्संदेह महान दानी हैं, लेकिन इस पृथ्वी पर उनसे भी बड़ा एक दानी राजा मौजूद है। यह सुनते ही पूरी सभा आश्चर्य से भर उठी। सभी विस्मित होकर उसकी ओर देखने लगे। तब ब्राह्मण ने बताया कि समुद्र पार एक राज्य है जहाँ कीर्तित्तध्वज नाम का राजा प्रतिदिन एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ दान किए बिना अन्न और जल ग्रहण नहीं करता।
ब्राह्मण ने आगे बताया कि वह स्वयं कई दिनों तक उस राज्य में रह चुका है और रोज़ वहाँ जाकर दान प्राप्त करता था। उसने अपनी आँखों से देखा था कि राजा कीर्तित्तध्वज प्रतिदिन एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ दान करने के बाद ही भोजन करता है। यही कारण था कि वह सभा में अन्य लोगों की हाँ में हाँ नहीं मिला सका। राजा विक्रमादित्य उस ब्राह्मण की स्पष्टवादिता और सत्यनिष्ठा से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे सम्मान और पारितोषिक देकर विदा किया। मगर अब उनके मन में कीर्तित्तध्वज के बारे में जानने की तीव्र उत्सुकता जाग उठी थी।
ब्राह्मण के जाते ही राजा विक्रमादित्य ने साधारण मनुष्य का वेश धारण किया और अपने दोनों बेतालों का स्मरण किया। बेताल तत्काल उपस्थित हुए। राजा ने उन्हें समुद्र पार स्थित कीर्तित्तध्वज के राज्य तक पहुँचाने का आदेश दिया। कुछ ही क्षणों में वे उस राज्य के महल के द्वार पर पहुँच गए। वहाँ उन्होंने स्वयं को उज्जयिनी का एक सामान्य नागरिक बताते हुए राजा कीर्तित्तध्वज से मिलने की इच्छा प्रकट की। थोड़ी देर बाद जब उन्हें दरबार में बुलाया गया, तो उन्होंने राजा से नौकरी माँगी।
राजा कीर्तित्तध्वज ने उनसे पूछा कि वे कौन-सा कार्य कर सकते हैं। इस पर विक्रमादित्य ने आत्मविश्वास से कहा कि जो काम कोई दूसरा नहीं कर सकता, वह कार्य वे कर दिखाएँगे। यह उत्तर सुनकर कीर्तित्तध्वज प्रभावित हुआ और उसने उन्हें अपने महल में द्वारपाल के रूप में नियुक्त कर लिया। वहाँ रहकर विक्रमादित्य ने देखा कि ब्राह्मण की बात बिल्कुल सत्य थी। राजा कीर्तित्तध्वज वास्तव में प्रतिदिन एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ दान करने के बाद ही भोजन ग्रहण करता था।
कुछ दिनों तक निरीक्षण करने के बाद विक्रमादित्य ने यह भी देखा कि कीर्तित्तध्वज हर शाम अकेले कहीं जाता है और लौटते समय उसके हाथ में एक थैली होती है जिसमें एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ भरी रहती हैं। एक दिन उन्होंने गुप्त रूप से उसका पीछा किया। उन्होंने देखा कि कीर्तित्तध्वज समुद्र में स्नान करने के बाद एक मंदिर में प्रवेश करता है। वहाँ वह देवी की प्रतिमा की पूजा करता और फिर बिना भय के खौलते तेल से भरे कड़ाह में कूद जाता। देखते ही देखते उसका शरीर जलकर भस्म हो जाता।
इसके बाद कुछ भयानक जोगनियाँ वहाँ आतीं और उसके जले हुए शरीर को नोच-नोचकर खा जातीं। जब वे तृप्त होकर चली जातीं, तब मंदिर की देवी प्रकट होतीं और अमृत की बूंदों से कीर्तित्तध्वज को पुनः जीवित कर देतीं। फिर वे अपने हाथों से उसकी झोली में एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ भर देतीं। राजा उन मुद्राओं को लेकर महल लौट आता और अगले दिन याचकों में बाँट देता। अब विक्रमादित्य समझ चुके थे कि उसके प्रतिदिन दान करने का रहस्य क्या है।
अगले दिन कीर्तित्तध्वज के लौट जाने के बाद विक्रमादित्य स्वयं समुद्र में स्नान कर उसी मंदिर में पहुँचे। उन्होंने देवी की पूजा की और बिना किसी भय के खौलते तेल के कड़ाह में कूद पड़े। जोगनियों ने उनके शरीर को भी उसी प्रकार नोच-नोचकर खा लिया। बाद में देवी प्रकट हुईं और अमृत डालकर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया। जब देवी ने उन्हें भी स्वर्ण मुद्राएँ देनी चाहीं, तो उन्होंने विनम्रता से उन्हें लेने से मना कर दिया और कहा कि देवी की कृपा ही उनके लिए सबसे बड़ा वरदान है।
राजा विक्रमादित्य ने यह प्रक्रिया एक बार नहीं, बल्कि लगातार सात बार दोहराई। हर बार वे तेल के कड़ाह में कूदते और देवी के सामने किसी प्रकार का लोभ प्रकट नहीं करते। सातवीं बार देवी स्वयं उनकी तपस्या और त्याग से अत्यंत प्रसन्न हो उठीं। उन्होंने प्रकट होकर कहा कि अब वे उन्हें मनचाहा वरदान देने को तैयार हैं। राजा इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने देवी से वह दिव्य थैली माँग ली जिससे अनंत स्वर्ण मुद्राएँ निकलती थीं।
जैसे ही देवी ने वह थैली उन्हें सौंपी, उसी क्षण अद्भुत चमत्कार हुआ। मंदिर, प्रतिमा और पूरा दृश्य अचानक लुप्त हो गया। अब वहाँ केवल समुद्र तट दिखाई दे रहा था। अगले दिन जब राजा कीर्तित्तध्वज वहाँ पहुँचा, तो मंदिर को गायब देखकर अत्यंत दुखी हो गया। उसका प्रतिदिन एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ दान करने का नियम टूट गया। उसने अन्न-जल त्याग दिया और अपने कक्ष में उदास पड़ा रहने लगा। धीरे-धीरे उसका शरीर दुर्बल होने लगा।
जब उसकी स्थिति अत्यंत खराब हो गई, तब विक्रमादित्य उसके पास पहुँचे और उसकी उदासी का कारण पूछा। कीर्तित्तध्वज ने उन्हें सारी बात बता दी। तब विक्रमादित्य ने मुस्कुराते हुए वह दिव्य थैली उसे सौंप दी और कहा कि वे उसे प्रतिदिन मृत्यु जैसी पीड़ा सहते हुए नहीं देख सकते थे। इसलिए उन्होंने देवी से वही थैली प्राप्त कर ली। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने अपने वचन के अनुसार वही कार्य करके दिखाया है जो कोई और नहीं कर सकता था।
राजा कीर्तित्तध्वज यह जानकर भावविभोर हो उठा कि उसके सामने खड़ा साधारण द्वारपाल वास्तव में महान सम्राट विक्रमादित्य हैं। उसने उन्हें गले लगाते हुए कहा कि इस पृथ्वी पर उनसे बड़ा दानी कोई नहीं हो सकता, क्योंकि उन्होंने इतनी कठिन तपस्या से प्राप्त दिव्य थैली भी बिना किसी मोह के उसे दान कर दी।
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लेखक / मूल रचनाकार: सिंहासन बत्तीसी
प्रस्तुति: Saying Central Team





