saying-central -पंचतंत्र

पंचतंत्र की प्रमुख कहानी: गौरैया, कठफोड़वा और हाथी

Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

पंचतंत्र की कहानी: तीन मछलियां

एक नदी के किनारे उसी नदी से जुड़ा हुआ एक बड़ा और गहरा जलाशय था। उस जलाशय में पानी बहुत गहरा था, इसलिए वहाँ काई और जलीय पौधे खूब उगते थे। ऐसे स्थान मछलियों के लिए बहुत उपयुक्त होते हैं। इसी कारण नदी की अनेक मछलियाँ वहाँ आकर रहने लगी थीं। अंडे देने के लिए भी वे उसी जलाशय में आती थीं।

जलाशय चारों ओर से लंबी घास और झाड़ियों से घिरा हुआ था, इसलिए बाहर से आसानी से दिखाई नहीं देता था।

उसी जलाशय में तीन मछलियाँ रहती थीं। तीनों का स्वभाव एक-दूसरे से बिल्कुल अलग था।

पहली मछली का नाम अन्ना था। वह दूरदर्शी थी और संकट आने से पहले ही उससे बचने का उपाय सोच लेती थी।

दूसरी मछली प्रत्यु थी। उसका मानना था कि जब संकट सामने आए, तभी उससे बचने का उपाय करना चाहिए।

तीसरी मछली यद्दी थी। वह भाग्यवादी स्वभाव की थी। उसका विश्वास था कि जो भाग्य में लिखा है, वही होकर रहेगा। प्रयास करने से कुछ नहीं बदलता।

एक दिन शाम के समय कुछ मछुआरे नदी में मछलियाँ पकड़कर अपने घर लौट रहे थे। उस दिन उनके जाल में बहुत कम मछलियाँ फँसी थीं, इसलिए वे उदास थे।

तभी उन्होंने झाड़ियों के ऊपर से उड़ते हुए मछली खाने वाले पक्षियों को देखा। उनकी चोंचों में कई मछलियाँ दबी हुई थीं।

एक मछुआरा बोला, “लगता है झाड़ियों के पीछे कोई बड़ा जलाशय है, जहाँ बहुत सारी मछलियाँ हैं।”

सभी मछुआरे उत्साहित होकर झाड़ियों के बीच से रास्ता बनाते हुए जलाशय तक पहुँच गए। वहाँ असंख्य मछलियाँ देखकर उनकी आँखें चमक उठीं।

एक मछुआरा बोला, “अरे! यहाँ तो मछलियों का खजाना भरा पड़ा है।”

दूसरा बोला, “आज शाम हो चुकी है। कल सुबह जल्दी आकर यहाँ जाल डालेंगे।”

यह कहकर वे अगले दिन आने की योजना बनाकर चले गए।

तीनों मछलियों ने उनकी सारी बातें सुन ली थीं।

अन्ना चिंतित होकर बोली, “मित्रो! अब यहाँ रहना सुरक्षित नहीं है। संकट आने की सूचना मिल चुकी है। समझदारी इसी में है कि हम समय रहते यहाँ से निकल जाएँ। मैं तो अभी इसी समय नहर के रास्ते नदी में जा रही हूँ।”

प्रत्यु बोली, “तुम्हें जाना है तो जाओ, लेकिन मैं अभी नहीं जाऊँगी। अभी संकट आया कहाँ है? कौन जानता है कि वे मछुआरे कल आएँगे भी या नहीं? हो सकता है उनका कार्यक्रम बदल जाए। जब संकट सामने आएगा, तब देखा जाएगा।”

यद्दी ने आलस्य से कहा, “भागने-दौड़ने से कुछ नहीं होता। यदि भाग्य में मरना लिखा है, तो मृत्यु निश्चित है। और यदि जीवित रहना लिखा है, तो कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”

अन्ना ने और समय नष्ट नहीं किया। वह उसी रात जलाशय छोड़कर नहर के रास्ते नदी में चली गई।

लेकिन प्रत्यु और यद्दी वहीं रहीं।

अगली सुबह मछुआरे अपने जाल लेकर आ पहुँचे। उन्होंने जलाशय में जाल डालने शुरू कर दिए।

संकट सामने देखकर प्रत्यु तुरंत उपाय सोचने लगी। वह समझ गई कि अब बुद्धि से ही जान बच सकती है।

तभी उसे याद आया कि कुछ दिनों पहले जलाशय में एक मरा हुआ ऊदबिलाव तैरता रहा था। उसकी सड़ी हुई लाश अभी भी कहीं होगी।

वह तुरंत उस लाश तक पहुँची और उसके पेट के भीतर घुस गई। फिर उसने अपने शरीर पर सड़ी हुई बदबू लपेट ली।

कुछ देर बाद वह मछुआरे के जाल में फँस गई।

जब मछुआरे ने जाल किनारे पर उलटा, तो बाकी मछलियाँ तड़पने लगीं, लेकिन प्रत्यु बिल्कुल निश्चल होकर मरी हुई मछली की तरह पड़ी रही।

मछुआरे को उसके शरीर से सड़ांध की तेज बदबू आई। उसने उसे उठाकर सूँघा और घृणा से बोला, “यह तो पहले से मरी और सड़ी हुई मछली है।”

यह कहकर उसने प्रत्यु को वापस जलाशय में फेंक दिया।

पानी में गिरते ही प्रत्यु तेजी से गहरे पानी में चली गई और अपनी जान बचाने में सफल हो गई।

उधर यद्दी भी एक दूसरे जाल में फँस चुकी थी। उसे बाकी मछलियों के साथ टोकरी में डाल दिया गया।

वह भाग्य के भरोसे चुपचाप पड़ी रही और अंत में अन्य मछलियों की तरह तड़प-तड़पकर मर गई।

इस प्रकार अन्ना अपनी दूरदर्शिता से बच गई, प्रत्यु अपनी बुद्धि और सूझबूझ से संकट से निकल गई, जबकि यद्दी केवल भाग्य के भरोसे रहने के कारण नष्ट हो गई।

नैतिक शिक्षा — केवल भाग्य के भरोसे बैठे रहने वाले का विनाश निश्चित होता है। बुद्धि, समय पर निर्णय और कर्म ही जीवन की रक्षा करते हैं।

2. गौरैया, कठफोड़वा और हाथी

किसी घने जंगल में एक ऊँचे पेड़ पर एक गौरैया अपने पति के साथ रहती थी। दोनों ने बड़ी मेहनत से अपना सुंदर घोंसला बनाया था। उस घोंसले में गौरैया ने अंडे दिए थे और वह बेसब्री से अपने बच्चों के जन्म का इंतज़ार कर रही थी।

एक दिन गौरैया अपने अंडों को से रही थी और उसका पति रोज की तरह भोजन की तलाश में बाहर गया हुआ था।

उसी समय जंगल में एक गुस्सैल और मदमस्त हाथी आ पहुँचा। वह क्रोध में इधर-उधर पेड़-पौधों को तोड़ता और रौंदता हुआ आगे बढ़ रहा था।

तोड़-फोड़ करते-करते वह उसी पेड़ के पास पहुँचा, जिस पर गौरैया का घोंसला था।

हाथी ने अपनी शक्ति के घमंड में पेड़ को जोर-जोर से हिलाना शुरू कर दिया। पेड़ तो बहुत मजबूत था, इसलिए वह टूटा नहीं, लेकिन हाथी के भयंकर झटकों से गौरैया का घोंसला नीचे गिर पड़ा।

घोंसला गिरते ही उसमें रखे सारे अंडे फूट गए।

अपने अंडों को टूटता देखकर गौरैया दुख से बिलख उठी। वह जोर-जोर से रोने लगी।

कुछ देर बाद उसका पति भी वापस लौट आया। जब उसने टूटा हुआ घोंसला और फूटे हुए अंडे देखे, तो वह भी अत्यंत दुखी हुआ।

दोनों ने निश्चय किया कि वे उस निर्दयी हाथी को उसके घमंड का दंड अवश्य देंगे।

वे सहायता लेने अपने मित्र कठफोड़वा के पास पहुँचे और उसे पूरी घटना सुनाई।

कठफोड़वा अपने मित्रों का दुख सुनकर बोला, “मित्रो, दुःखी मत हो। अन्याय करने वाले को दंड अवश्य मिलना चाहिए। मैं तुम्हारी सहायता करूँगा।”

कठफोड़वा के दो और मित्र थे — एक मधुमक्खी और एक मेंढक।

कठफोड़वा ने उन दोनों को बुलाया और सबने मिलकर हाथी को सबक सिखाने की योजना बनाई।

योजना के अनुसार सबसे पहले मधुमक्खी ने अपना काम शुरू किया।

वह उड़कर हाथी के कान के पास पहुँची और मधुर स्वर में गुनगुनाने लगी। मधुमक्खी की मीठी आवाज सुनकर हाथी आनंद में डूब गया और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

जैसे ही हाथी संगीत में मग्न हुआ, कठफोड़वा तुरंत वहाँ पहुँचा और अपनी तेज चोंच से हाथी की दोनों आँखें फोड़ दीं।

अचानक हुए इस आक्रमण से हाथी दर्द से चिल्लाने लगा। अब वह अंधा हो चुका था।

इसके बाद योजना का अंतिम भाग शुरू हुआ।

मेंढक अपने साथियों के साथ एक बड़े दलदल के पास गया और सभी मिलकर जोर-जोर से टर्राने लगे।

अंधे हाथी को मेंढकों की आवाज सुनाई दी। उसे लगा कि पास में कोई तालाब है, जहाँ जाकर वह पानी पी सकेगा और अपने शरीर को ठंडक पहुँचा सकेगा।

वह आवाज की दिशा में चल पड़ा।

लेकिन पानी समझकर वह सीधे दलदल में जा घुसा। धीरे-धीरे उसका विशाल शरीर दलदल में धँसने लगा।

बहुत कोशिश करने के बाद भी वह बाहर नहीं निकल सका और अंत में उसी दलदल में फँसकर मर गया।

इस प्रकार छोटे और कमजोर जीवों ने अपनी बुद्धि, एकता और साहस से एक विशाल और शक्तिशाली हाथी को पराजित कर दिया।

नैतिक शिक्षा — एकता और बुद्धिमानी से छोटे और कमजोर लोग भी बड़े से बड़े शत्रु को हरा सकते हैं।

saying-central -पंचतंत्र

3. चतुर खरगोश और शेर

किसी घने जंगल में एक बहुत ही शक्तिशाली और भयानक शेर रहता था। वह प्रतिदिन शिकार करने निकलता और अपनी भूख से कहीं अधिक जानवरों को मार डालता। कभी एक, कभी दो और कभी कई-कई जानवर उसके शिकार बन जाते।

धीरे-धीरे पूरे जंगल में भय फैल गया। सभी जानवर सोचने लगे कि यदि शेर इसी प्रकार रोज शिकार करता रहा, तो एक दिन जंगल में कोई भी जीवित नहीं बचेगा।

अपनी रक्षा के लिए जंगल के सभी जानवर एक दिन इकट्ठा हुए और उपाय सोचने लगे।

बहुत विचार-विमर्श के बाद उन्होंने निर्णय लिया कि वे स्वयं शेर के पास जाकर उससे विनती करेंगे।

अगले दिन जानवरों का एक दल शेर के पास पहुँचा।

सभी को अपनी ओर आते देखकर शेर गरजकर बोला, “क्या बात है? तुम सब यहाँ क्यों आए हो?”

जानवरों के नेता ने विनम्रता से कहा, “महाराज, आप हमारे राजा हैं और हम आपकी प्रजा। जब आप शिकार करने निकलते हैं, तो बहुत सारे जानवरों को मार डालते हैं। आप उन्हें खा भी नहीं पाते। इससे जंगल में जानवरों की संख्या तेजी से घट रही है। यदि यही चलता रहा, तो शीघ्र ही जंगल खाली हो जाएगा। प्रजा के बिना राजा भी कैसे रहेगा?”

फिर उसने कहा, “इसलिए हम सबने मिलकर यह निश्चय किया है कि प्रतिदिन आपके भोजन के लिए एक जानवर स्वयं आपके पास भेज दिया जाएगा। इससे आपको शिकार करने का कष्ट भी नहीं उठाना पड़ेगा और बाकी जानवर भी सुरक्षित रहेंगे।”

शेर ने कुछ देर सोचकर कहा, “ठीक है। मैं तुम्हारी बात मान लेता हूँ। लेकिन ध्यान रहे, यदि किसी दिन मेरा भोजन समय पर नहीं पहुँचा, तो मैं पूरे जंगल का संहार कर दूँगा।”

जानवरों ने भयभीत होकर उसकी शर्त स्वीकार कर ली।

उस दिन से प्रतिदिन बारी-बारी से एक जानवर शेर के पास भेजा जाने लगा।

कुछ दिनों बाद खरगोशों की बारी आई।

शेर के भोजन के लिए एक छोटे से खरगोश को चुना गया। वह खरगोश आकार में भले ही छोटा था, लेकिन अत्यंत बुद्धिमान था।

उसने मन ही मन सोचा, “यूँ ही बिना प्रयास किए मर जाना मूर्खता है। मुझे कोई ऐसी युक्ति सोचनी चाहिए जिससे न केवल मेरी जान बचे, बल्कि जंगल के सभी जानवर इस संकट से मुक्त हो जाएँ।”

बहुत सोचने के बाद उसे एक उपाय सूझ गया।

वह जानबूझकर धीरे-धीरे चलता हुआ शेर की गुफा की ओर बढ़ा।

जब वह वहाँ पहुँचा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। भूख के कारण शेर क्रोध से पागल हो रहा था।

जैसे ही उसने छोटे से खरगोश को देखा, वह गरजकर बोला, “इतनी देर क्यों हुई? और तुम जैसे छोटे जीव से मेरा पेट कैसे भरेगा? मैं आज सभी जानवरों को मार डालूँगा।”

खरगोश ने विनम्रता से सिर झुकाकर कहा, “महाराज, कृपया क्रोधित न हों। इसमें हमारा कोई दोष नहीं है। जंगल के जानवर जानते थे कि एक छोटा खरगोश आपके भोजन के लिए पर्याप्त नहीं होगा, इसलिए उन्होंने छह खरगोश भेजे थे।”

शेर गरजकर बोला, “फिर बाकी पाँच कहाँ गए?”

खरगोश बोला, “महाराज, रास्ते में हमें एक दूसरा शेर मिल गया। उसने पाँच खरगोशों को मारकर खा लिया और मुझे आपके पास भेज दिया।”

यह सुनते ही शेर क्रोध से काँप उठा। वह दहाड़कर बोला, “क्या कहा? दूसरा शेर! इस जंगल में दूसरा राजा कौन बनने की हिम्मत कर रहा है?”

खरगोश बोला, “महाराज, वह बहुत विशाल और भयानक शेर है। वह एक गुफा में रहता है। उसने कहा कि वही इस जंगल का असली राजा है।”

शेर का क्रोध और बढ़ गया। वह बोला, “मुझे तुरंत उसके पास ले चलो। आज मैं उसे जीवित नहीं छोड़ूँगा।”

खरगोश बोला, “जैसी आज्ञा महाराज।”

फिर वह शेर को धीरे-धीरे जंगल के भीतर एक पुराने कुएँ के पास ले गया।

कुएँ के पास पहुँचकर खरगोश बोला, “महाराज, वह दुष्ट शेर इसी किले जैसे गहरे स्थान में रहता है। सावधान रहिएगा।”

शेर गरजकर बोला, “मुझे उससे डर नहीं लगता। बताओ वह कहाँ है?”

खरगोश कुएँ के पास जाकर बोला, “महाराज, उसने आपको आते देख भीतर छिप गया है। आप स्वयं झाँककर देख लीजिए।”

शेर ने कुएँ में झाँका।

कुएँ के साफ पानी में उसे अपनी ही परछाईं दिखाई दी। उसने समझा कि वही दूसरा शेर है।

क्रोध में उसने जोर से दहाड़ लगाई। कुएँ से उसकी दहाड़ की गूँज वापस आई। शेर को लगा कि दूसरा शेर भी उसे चुनौती दे रहा है।

क्रोध में अंधा होकर वह तुरंत कुएँ में कूद पड़ा।

कुएँ की दीवारों से टकराकर वह सीधे पानी में गिरा और डूबकर मर गया।

इस प्रकार एक छोटे से बुद्धिमान खरगोश ने अपनी चतुराई से भयानक शेर का अंत कर दिया और पूरे जंगल को उसके आतंक से मुक्त कर दिया।

नैतिक शिक्षा — बुद्धि और चतुराई से बड़े से बड़े बलवान शत्रु को भी हराया जा सकता है।

4. पंचतंत्र की कहानियाँ : दुष्ट सर्प और कौवे

एक जंगल में एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था। उस पेड़ पर घोंसला बनाकर एक कौआ और कव्वी रहते थे। उसी पेड़ के खोखले तने में एक दुष्ट काला सर्प भी आकर रहने लगा। हर बार जब कव्वी अंडे देती, तब मौका पाकर वह सर्प घोंसले में चढ़ जाता और सारे अंडे खा जाता। कौआ और कव्वी बहुत दुखी रहते, लेकिन उस दुष्ट सर्प का कुछ नहीं कर पाते थे।

एक बार कौआ और कव्वी जल्दी लौट आए और उन्होंने अपनी आंखों से सर्प को अंडे खाते देख लिया। दोनों का दिल टूट गया। कव्वी रोते हुए बोली, “क्या हर बार हमारे बच्चों का यही हाल होगा?” कौए ने उसे समझाया और कहा, “दुखी मत हो। अब हमें अपने शत्रु का पता चल गया है। हम कोई न कोई उपाय जरूर निकालेंगे।”

कौए ने पुराना घोंसला छोड़कर पेड़ की सबसे ऊंची डाल पर नया घोंसला बना लिया। उसे लगा कि इतनी ऊंचाई तक सर्प नहीं पहुंच पाएगा। कुछ समय बाद कव्वी ने फिर अंडे दिए और उनसे छोटे-छोटे बच्चे भी निकल आए। लेकिन दुष्ट सर्प ने खोजते-खोजते नया घोंसला भी ढूंढ लिया। एक दिन मौका पाकर वह ऊपर चढ़ गया और घोंसले में मौजूद सभी बच्चों को खा गया।

अपने बच्चों के टूटे पंख देखकर कौवी जोर-जोर से रोने लगी। कौआ भी बहुत दुखी हुआ। तब उसने कहा, “संकट के समय बुद्धिमान मित्र ही काम आते हैं। चलो, अपनी मित्र लोमड़ी से सलाह लेते हैं।”

दोनों लोमड़ी के पास पहुंचे और उसे सारी बात बताई। लोमड़ी ने कुछ देर सोचकर कहा, “तुम्हें यह पेड़ छोड़ने की जरूरत नहीं है। मैं तुम्हें ऐसी तरकीब बताती हूं जिससे सर्प हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।”

लोमड़ी ने अपनी योजना कौए और कव्वी को समझाई। योजना सुनकर दोनों बहुत खुश हुए और अगले ही दिन उसे पूरा करने की तैयारी करने लगे।

हर मंगलवार को उस प्रदेश की राजकुमारी अपनी सहेलियों के साथ पास के सुंदर सरोवर में जल-क्रीड़ा करने आती थी। उनके साथ सैनिक और अंगरक्षक भी रहते थे। उस दिन भी राजकुमारी अपनी सहेलियों के साथ सरोवर पर आई। सभी ने अपने कपड़े और आभूषण किनारे उतार दिए और पानी में उतर गईं।

उसी समय योजना के अनुसार कौआ उड़ता हुआ वहां पहुंचा। उसकी नजर राजकुमारी के बहुमूल्य हीरे और मोतियों के हार पर पड़ी। तभी कव्वी जोर-जोर से “कांव-कांव” करने लगी ताकि सबका ध्यान उसकी ओर चला जाए। जैसे ही सबकी नजर कौओं पर गई, कौआ झपट्टा मारकर राजकुमारी का हार अपनी चोंच में दबाकर उड़ गया।

राजकुमारी की सहेलियां चीख उठीं, “देखो! कौआ राजकुमारी का हार लेकर भाग रहा है!”

सैनिक तुरंत उसके पीछे दौड़ पड़े। कौआ जानबूझकर धीरे-धीरे उड़ता रहा ताकि सैनिक उसका पीछा करते रहें। वह उन्हें सीधे उसी बरगद के पेड़ तक ले आया, जहां सर्प रहता था।

जब सैनिक बहुत पास आ गए, तब कौए ने हार इस तरह गिराया कि वह सीधे सर्प की खोह में जा गिरा।

सैनिक दौड़कर खोह के पास पहुंचे। उनके सरदार ने भीतर झांककर देखा तो वहां हार के पास एक बड़ा काला नाग कुंडली मारे बैठा था। वह जोर से चिल्लाया, “सावधान! अंदर सांप है!”

सरदार ने तुरंत अपना भाला खोह के भीतर घोंप दिया। घायल सर्प फुफकारता हुआ बाहर निकला, लेकिन बाहर आते ही सैनिकों ने उस पर कई भाले बरसाए और उसे टुकड़े-टुकड़े कर डाला।

इस प्रकार कौआ और कव्वी ने अपनी बुद्धि और सूझ-बूझ से अपने भयंकर शत्रु का अंत कर दिया और फिर अपने परिवार के साथ सुखपूर्वक रहने लगे।

नैतिक शिक्षा : सूझ-बूझ और बुद्धिमानी से बड़े से बड़े संकट और शक्तिशाली शत्रु को भी हराया जा सकता है।

📖 अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो पंचतंत्र की अन्य ज्ञानवर्धक और नैतिक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।

पंचतंत्र भारत की प्राचीन और प्रसिद्ध नीति कथाओं का संग्रह है, जिन्हें आचार्य विष्णु शर्मा द्वारा रचित माना जाता है। इन कहानियों के माध्यम से बुद्धिमानी, मित्रता, नीति, व्यवहार और जीवन की महत्वपूर्ण सीख सरल और रोचक तरीके से दी जाती है। आज भी पंचतंत्र की कथाएँ बच्चों और बड़ों दोनों के बीच समान रूप से लोकप्रिय हैं क्योंकि हर कहानी अपने भीतर एक गहरी नैतिक शिक्षा छुपाए होती है।

✍️ लेखक / मूल रचनाकार: आचार्य विष्णु शर्मा
📖 प्रस्तुति: Saying Central Team

आपको यह कहानी पसंद आई?

इसे रेट करने के लिए किसी स्टार पर क्लिक करें!

औसत श्रेणी 0 / 5. मतों की गिनती: 0

अभी तक कोई वोट नहीं! इस पोस्ट को रेटिंग देने वाले पहले व्यक्ति बनें।

Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

QUOTE OF THE DAY

RECENT STORIES

SHORT STORIES

FEATURED STORIES

CATEGORIES