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महाभारत दुर्योधन की रक्षा और पाण्डवों की महानता

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महाभारत: वनवास के कठिन वर्षों में पाण्डव अनेक वन, पर्वत और तीर्थों में भटकते हुए अपना समय व्यतीत कर रहे थे। गन्धमादन पर्वत पर कुबेर के दिव्य महल में कुछ समय बिताने के बाद वे वहाँ से आगे बढ़े और अनेक आश्रमों में ऋषियों-मुनियों का सत्संग प्राप्त करते हुए अंततः द्वैतवन पहुँचे। अब उनके वनवास के ग्यारह वर्ष पूर्ण हो चुके थे। कठिन परिस्थितियों में भी पाण्डव धर्म, संयम और पराक्रम का पालन कर रहे थे।

वे जहाँ भी जाते, वहाँ दुष्टों का दमन करते और साधु-संतों की रक्षा करते। दूसरी ओर हस्तिनापुर में बैठे दुर्योधन और उसके साथी अभी भी पाण्डवों के प्रति द्वेष और ईर्ष्या से भरे हुए थे।

जब दुर्योधन को यह समाचार मिला कि पाण्डव द्वैतवन में रह रहे हैं, तब उसके मन में फिर से उन्हें अपमानित करने और कष्ट पहुँचाने की योजना उत्पन्न हुई। उसके साथ दुःशासन, शकुनि और कर्ण जैसे लोग भी थे, जो हमेशा उसके दुष्ट विचारों को बढ़ावा देते थे।

उन्हीं दिनों कौरवों की विशाल गौ-सम्पत्ति भी द्वैतवन के आसपास चर रही थी। दुर्योधन ने उसी को बहाना बनाकर अपने पिता धृतराष्ट्र से वहाँ जाने की अनुमति ले ली। भीतर ही भीतर उसका उद्देश्य केवल पाण्डवों को उनके दुःख और निर्धनता का अहसास कराकर उनका उपहास उड़ाना था। इसलिए वह अपनी विशाल सेना, सेवकों, वैभवशाली तंबुओं और बहुमूल्य वस्त्राभूषणों से सजी राजमहिलाओं को साथ लेकर द्वैतवन पहुँचा।

द्वैतवन में पहुँचकर दुर्योधन ने अत्यंत राजसी ठाट-बाट के साथ अपना डेरा डलवाया। वह चाहता था कि पाण्डव उसके वैभव को देखकर दुखी और अपमानित महसूस करें। एक दिन वह अपनी मण्डली और राजमहिलाओं के साथ वन के एक अत्यंत सुंदर सरोवर में जलविहार करने पहुँचा।

किन्तु उस समय उस सरोवर में गन्धर्वराज चित्ररथ अपनी पत्नियों के साथ जलक्रीड़ा कर रहे थे। चित्ररथ के सेवकों ने विनम्रता से दुर्योधन को रोकते हुए कहा कि जब तक गन्धर्वराज वहाँ उपस्थित हैं, तब तक कोई अन्य उस सरोवर में प्रवेश नहीं कर सकता।

यह सुनकर दुर्योधन का अहंकार भड़क उठा। उसने क्रोध में भरकर कहा कि वह हस्तिनापुर का युवराज है और यह सरोवर उसके राज्य की सीमा में आता है। उसने आदेश दिया कि चित्ररथ तुरंत वहाँ से बाहर निकल जाए। जब चित्ररथ तक यह संदेश पहुँचा, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे।

उन्होंने दुर्योधन के घमंड को दंड देने का निश्चय कर लिया। देखते ही देखते दोनों पक्षों में भयंकर युद्ध छिड़ गया। प्रारंभ में दुर्योधन की सेना ने कुछ प्रतिरोध किया, लेकिन गन्धर्वों की दिव्य शक्ति और युद्धकौशल के सामने वे टिक नहीं सके। धीरे-धीरे कौरव सेना भयभीत होकर युद्धभूमि छोड़कर भागने लगी।

अंततः दुर्योधन, उसके भाई और साथ आई हुई राजमहिलाएँ गन्धर्वराज चित्ररथ द्वारा बंदी बना ली गईं। जो सैनिक किसी प्रकार प्राण बचाकर भाग निकले थे, वे सहायता के लिए सीधे पाण्डवों के पास पहुँचे। उन्होंने युधिष्ठिर से विनती की कि वे दुर्योधन और राजमहिलाओं को गन्धर्वों की कैद से मुक्त कराएँ।

यह समाचार सुनकर भीमसेन अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने हँसते हुए युधिष्ठिर से कहा कि दुर्योधन तो यहाँ पाण्डवों का उपहास उड़ाने आया था, लेकिन स्वयं अपमानित हो गया। भीम ने कहा कि गन्धर्वों ने वही किया है जो दुर्योधन के साथ होना चाहिए था, इसलिए उसे छुड़ाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

किन्तु धर्मराज युधिष्ठिर का हृदय धर्म और करुणा से भरा हुआ था। उन्होंने भीमसेन को समझाते हुए कहा कि शरण में आए व्यक्ति की रक्षा करना क्षत्रिय धर्म है। उन्होंने कहा कि चाहे दुर्योधन कितना भी दुष्ट क्यों न हो, फिर भी वह उनका भाई है।

साथ ही उसके साथ जो राजमहिलाएँ बंदी बनाई गई हैं, वे भी कुरुवंश की स्त्रियाँ हैं। यदि उनका अपमान होगा, तो पूरे कुल की प्रतिष्ठा धूमिल होगी। इसलिए उनका कर्तव्य है कि वे दुर्योधन की सहायता करें। युधिष्ठिर के इन उदार और धर्मयुक्त वचनों को सुनकर भीम और अर्जुन शांत हो गए और अपने बड़े भाई की आज्ञा का पालन करने के लिए तैयार हो गए।

भीमसेन और अर्जुन तुरंत युद्धभूमि की ओर चले। वहाँ पहुँचकर उन्होंने गन्धर्वराज चित्ररथ को युद्ध के लिए ललकारा। किन्तु अर्जुन को देखते ही चित्ररथ मुस्कुरा उठे। वे अर्जुन के मित्र थे और उन्हें वास्तविक परिस्थिति का ज्ञान था।

उन्होंने अर्जुन से कहा कि दुर्योधन वास्तव में पाण्डवों को हानि पहुँचाने के उद्देश्य से यहाँ आया था। देवराज इन्द्र को इस योजना का पता चल चुका था, इसलिए उन्होंने चित्ररथ को दुर्योधन को दंड देने के लिए भेजा था। चित्ररथ ने कहा कि नीति के अनुसार ऐसे दुष्ट व्यक्ति को दंड मिलना ही चाहिए, लेकिन यदि धर्मराज युधिष्ठिर की आज्ञा से अर्जुन उसे मुक्त कराना चाहते हैं, तो वे तुरंत उसे छोड़ देंगे।

इतना कहकर चित्ररथ ने दुर्योधन और उसके साथ बंदी बनाई गई सभी राजमहिलाओं को मुक्त कर दिया। दुर्योधन अत्यंत लज्जित और अपमानित महसूस कर रहा था। जिस पाण्डवों को वह अपमानित करने आया था, उन्हीं पाण्डवों ने उसकी रक्षा की थी।

वह सिर झुकाए हुए धर्मराज युधिष्ठिर के पास पहुँचा और उन्हें प्रणाम किया। उसके भीतर ग्लानि और शर्म का भारी बोझ था। बिना कुछ कहे वह अपने नगर की ओर लौट गया। उस दिन संसार ने देखा कि पाण्डव केवल महान योद्धा ही नहीं, बल्कि धर्म, क्षमा और उदारता की सच्ची प्रतिमूर्ति भी थे।

महाभारत जयद्रथ की दुर्गति और शिव से प्राप्त वरदान

वनवास के दिनों में पाण्डव अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए वन-वन भटक रहे थे। एक दिन पाँचों पाण्डव किसी आवश्यक कार्य से आश्रम से बाहर गए हुए थे। उस समय आश्रम में केवल द्रौपदी, उनकी एक दासी और कुलपुरोहित धौम्य ऋषि उपस्थित थे।

वन का वातावरण शांत था और द्रौपदी अपने दैनिक कार्यों में लगी हुई थीं। उसी समय संयोगवश सिन्धु देश का राजा जयद्रथ अपनी सेना और मित्रों के साथ वहाँ से गुजर रहा था। वह शाल्व देश किसी राजकुमारी से विवाह करने जा रहा था, किन्तु जैसे ही उसकी दृष्टि आश्रम के द्वार पर खड़ी द्रौपदी पर पड़ी, वह उनके अनुपम सौंदर्य पर मोहित हो गया।

जयद्रथ का मन वासना और अहंकार से भर उठा। उसने अपने मित्र कोटिकास्य को द्रौपदी का परिचय जानने के लिए भेजा। कोटिकास्य द्रौपदी के समीप पहुँचा और विनम्रता का दिखावा करते हुए पूछने लगा कि वे कौन हैं।

द्रौपदी ने शांत स्वर में उत्तर दिया कि वे पाँचों पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी हैं और उनके पति शीघ्र ही लौटने वाले हैं। उन्होंने अतिथि धर्म निभाते हुए यह भी कहा कि यदि वे चाहें तो बाहर विश्राम करें, तब तक उनके लिए भोजन की व्यवस्था की जाएगी। द्रौपदी का यह शालीन और आदरपूर्ण व्यवहार भी जयद्रथ के मन में उठी दुष्ट इच्छा को रोक न सका।

जब कोटिकास्य ने लौटकर जयद्रथ को बताया कि वह स्त्री कोई साधारण स्त्री नहीं, बल्कि पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी हैं, तब भी जयद्रथ का मोह समाप्त नहीं हुआ। वह स्वयं द्रौपदी के पास पहुँचा और अभिमान से बोला कि पाण्डव वन-वन भटकने वाले निर्धन और दुःखी लोग हैं, जो उन्हें किसी प्रकार का सुख नहीं दे सकते। उसने द्रौपदी को अपने साथ चलकर सिन्धु और सौबीर देश की रानी बनने का प्रस्ताव दिया।

जयद्रथ के ये अपमानजनक और अधर्मपूर्ण वचन सुनकर द्रौपदी क्रोध से भर उठीं। उन्होंने उसे कायर, पापी और कुलकलंक कहकर धिक्कारा तथा चेतावनी दी कि पाण्डव लौटकर उसे कभी जीवित नहीं छोड़ेंगे।

किन्तु काम और अहंकार में अंधे जयद्रथ पर द्रौपदी की बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उसने बलपूर्वक द्रौपदी को पकड़ लिया और उन्हें जबरदस्ती अपने रथ में बैठा लिया। जब धौम्य ऋषि द्रौपदी की रक्षा के लिए आगे आए, तब जयद्रथ ने उन्हें भी धक्का देकर भूमि पर गिरा दिया और तेजी से रथ हाँकते हुए वहाँ से भाग निकला।

रथ में बैठी द्रौपदी विलाप कर रही थीं और धौम्य ऋषि पाण्डवों को पुकारते हुए रथ के पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। वन का वह दृश्य अत्यंत करुण और भयावह हो उठा था।

कुछ समय बाद जब पाण्डव लौटे, तब द्रौपदी की दासी रोती हुई उनके पास आई और उसने सारी घटना बता दी। यह समाचार सुनते ही पाँचों पाण्डव क्रोध से जल उठे। भीमसेन की आँखों में अग्नि धधकने लगी और अर्जुन ने तुरंत अपना गांडीव उठा लिया। सभी पाण्डव जयद्रथ का पीछा करने निकल पड़े।

शीघ्र ही उन्होंने उसकी सेना को चारों ओर से घेर लिया। इसके बाद भयंकर युद्ध आरंभ हो गया। पाण्डवों के प्रचंड पराक्रम के सामने जयद्रथ की सेना टिक नहीं सकी। उसके अनेक भाई और मित्र युद्धभूमि में मारे गए तथा शेष सैनिक भयभीत होकर भाग खड़े हुए।

युद्ध के बीच सहदेव ने द्रौपदी को सुरक्षित छुड़ा लिया और जयद्रथ की सेना में भगदड़ मच गई। अपनी सेना को पराजित होते देखकर जयद्रथ स्वयं भी प्राण बचाकर भागने लगा। तब भीम और अर्जुन उसके पीछे दौड़े।

कुछ ही दूरी पर उन्होंने जयद्रथ को पकड़ लिया। भीमसेन ने उसकी चोटी पकड़कर उसे भूमि पर पटक दिया और क्रोध में भरकर उसे लात-घूँसों से मारने लगे। जयद्रथ की दशा दयनीय हो गई। वह पीड़ा से चिल्ला उठा, किन्तु भीम का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। वे उसी समय उसका वध कर देना चाहते थे।

तभी अर्जुन ने भीमसेन को रोकते हुए कहा कि जयद्रथ को मारने का निर्णय धर्मराज युधिष्ठिर करेंगे। अर्जुन की बात मानकर भीम ने उसे जीवित छोड़ दिया, लेकिन उसे कठोर अपमानित करने का निश्चय किया। उन्होंने अपने अर्द्धचन्द्राकार बाणों से जयद्रथ का सिर मुँडवा दिया और केवल पाँच छोटी-छोटी चोटियाँ छोड़ दीं।

फिर उसे बाँधकर युधिष्ठिर के सामने लाया गया। लज्जा और भय से काँपता हुआ जयद्रथ सिर झुकाए खड़ा रहा। धर्मराज युधिष्ठिर ने उसे कठोर शब्दों में धिक्कारा और कहा कि वे चाहें तो उसका वध कर सकते हैं, किन्तु अपनी बहन दुःशला के वैधव्य का विचार करके उसे जीवनदान दे रहे हैं।

युधिष्ठिर के इन वचनों को सुनकर जयद्रथ अत्यंत अपमानित महसूस करने लगा। उसका अभिमान चूर-चूर हो चुका था। वह सिर झुकाए वहाँ से चला गया, किन्तु उसके मन में पाण्डवों के प्रति प्रतिशोध की अग्नि जलने लगी। वह वन में जाकर भगवान शिव की कठोर तपस्या करने लगा।

उसने वर्षों तक कठिन व्रत और उपवास किए। अंततः उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर उसके सामने प्रकट हुए और उससे वर माँगने को कहा।

जयद्रथ ने अहंकार और प्रतिशोध से भरे स्वर में कहा कि वह युद्ध में पाँचों पाण्डवों को पराजित करने का वरदान चाहता है। भगवान शिव ने उसे समझाया कि पाण्डव साधारण मनुष्य नहीं हैं। श्रीकृष्ण स्वयं नारायण के अवतार हैं और अर्जुन नर के रूप में उनके साथ हैं। उन्होंने कहा कि पाण्डवों को पूर्णतः पराजित करना असंभव है।

फिर भी अपनी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने जयद्रथ को यह वरदान दिया कि वह अर्जुन की अनुपस्थिति में एक दिन के लिए शेष चार पाण्डवों को युद्धभूमि में रोक सकेगा। यही वरदान आगे चलकर महाभारत युद्ध में अभिमन्यु की मृत्यु का कारण बना।

भगवान शंकर के अंतर्ध्यान होने के बाद जयद्रथ अपने राज्य लौट आया। उसके मन में अब भी पाण्डवों के प्रति द्वेष और प्रतिशोध की ज्वाला धधक रही थी। उसे यह ज्ञात नहीं था कि भविष्य में यही अहंकार और अधर्म अंततः उसकी विनाशकारी मृत्यु का कारण बनेगा।

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महाभारत भारतीय संस्कृति का महान महाकाव्य है। इसमें कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध, धर्म-अधर्म, सत्य, कर्तव्य और मानव जीवन के मूल्यों का वर्णन किया गया है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित यह ग्रंथ भारतीय इतिहास, दर्शन और नैतिक शिक्षा का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

 लेखक / मूल रचनाकार: वेद व्यास
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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