सिंहासन बत्तीसी : नवीं पुतली मधुमालती ने राजा भोज को जो कथा सुनाई, उसमें राजा विक्रमादित्य की प्रजा के लिए प्राण न्योछावर कर देने वाली भावना का अद्भुत वर्णन था। एक बार राजा विक्रमादित्य ने अपने राज्य की सुख-समृद्धि और प्रजा के कल्याण के लिए एक विशाल यज्ञ का आयोजन करवाया। कई दिनों तक वह यज्ञ बड़े विधि-विधान से चलता रहा। देश-विदेश से विद्वान ब्राह्मण और ऋषि-मुनि वहाँ उपस्थित हुए थे। एक दिन राजा स्वयं मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ में बैठे हुए थे, तभी एक महान ऋषि वहाँ पधारे। यज्ञ के नियमों के कारण राजा उठकर उनका स्वागत नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्होंने मन ही मन उनका अभिवादन किया और सम्मानपूर्वक प्रणाम किया।
ऋषि राजा की भावना समझ गए और उन्होंने भी मन ही मन उन्हें आशीर्वाद दिया। जब यज्ञ की प्रक्रिया पूरी हुई और राजा अपने आसन से उठे, तब वे स्वयं ऋषि के पास गए और विनम्रता से उनके आने का कारण पूछा। राजा को ज्ञात था कि नगर के बाहर वन में उनका एक गुरुकुल है, जहाँ अनेक बालक शिक्षा प्राप्त करते हैं। ऋषि का चेहरा चिंता से भरा हुआ था। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा कि यदि बात केवल उनकी होती, तो वे कभी यज्ञ के बीच राजा को परेशान न करते, लेकिन इस समय आठ से बारह वर्ष की आयु के छह बच्चों के जीवन का प्रश्न था।
राजा विक्रमादित्य ने तुरंत उनसे पूरी बात विस्तार से बताने का अनुरोध किया। तब ऋषि ने बताया कि उनके आश्रम के कुछ बालक वन में सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा करने गए थे। तभी अचानक दो भयानक राक्षस वहाँ आए और उन बच्चों को पकड़कर एक ऊँची पहाड़ी पर ले गए। जब बच्चे बहुत देर तक आश्रम नहीं लौटे, तो वे स्वयं उनकी खोज में जंगल में भटकने लगे। तभी उन्हें पहाड़ी के ऊपर से किसी राक्षस की भयंकर गर्जना सुनाई दी। राक्षस ने कहा कि यदि बच्चों को जीवित वापस चाहिए, तो बदले में उन्हें एक बलशाली पुरुष की बलि माँ काली के सामने देनी होगी।
ऋषि ने बताया कि उन्होंने स्वयं को बलि के लिए प्रस्तुत करने का प्रयास किया, लेकिन राक्षसों ने मना कर दिया। उनका कहना था कि माँ काली किसी वृद्ध और निर्बल व्यक्ति की बलि से प्रसन्न नहीं होंगी। उन्हें एक स्वस्थ, वीर और शक्तिशाली क्षत्रिय की आवश्यकता थी। राक्षसों ने चेतावनी भी दी थी कि यदि किसी ने बलपूर्वक बच्चों को छुड़ाने की कोशिश की, तो वे सभी बच्चों को पहाड़ी से नीचे फेंक देंगे। ऋषि की यह बात सुनते ही राजा विक्रमादित्य का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने बिना एक पल सोचे तुरंत कहा कि वे स्वयं बलि देने के लिए तैयार हैं।
राजा ने ऋषि से कहा कि वे उन्हें तुरंत उस पहाड़ी तक ले चलें। उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा कि यदि एक राजा के जीवित रहते उसकी प्रजा संकट में पड़े और वह स्वयं आगे न आए, तो उसका राजा कहलाना व्यर्थ है। ऋषि यह सुनकर स्तब्ध रह गए। उन्होंने राजा को बहुत समझाया और ऐसा जोखिम न उठाने की प्रार्थना की, लेकिन विक्रमादित्य अपने निर्णय से तनिक भी नहीं डिगे।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि प्रजा की रक्षा करना ही उनका सबसे बड़ा धर्म है और यदि आवश्यकता पड़े, तो वे अपने प्राण भी न्योछावर कर सकते हैं।
कुछ ही समय बाद राजा ऋषि के साथ उस पहाड़ी के नीचे पहुँचे। उन्होंने अपना घोड़ा वहीं छोड़ दिया और कठिन पथ पर पैदल चढ़ाई शुरू कर दी। रास्ता बेहद दुर्गम था, लेकिन राजा बिना रुके आगे बढ़ते रहे। आखिरकार वे पहाड़ी की चोटी पर पहुँच गए। उन्हें देखते ही एक राक्षस गरजते हुए बोला कि वह उन्हें पहचानता है और पूछा कि क्या वे बच्चों की रिहाई की शर्त अच्छी तरह जानते हैं। राजा ने शांत स्वर में उत्तर दिया कि वे सब कुछ जानकर ही वहाँ आए हैं और अब बच्चों को मुक्त कर देना चाहिए।
राजा की बात सुनकर एक राक्षस बच्चों को अपनी बाँहों में उठाकर पहाड़ी से नीचे ले गया और उन्हें सुरक्षित स्थान पर छोड़ आया। दूसरा राक्षस विक्रमादित्य को उस स्थान पर ले गया, जहाँ माँ काली की विशाल प्रतिमा स्थापित थी और सामने बलिवेदी बनी हुई थी। राजा विक्रमादित्य बिना किसी भय या विचलन के बलिवेदी के सामने जाकर खड़े हो गए। उन्होंने अपने मन में अंतिम बार भगवान का स्मरण किया और फिर शांत भाव से अपना सिर बलि के लिए झुका दिया।
राक्षस ने अपने हाथ में खड्ग उठाया और राजा का सिर धड़ से अलग करने के लिए आगे बढ़ा। लेकिन अगले ही क्षण एक अद्भुत चमत्कार हुआ। राक्षस ने अचानक अपना खड्ग दूर फेंक दिया और आगे बढ़कर राजा विक्रमादित्य को गले लगा लिया। उसी क्षण वहाँ दिव्य प्रकाश फैल गया और चारों ओर सुगंध व्याप्त हो गई। विक्रमादित्य ने आश्चर्य से देखा कि दोनों राक्षस अपने वास्तविक रूप में आ चुके थे। वे कोई साधारण राक्षस नहीं, बल्कि देवराज इन्द्र और पवन देवता थे।
दोनों देवताओं ने मुस्कुराते हुए कहा कि वे राजा की परीक्षा लेना चाहते थे। वे यह देखना चाहते थे कि विक्रमादित्य केवल धन और वस्तुओं का दान करने वाले राजा हैं या आवश्यकता पड़ने पर अपने प्राण भी त्याग सकते हैं। उन्होंने कहा कि राजा को यज्ञ करते देखकर ही उनके मन में यह परीक्षा लेने का विचार आया था। अब उन्हें यह पूर्ण विश्वास हो गया था कि विक्रमादित्य जैसा त्यागी और प्रजावत्सल राजा संसार में दुर्लभ है। अंत में दोनों देवताओं ने उन्हें यशस्वी होने का आशीर्वाद दिया और कहा कि उनकी कीर्ति युगों-युगों तक चारों दिशाओं में फैलती रहेगी।
सिंहासन बत्तीसी: दसवीं पुतली प्रभावती
दसवीं पुतली प्रभावती ने राजा भोज को यह कथा सुनाई— एक बार राजा विक्रमादित्य शिकार खेलते-खेलते अपने सैनिकों से बहुत दूर निकल आए। घना जंगल चारों ओर फैला हुआ था और काफी देर तक भटकने के बाद भी उन्हें अपने साथी दिखाई नहीं दिए। तभी उनकी नज़र एक युवक पर पड़ी, जो एक पेड़ पर चढ़कर उसकी शाखा से रस्सी बाँध रहा था। रस्सी में फंदा बनाकर उसने अपना सिर उसमें डाल लिया और आत्महत्या करने के लिए झूलने ही वाला था। यह दृश्य देखते ही विक्रमादित्य तुरंत उसकी ओर दौड़े और उसे सहारा देकर नीचे उतार लिया।
राजा ने उसे कठोर स्वर में समझाया कि आत्महत्या कायरता, पाप और अपराध है। उन्होंने कहा कि एक राजा होने के नाते वे उसे इस अपराध के लिए दंड भी दे सकते हैं। युवक राजा की तेजस्वी वाणी और राजसी व्यक्तित्व देखकर भयभीत हो गया। तब विक्रमादित्य ने शांत स्वर में उसकी पीठ थपथपाई और पूछा कि वह स्वस्थ और बलशाली होते हुए भी जीवन से इतना निराश क्यों हो गया है। युवक ने कहा कि उसकी परेशानी गरीबी या भूख नहीं, बल्कि प्रेम है। उसकी बात सुनकर राजा ने उससे पूरी बात विस्तार से बताने को कहा।
युवक ने अपना नाम वसु बताया और कहा कि वह कालिं नामक स्थान का रहने वाला है। एक दिन जंगल से गुजरते समय उसकी भेंट एक अत्यंत सुंदर राजकुमारी से हुई। वह उसके रूप पर ऐसा मोहित हुआ कि उसी क्षण उसने उससे अपने प्रेम का प्रस्ताव रख दिया। लेकिन उसकी बात सुनकर राजकुमारी मुस्कुरा पड़ी। उसने कहा कि वह किसी से प्रेम नहीं कर सकती, क्योंकि उसका भाग्य ही दुर्भाग्यपूर्ण है। उसके जन्म के समय ऐसे नक्षत्र थे कि यदि उसके पिता ने उसका चेहरा देख लिया, तो उनकी तत्काल मृत्यु हो जाएगी। इसी कारण जन्म के तुरंत बाद उसे एक तपस्वी की कुटिया में भेज दिया गया, जहाँ उसका पालन-पोषण हुआ।
राजकुमारी ने वसु को बताया कि उसका विवाह केवल उसी युवक से हो सकता है, जो असंभव को संभव कर दिखाए। शर्त यह थी कि इच्छुक युवक को खौलते हुए तेल के कड़ाह में कूदकर जीवित बाहर निकलना होगा। उसकी यह बात सुनकर वसु उस कुटिया तक पहुँचा, जहाँ राजकुमारी रहती थी। लेकिन वहाँ पहुँचकर उसने अनेक युवकों की अस्थियाँ देखीं, जो उसी शर्त को पूरा करने के प्रयास में अपनी जान गंवा चुके थे। यह भयावह दृश्य देखकर उसकी हिम्मत टूट गई और वह निराश होकर वापस लौट आया।
वसु ने कहा कि उसने राजकुमारी को भुलाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उसका रूप हर समय उसकी आँखों के सामने घूमता रहता है। उसे न नींद आती है, न भोजन अच्छा लगता है। वह मानसिक पीड़ा से इतना टूट चुका है कि अब उसे मृत्यु ही एकमात्र रास्ता दिखाई देता है। राजा विक्रमादित्य ने उसे समझाया कि यदि राजकुमारी को पाना असंभव है, तो उसे भूलकर जीवन में आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन वसु ने निराश होकर कहा कि अब उसके लिए जीना व्यर्थ है और राजा ने उसे बचाकर अच्छा नहीं किया।
विक्रमादित्य उसकी व्यथा समझ चुके थे। उन्होंने कहा कि वे उसके लिए हर संभव प्रयास करेंगे और राजकुमारी से उसका विवाह करवाने की पूरी कोशिश करेंगे। इसके बाद उन्होंने माँ काली द्वारा प्राप्त अपने दोनों बेतालों का स्मरण किया। दोनों बेताल तुरंत वहाँ उपस्थित हो गए और कुछ ही क्षणों में राजा तथा वसु को लेकर उस कुटिया तक पहुँच गए, जहाँ राजकुमारी रहती थी। बाहर से वह स्थान साधारण कुटिया दिखाई देता था, लेकिन भीतर राजकुमारी के लिए हर सुविधा उपलब्ध थी। उसकी सेवा के लिए नौकर-चाकर और साथ निभाने के लिए सखियाँ भी थीं।
राजा विक्रमादित्य ने वहाँ उपस्थित तपस्वी से वसु के लिए राजकुमारी का हाथ माँगा। तपस्वी ने राजा को पहचान लिया और उनका सम्मान करते हुए कहा कि वह अपना जीवन भी राजा को अर्पित कर सकता है, लेकिन राजकुमारी का विवाह उसी युवक से होगा जो खौलते तेल के कड़ाह में कूदकर सुरक्षित बाहर आ सके। राजा ने पूछा कि यदि कोई दूसरा व्यक्ति किसी और के लिए यह परीक्षा पूरी करे, तो क्या वह स्वीकार्य होगा। तपस्वी ने उत्तर दिया कि उसे केवल शर्त पूरी होने से मतलब है, चाहे परीक्षा देने वाला स्वयं वर हो या कोई अन्य।
तपस्वी ने विश्वास के साथ कहा कि यह शर्त कोई पूरी नहीं कर पाएगा और राजकुमारी को जीवनभर अविवाहित ही रहना पड़ेगा। लेकिन तभी विक्रमादित्य ने दृढ़ स्वर में कहा कि वे स्वयं वसु के लिए उस खौलते तेल के कड़ाह में कूदने को तैयार हैं। यह सुनकर तपस्वी आश्चर्य से उन्हें देखने लगा। उसी समय राजकुमारी अपनी सखियों के साथ वहाँ आई। उसका अलौकिक सौंदर्य देखकर राजा भी क्षणभर के लिए चकित रह गए। उन्हें यह देखकर बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ कि कितने ही युवक उसके लिए अपने प्राण न्योछावर कर चुके थे।

इसके बाद राजा के आदेश पर एक विशाल कड़ाह में तेल उबाला जाने लगा। देखते-ही-देखते तेल खौलने लगा और उसकी तपिश दूर तक महसूस होने लगी। चारों ओर सन्नाटा छा गया। सभी की नज़रें राजा विक्रमादित्य पर टिक गईं, जो बिना किसी भय के शांत भाव से उस उबलते कड़ाह की ओर बढ़ रहे थे।
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सिंहासन बत्तीसी भारतीय संस्कृति और लोककथाओं का अद्भुत संग्रह है, जिसमें राजा विक्रमादित्य की वीरता, न्यायप्रियता और बुद्धिमानी की 32 प्रेरणादायक कहानियाँ वर्णित हैं। हर कहानी एक नई सीख देती है और सत्य, धर्म, दया तथा न्याय के महत्व को दर्शाती है। ये कथाएँ मनोरंजन के साथ जीवन को सही दिशा देने की प्रेरणा भी प्रदान करती हैं।
लेखक / मूल रचनाकार: सिंहासन बत्तीसी
प्रस्तुति: Saying Central Team





