काव्या: अधूरी मोहब्बत और बारिश की कहानी

“जब रिश्तों की आवाज़ धीमी पड़ गई”

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भाग एक

शाम की बारिश उस पुराने मकान की दीवारों से टकराकर एक अजीब सी आवाज़ पैदा कर रही थी, जैसे कोई बीती हुई याद बार-बार दरवाज़ा खटखटा रही हो और अंदर आने की जिद कर रही हो।

आरव खिड़की के पास खड़ा दूर सड़क पर गिरती बारिश को देख रहा था, लेकिन उसकी आँखें पानी की बूंदों को नहीं बल्कि उस रास्ते को ढूंढ रही थीं जहाँ से कभी काव्या उसके लिए मुस्कुराते हुए आया करती थी।

उसके हाथ में अब भी वही पुरानी घड़ी थी जो काव्या ने उसे उनके दूसरे सालगिरह पर दी थी, और हर टिक-टिक उसे यह एहसास दिला रही थी कि कुछ रिश्ते खत्म होने के बाद भी समय से बाहर नहीं निकल पाते।

नीचे रसोई में उसकी माँ बर्तन समेटते हुए बार-बार सीढ़ियों की तरफ देख रही थीं, क्योंकि उन्हें पिछले छह महीनों से अपने बेटे की खामोशी डराने लगी थी और वह समझ नहीं पा रही थीं कि आखिर उसके अंदर इतना सन्नाटा क्यों भर गया है।

शारदा जी को हमेशा लगता था कि प्यार इंसान को मजबूत बनाता है, लेकिन पहली बार उन्होंने अपने बेटे को टूटकर जीते हुए देखा था और उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि किसी के चले जाने से कोई इतना बदल कैसे सकता है।

उन्होंने कई बार आरव से बात करने की कोशिश की, लेकिन हर बार वह मुस्कुराकर इतना ही कह देता कि सब ठीक है, जबकि उसकी आँखों में साफ दिखाई देता था कि कुछ भी ठीक नहीं बचा है।

काव्या उस शहर से जा चुकी थी जहाँ उसने अपने सबसे खूबसूरत और सबसे दर्दनाक दिन बिताए थे, लेकिन उसके जाने के बाद भी उसकी मौजूदगी हर कोने में रह गई थी और यही बात आरव को सबसे ज्यादा तोड़ रही थी।

घर की छत पर रखे पौधे अब भी उसी तरह लगे थे जैसे काव्या उन्हें सजाया करती थी, और बरामदे की पीली दीवार पर अब भी उसकी बनाई छोटी सी पेंटिंग टंगी थी जिसे हटाने की हिम्मत किसी में नहीं हुई।

अनन्या कई बार सोचती थी कि अगर कोई इंसान चला जाए तो उसकी यादें भी साथ चली जानी चाहिए, लेकिन शायद कुछ लोग अपने पीछे इतना कुछ छोड़ जाते हैं कि उनसे अलग होना कभी पूरा हो ही नहीं पाता।

तीन साल पहले जब आरव पहली बार काव्या से मिला था तब उसे यह बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि यह लड़की एक दिन उसकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा और सबसे गहरा जख्म दोनों बन जाएगी।

वह मुलाकात किसी फिल्मी कहानी जैसी नहीं थी, न कोई टकराव हुआ था और न ही किसी गाने जैसा माहौल बना था, बल्कि वह बस एक साधारण सी दोपहर थी जहाँ दो अनजान लोग एक लाइब्रेरी की खामोशी में एक ही किताब तक पहुँचने की कोशिश कर रहे थे।

काव्या ने मुस्कुराकर किताब उसकी तरफ बढ़ा दी थी और उसी पल आरव को पहली बार महसूस हुआ था कि कुछ लोग बिना किसी कोशिश के भी दिल के बहुत करीब लगने लगते हैं।

उनकी दोस्ती धीरे-धीरे शुरू हुई थी, लेकिन उसके अंदर एक अजीब सी सच्चाई थी जो आजकल के रिश्तों में कम ही दिखाई देती है क्योंकि दोनों एक-दूसरे को बदलना नहीं चाहते थे बल्कि समझना चाहते थे।

काव्या घंटों आरव की बातें सुनती रहती थी, यहाँ तक कि उसकी चुप्पियों को भी समझने लगी थी और यही बात आरव को उसके और करीब ले आई थी क्योंकि उसने पहली बार महसूस किया था कि कोई बिना सवाल पूछे भी उसे पढ़ सकता है।

आरव भी उसके हर छोटे सपने को गंभीरता से सुनता था, चाहे वह अपना खुद का डिजाइन स्टूडियो खोलने की बात हो या फिर किसी पहाड़ी शहर में छोटा सा घर बनाने की ख्वाहिश।

धीरे-धीरे काव्या उस घर का हिस्सा बन गई जहाँ पहले सिर्फ औपचारिक बातें होती थीं और जहाँ हँसी अब बहुत कम सुनाई देती थी।

शारदा जी को काव्या पसंद थी क्योंकि वह घर में आते ही सबके साथ ऐसे घुल जाती थी जैसे सालों से उस परिवार का हिस्सा हो, जबकि रघुवीर जी उसकी आज़ाद सोच से थोड़ा असहज महसूस करते थे।

उन्हें हमेशा लगता था कि ज्यादा सपने देखने वाली लड़कियाँ घर नहीं संभाल पातीं, और यही सोच धीरे-धीरे उस रिश्ते के बीच एक अदृश्य दीवार बनाती चली गई।

एक रात खाने की मेज पर जब काव्या ने अपने मुंबई जाने की इच्छा जताई ताकि वह एक बड़े डिजाइन फर्म में काम कर सके, तब पहली बार उस घर की हवा अचानक भारी हो गई थी।

रघुवीर जी ने बहुत शांत आवाज़ में कहा था कि शादी के बाद लड़कियों को इतनी दूर नौकरी करने की जरूरत नहीं पड़ती, और उस एक वाक्य ने काव्या की आँखों की चमक जैसे तुरंत कम कर दी थी।

आरव उस वक्त चुप बैठा रहा क्योंकि वह अपने पिता के सामने कभी खुलकर बोल नहीं पाया था, लेकिन उसकी वही चुप्पी आगे चलकर उनके रिश्ते की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई।

उस रात छत पर खड़ी काव्या काफी देर तक बारिश देखती रही थी और आरव उसके पास जाकर भी कुछ कह नहीं पा रहा था क्योंकि उसके अंदर हमेशा दो हिस्से लड़ते रहते थे।

एक हिस्सा चाहता था कि वह अपने प्यार के लिए पूरी दुनिया से लड़ जाए, जबकि दूसरा हिस्सा उसे यह याद दिलाता रहता था कि उसने अपने पिता की आवाज़ के खिलाफ कभी कुछ नहीं कहा।

काव्या ने आखिरकार उससे सिर्फ एक सवाल पूछा था कि अगर कभी उसे और उसके परिवार को चुनने की नौबत आई तो वह किसका साथ देगा, और आरव उस सवाल का जवाब नहीं दे पाया था।

कई रिश्ते लड़ाई से नहीं टूटते बल्कि अधूरे जवाबों से खत्म हो जाते हैं, और शायद वही उनके साथ भी हो रहा था क्योंकि दोनों एक-दूसरे से प्यार तो बहुत करते थे लेकिन एक-दूसरे की दुनिया में फिट नहीं हो पा रहे थे।

काव्या को हमेशा लगता था कि प्यार इंसान को आज़ाद करता है, जबकि आरव के लिए प्यार का मतलब किसी को खोने के डर के साथ जीना था और यही फर्क धीरे-धीरे उनके बीच दूरी बढ़ाता गया।

अनन्या कई बार दोनों को समझाने की कोशिश करती थी, लेकिन कुछ रिश्तों के घाव बाहर से नहीं दिखते और इसलिए उन्हें कोई और भर भी नहीं सकता।

समय बीतता गया और काव्या का मुंबई जाने का सपना अब सिर्फ एक इच्छा नहीं बल्कि उसके करियर का सबसे बड़ा मौका बन चुका था, क्योंकि उसे देश की एक बड़ी कंपनी से ऑफर मिला था।

वह खुश थी लेकिन उसकी खुशी के अंदर डर भी छुपा था, क्योंकि उसे लगने लगा था कि शायद इस फैसले के बाद उसका रिश्ता बच नहीं पाएगा और वह किसी ऐसे मोड़ पर खड़ी थी जहाँ दोनों रास्ते उसे अधूरा कर रहे थे।

उसने चाहा था कि आरव एक बार उससे कह दे कि वह उसके साथ है, लेकिन हर बार आरव सिर्फ इतना कहता कि थोड़ा समय दो सब ठीक हो जाएगा।

कभी-कभी “सब ठीक हो जाएगा” दुनिया का सबसे कमजोर वादा होता है, क्योंकि उसमें न कोई फैसला होता है और न ही कोई हिम्मत, बस उम्मीद का एक धुंधला सा सहारा होता है।

काव्या को धीरे-धीरे समझ आने लगा था कि आरव उससे प्यार तो करता है लेकिन उसके लिए खड़ा होने की ताकत उसके अंदर नहीं है, और यही एहसास उसे अंदर से तोड़ने लगा।

उसे आरव से शिकायत कम थी, दर्द ज्यादा था क्योंकि वह जानती थी कि वह बुरा इंसान नहीं बल्कि बहुत डरा हुआ इंसान है।

एक दिन काव्या ने आरव को अपने नए ऑफिस की तस्वीरें दिखाईं और उत्साह से बताया कि मुंबई में उसे समुद्र के पास छोटा सा अपार्टमेंट भी मिल गया है।

आरव मुस्कुराया जरूर, लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची क्योंकि उसे लग रहा था कि काव्या जितनी तेजी से अपने सपनों की तरफ बढ़ रही है वह उतनी ही तेजी से उससे दूर जा रही है।

उस रात उसने पहली बार अपने कमरे में अकेले बैठकर रोया था, लेकिन फिर भी अगले दिन वह काव्या से कुछ कह नहीं पाया क्योंकि उसकी आदत हमेशा अपने दर्द को छुपाने की रही थी।

मुंबई जाने से दो दिन पहले काव्या आखिरी बार उस घर में आई थी और उसने सबके लिए अपने हाथों से खाना बनाया था, जैसे वह उस घर की हर याद को अपने अंदर समेट लेना चाहती हो।

शारदा जी उसकी आँखों की उदासी समझ रही थीं, लेकिन वह खुद भी बेबस थीं क्योंकि इस घर में फैसले हमेशा भावनाओं से नहीं बल्कि परंपराओं से लिए जाते थे।

रघुवीर जी ने सामान्य व्यवहार करने की कोशिश की, मगर उनके शब्दों में अब भी वही कठोरता थी जिसने काव्या को हमेशा यह महसूस कराया कि वह इस परिवार में पूरी तरह स्वीकार नहीं की गई।

रात के खाने के बाद काव्या बरामदे में बैठी थी और हल्की हवा उसके बालों को बार-बार चेहरे पर ला रही थी, लेकिन उसने उन्हें हटाने की कोशिश भी नहीं की क्योंकि उसका ध्यान कहीं और था।

आरव उसके सामने बैठा था, मगर दोनों के बीच इतनी खामोशी थी कि बारिश की बूंदों की आवाज़ भी तेज लग रही थी और यही खामोशी उनके रिश्ते का सबसे सच्चा चेहरा बन चुकी थी।

बहुत देर बाद काव्या ने धीरे से कहा कि कुछ रिश्ते गलत नहीं होते, बस सही समय और सही साहस उन्हें कभी मिल नहीं पाता।

आरव ने उस वक्त उसका हाथ पकड़ लिया था, जैसे वह सिर्फ उस एक स्पर्श से सब कुछ रोक लेना चाहता हो, लेकिन काव्या ने पहली बार उसका हाथ धीरे से छुड़ा दिया था।

उसकी आँखों में आँसू थे लेकिन आवाज़ अब भी शांत थी, क्योंकि कुछ लोग रोते हुए भी टूटते नहीं बल्कि फैसला कर लेते हैं और उसी पल आरव को समझ आ गया था कि वह उसे खो रहा है।

काव्या ने उससे कहा कि वह ऐसे रिश्ते में नहीं रह सकती जहाँ हर सपना किसी और की अनुमति पर टिका हो, क्योंकि प्यार अगर सांस लेने की जगह न दे तो धीरे-धीरे दम घुटने लगता है।

उस रात पहली बार आरव ने अपने पिता से बहस की थी और उनसे कहा था कि उन्होंने हमेशा रिश्तों को नियमों की तरह देखा है, इंसानों की तरह नहीं।

रघुवीर जी को अपने बेटे की आवाज़ में गुस्से से ज्यादा दर्द सुनाई दिया था, लेकिन वर्षों से बनी उनकी कठोरता इतनी जल्दी टूटने वाली नहीं थी और उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि परिवार समझौते से चलते हैं।

आरव ने जवाब दिया कि समझौते और बलिदान में फर्क होता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी क्योंकि काव्या अपने फैसले के बहुत करीब पहुँच चुकी थी।

अगली सुबह स्टेशन पर हल्की धूप थी और भीड़ के बीच खड़ी काव्या बार-बार अपने आँसू रोकने की कोशिश कर रही थी, क्योंकि वह कमजोर दिखना नहीं चाहती थी।

अनन्या उसे गले लगाकर रो पड़ी थी, जबकि शारदा जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बस इतना कहा कि कभी-कभी सही होने के बावजूद इंसान खुश नहीं रह पाता।

आरव उसके सामने खड़ा था, मगर उसके पास कहने के लिए कोई ऐसा शब्द नहीं था जो उसे रोक सके क्योंकि शब्द तभी असर करते हैं जब उनके पीछे फैसला खड़ा हो।

ट्रेन चलने लगी तो काव्या ने खिड़की से बाहर देखते हुए आखिरी बार आरव को देखा था, और उसकी आँखों में प्यार अब भी था लेकिन उसके साथ एक गहरी थकान भी जुड़ चुकी थी।

उसने बहुत धीरे से कहा था कि अगर किसी रिश्ते को बचाने के लिए सिर्फ एक इंसान लड़ रहा हो तो वह रिश्ता धीरे-धीरे अकेला पड़ जाता है।

आरव कुछ कदम ट्रेन के साथ दौड़ा जरूर, लेकिन फिर वहीं रुक गया क्योंकि शायद वह जिंदगी भर उसी जगह खड़ा रहने वाला था जहाँ डर और प्यार एक-दूसरे से लड़ते रहते हैं।

काव्या के जाने के बाद घर वैसा ही था, लोग भी वही थे, दीवारें भी वही थीं, लेकिन फिर भी सब कुछ बदल गया था क्योंकि कुछ लोगों की मौजूदगी घर को सिर्फ भरा हुआ नहीं बल्कि जिंदा बनाती है।

आरव अब देर रात तक जागने लगा था और अक्सर छत पर बैठा आसमान देखता रहता था, जैसे उसे उम्मीद हो कि किसी दिन काव्या वापस लौट आएगी और सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाएगा।

लेकिन जिंदगी कभी पीछे नहीं लौटती, वह सिर्फ इंसानों को यादों के साथ आगे चलना सिखाती है चाहे वे तैयार हों या नहीं।

एक दिन अनन्या ने आरव के कमरे में जाकर देखा कि वह काव्या के भेजे पुराने वॉइस नोट्स सुन रहा था, और उसकी आँखों में वही खालीपन था जो किसी ऐसे इंसान में होता है जिसने खुद अपनी खुशी खो दी हो।

उसने अपने भाई से पूछा कि अगर वह काव्या से इतना प्यार करता था तो उसे रोक क्यों नहीं पाया, और इस सवाल ने आरव को अंदर तक हिला दिया क्योंकि यही सवाल वह खुद से हर रात पूछता था।

आरव ने बहुत देर चुप रहने के बाद बस इतना कहा कि कुछ लोग प्यार तो कर लेते हैं, लेकिन प्यार के लिए बदल नहीं पाते।

बरसात का मौसम खत्म होने लगा था, मगर उस घर के अंदर अब भी एक अधूरी बारिश अटकी हुई थी जो हर कमरे में महसूस होती थी।

शारदा जी कई बार सोचती थीं कि अगर उन्होंने पहले ही अपने पति का विरोध किया होता तो शायद आज उनका बेटा इतना अकेला नहीं होता, लेकिन पछतावे हमेशा सही समय निकल जाने के बाद आते हैं।

रघुवीर जी बाहर से सामान्य दिखते थे, मगर उन्होंने भी पहली बार महसूस किया था कि कभी-कभी अपनी शर्तों पर बचाया गया परिवार अंदर से खाली हो जाता है।

उधर मुंबई में काव्या अपनी नई जिंदगी शुरू करने की कोशिश कर रही थी और दिनभर काम में खुद को इतना व्यस्त रखती थी कि उसे सोचने का समय ही न मिले।

लेकिन रात होते ही उसका छोटा सा अपार्टमेंट उसे काटने दौड़ता था, क्योंकि कुछ शहर कितने भी बड़े क्यों न हों, किसी एक इंसान की कमी पूरी नहीं कर सकते।

वह कई बार फोन उठाकर आरव का नंबर देखती, मगर फिर खुद को रोक लेती क्योंकि वह जानती थी कि अधूरे रिश्तों को बार-बार छूने से दर्द और बढ़ता है।

एक रात मुंबई में तेज बारिश हो रही थी और उसी समय लखनऊ में भी मौसम अचानक बदल गया था, जैसे दोनों शहरों के बीच अब भी कोई अनदेखा रिश्ता बाकी हो।

आरव छत पर खड़ा भीग रहा था जबकि काव्या अपने कमरे की खिड़की से बारिश देख रही थी, और दोनों एक-दूसरे से दूर होकर भी उसी पल एक ही दर्द महसूस कर रहे थे।

शायद सच्चा प्यार खत्म नहीं होता, वह बस दो लोगों के बीच ऐसी खामोशी बन जाता है जिसे कोई तीसरा इंसान कभी समझ नहीं पाता।

भाग दो काव्या

मुंबई आए हुए काव्या को लगभग आठ महीने हो चुके थे, लेकिन इतने लंबे समय के बाद भी उसे कभी यह महसूस नहीं हुआ कि वह सच में उस शहर का हिस्सा बन पाई है।

दिनभर ऑफिस की मीटिंग्स, नए प्रोजेक्ट्स और लोगों की भीड़ उसके आसपास घूमती रहती थी, मगर रात होते ही उसके कमरे की खामोशी उसे फिर उसी पुराने घर की तरफ खींच ले जाती जहाँ उसने अपना सबसे सच्चा रिश्ता छोड़ा था।

कई बार उसे लगता था कि इंसान शहर बदल सकता है, आदतें बदल सकता है, यहाँ तक कि अपना पूरा जीवन भी बदल सकता है, लेकिन जिन लोगों ने कभी उसकी आत्मा को छुआ हो उन्हें भूलना शायद किसी भी इंसान के बस में नहीं होता।

उधर लखनऊ में आरव की जिंदगी धीरे-धीरे एक ऐसी दिनचर्या में बदल गई थी जिसमें वह सिर्फ सांस ले रहा था, जी नहीं रहा था।

उसने दोस्तों से मिलना लगभग बंद कर दिया था और अब वह अक्सर ऑफिस से लौटकर सीधे अपने कमरे में चला जाता, जैसे उसे दुनिया की हर आवाज़ से थकान होने लगी हो।

शारदा जी कई बार उसके कमरे के बाहर खड़ी होकर सोचती थीं कि एक माँ होने के बावजूद वह अपने बेटे के दर्द तक क्यों नहीं पहुँच पा रही हैं, क्योंकि कुछ टूटनें इतनी अंदर होती हैं कि उनका शोर बाहर तक नहीं आता।

एक शाम अनन्या ने आरव के कमरे की सफाई करते हुए उसकी अलमारी में एक छोटा सा डिब्बा देखा जिसके अंदर दर्जनों अधूरी चिट्ठियाँ रखी थीं।

हर चिट्ठी काव्या के नाम थी, लेकिन उनमें से एक भी कभी भेजी नहीं गई थी क्योंकि आरव हर बार लिखने के बाद डर जाता था कि कहीं उसकी मौजूदगी फिर से काव्या की जिंदगी को मुश्किल न बना दे।

अनन्या ने जब उनमें से एक चिट्ठी पढ़ी तो उसकी आँखें भर आईं, क्योंकि उसमें सिर्फ एक लाइन लिखी थी कि “मैंने तुम्हें कभी खोना नहीं चाहा था, बस अपने डर से बाहर निकल नहीं पाया।”

इसी बीच काव्या की जिंदगी में एक नया नाम आने लगा था — विराज मल्होत्रा।

विराज उसके ऑफिस का सीनियर आर्किटेक्ट था जो हमेशा बहुत सहज और खुशमिजाज दिखाई देता था, और शायद यही वजह थी कि ऑफिस के लोग उसकी तरफ जल्दी आकर्षित हो जाते थे।

वह काव्या का बहुत ख्याल रखने लगा था, लेकिन काव्या हर बार उसके करीब आने से खुद को रोक लेती क्योंकि उसका दिल अब भी उस रिश्ते की राख में कहीं दबा पड़ा था जिसे वह पीछे छोड़ आई थी।

एक दिन विराज ने काव्या से पूछा कि क्या वह अब भी किसी का इंतजार कर रही है, और यह सवाल सुनते ही काव्या कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप हो गई थी।

उसने मुस्कुराने की कोशिश जरूर की, लेकिन उसकी आँखों की नमी साफ बता रही थी कि कुछ रिश्ते खत्म होने के बाद भी इंसान के अंदर जिंदा रहते हैं।

विराज ने उससे आगे कुछ नहीं पूछा क्योंकि उसने महसूस कर लिया था कि काव्या उन लोगों में से है जो अपने दर्द को शब्दों में नहीं बल्कि चुप्पियों में छुपाते हैं।

उधर आरव और उसके पिता के बीच अब बातचीत लगभग खत्म हो चुकी थी, क्योंकि दोनों के बीच वही अधूरी लड़ाई अब भी जिंदा थी जिसने काव्या को उनसे दूर कर दिया था।

रघुवीर जी कई बार अपने बेटे को देखकर कुछ कहना चाहते थे, लेकिन उनका अहंकार हर बार उनके शब्दों से पहले खड़ा हो जाता और फिर घर में वही भारी खामोशी फैल जाती।

उन्हें पहली बार यह एहसास होने लगा था कि कठोर होना और मजबूत होना दो अलग बातें हैं, मगर शायद यह समझ उन्हें बहुत देर से आई थी।

एक रात अचानक शारदा जी की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा।

डॉक्टर ने बताया कि लगातार तनाव और कमजोरी की वजह से उनकी हालत खराब हुई है, और यह सुनते ही आरव खुद को दोष देने लगा क्योंकि उसे महसूस हुआ कि उसके टूटने का असर पूरे घर पर पड़ रहा है।

अस्पताल के कॉरिडोर में बैठे हुए उसने महीनों बाद पहली बार काव्या का नंबर डायल किया, लेकिन कॉल लगने से पहले ही उसने फोन काट दिया क्योंकि उसे लगा कि शायद अब उसे कोई हक नहीं बचा।

लेकिन किस्मत कभी-कभी इंसानों की हिम्मत से ज्यादा जिद्दी होती है।

अगली सुबह अनन्या ने बिना आरव को बताए काव्या को फोन कर दिया और सिर्फ इतना कहा कि “भाभी… भैया अब पहले जैसे नहीं रहे।”

फोन के दूसरी तरफ कुछ पल तक बिल्कुल सन्नाटा रहा, और फिर काव्या ने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा कि क्या आंटी ठीक हैं।

तीन दिन बाद अचानक आरव ने घर का दरवाजा खोला तो सामने काव्या खड़ी थी।

हल्के नीले सूट में, थकी हुई आँखों के साथ और चेहरे पर वही शांत उदासी लिए जिसे वह पिछले कई महीनों से अपने अंदर ढो रही थी।

उसे देखकर आरव कुछ सेकंड तक समझ ही नहीं पाया कि यह सच है या उसका कोई अधूरा सपना, क्योंकि उसने अपने मन में हजारों बार इस पल की कल्पना की थी लेकिन कभी यकीन नहीं किया था कि यह सच में होगा।

शारदा जी ने काव्या का हाथ पकड़ लिया और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे, क्योंकि उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि कुछ रिश्ते शादी के कागज़ों से नहीं बल्कि भावनाओं से परिवार बन जाते हैं।

काव्या ने उनकी देखभाल में खुद को पूरी तरह लगा दिया, जैसे पिछले महीनों की दूरी उसके व्यवहार में कभी आई ही न हो।

लेकिन उसके और आरव के बीच अब भी एक ऐसी दीवार खड़ी थी जिसे दोनों देख सकते थे, मगर कोई तोड़ नहीं पा रहा था।

उस रात छत पर फिर बारिश हो रही थी और वही पुरानी हवा दोनों के बीच बह रही थी, लेकिन इस बार उनके अंदर पहले जैसी उम्मीद नहीं थी।

आरव ने आखिरकार उससे पूछा कि क्या वह खुश है, और काव्या ने जवाब देने से पहले बहुत देर तक आसमान की तरफ देखा जैसे सही शब्द तलाश रही हो।

उसने कहा कि इंसान कभी पूरी तरह खुश या दुखी नहीं होता, वह बस जीना सीख लेता है और शायद उसने भी यही सीख लिया है।

आरव ने पहली बार उससे माफी मांगी और कहा कि वह उससे प्यार करता था लेकिन अपने डर से कभी बाहर नहीं निकल पाया।

उसकी आवाज़ काँप रही थी क्योंकि इतने महीनों बाद वह पहली बार अपने अंदर छुपे सच को बिना किसी बहाने के स्वीकार कर रहा था।

काव्या ने उसकी तरफ देखा जरूर, लेकिन उसके चेहरे पर अब वैसा दर्द नहीं था जैसा पहले हुआ करता था, क्योंकि समय इंसान को कमजोर नहीं बल्कि धीरे-धीरे सुन्न बना देता है।

उसने बहुत शांत आवाज़ में कहा कि प्यार सिर्फ महसूस करने से नहीं चलता, उसके लिए खड़े होना भी पड़ता है।

फिर उसने बताया कि जिस दिन वह स्टेशन से गई थी उस दिन उसने आखिरी बार उम्मीद की थी कि आरव उसे रोक लेगा, लेकिन जब वह नहीं आया तो उसके अंदर कुछ हमेशा के लिए टूट गया।

आरव यह सुनकर चुप रह गया क्योंकि उसे पहली बार समझ आया कि उसने सिर्फ एक लड़की नहीं बल्कि किसी का भरोसा खोया था।

अगले दिन रघुवीर जी ने पहली बार काव्या से अकेले बात की।

उन्होंने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा और फिर धीमी आवाज़ में स्वीकार किया कि शायद उन्होंने अपने बेटे को हमेशा इतना डराया कि वह कभी अपने दिल की बात कह ही नहीं पाया।

उनकी आँखों में पछतावा साफ दिखाई दे रहा था, लेकिन कुछ गलतियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें समझने तक इंसान बहुत कुछ खो चुका होता है।

काव्या ने उनसे कोई शिकायत नहीं की क्योंकि अब उसके अंदर लड़ने की ताकत खत्म हो चुकी थी।

उसने सिर्फ इतना कहा कि रिश्ते तब टूटते हैं जब लोग एक-दूसरे को सुनना बंद कर देते हैं, और इस घर में हर कोई सिर्फ खुद को सही साबित करने में लगा रहा।

रघुवीर जी उस दिन पहली बार खुद को हारता हुआ महसूस कर रहे थे क्योंकि उन्होंने अपने सिद्धांत बचा लिए थे, लेकिन अपने बेटे की मुस्कान खो दी थी।

कुछ दिनों बाद काव्या वापस मुंबई लौटने लगी।

इस बार स्टेशन पर वही लोग थे, वही प्लेटफॉर्म था, लेकिन माहौल पहले से भी ज्यादा भारी था क्योंकि अब सबको समझ आ चुका था कि कुछ बिछड़नें आखिरी होती हैं।

आरव उसके सामने खड़ा था और उसकी आँखों में अब रोक लेने की बेचैनी थी, मगर शायद समय उनके हाथों से बहुत आगे निकल चुका था।

ट्रेन आने से पहले काव्या ने अपने बैग से एक छोटा सा पैकेट निकाला और आरव को दे दिया।

उसके अंदर वही पुरानी घड़ी थी जो उसने कभी उसे गिफ्ट की थी, लेकिन इस बार उसके साथ एक छोटी सी चिट्ठी भी रखी थी।

चिट्ठी में लिखा था कि “कुछ लोग हमारी जिंदगी में हमेशा रहने के लिए नहीं आते, बल्कि हमें खुद से मिलवाने के लिए आते हैं।”

ट्रेन चलने लगी और इस बार आरव उसके पीछे नहीं भागा।

वह सिर्फ वहीं खड़ा उसे जाता हुआ देखता रहा, क्योंकि पहली बार उसने समझ लिया था कि प्यार किसी को पकड़कर रखने का नाम नहीं बल्कि उसे उसकी पूरी पहचान के साथ स्वीकार करने का नाम है।

काव्या ने खिड़की से बाहर देखते हुए हल्की सी मुस्कान दी, लेकिन उस मुस्कान में हमेशा के लिए बिछड़ जाने की थकान छुपी हुई थी।

मुंबई लौटने के बाद काव्या ने खुद को पूरी तरह अपने काम में डुबो दिया।

धीरे-धीरे उसने अपने डिजाइन स्टूडियो का सपना पूरा करना शुरू किया और कई सालों बाद उसे महसूस हुआ कि शायद टूटने के बाद भी जिंदगी खत्म नहीं होती।

लेकिन हर बारिश में वह कुछ पल के लिए जरूर रुक जाती, क्योंकि कुछ मौसम इंसानों के अंदर हमेशा अधूरे रह जाते हैं।

उधर आरव ने पहली बार अपने पिता के खिलाफ जाकर अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने शुरू किए।

उसने घर के पुराने हिस्से को एक छोटी सी लाइब्रेरी में बदल दिया क्योंकि उसे याद था कि उसकी और काव्या की पहली मुलाकात किताबों के बीच हुई थी।

शायद वह अपने टूटे हुए रिश्ते को वापस नहीं ला सकता था, लेकिन वह उससे मिली सीख को हमेशा जिंदा रखना चाहता था।

समय बीतता गया।

एक साल बाद अनन्या की शादी थी और पूरे घर में फिर से रौनक लौट आई थी, लेकिन उस खुशी के बीच भी कुछ खालीपन ऐसा था जिसे कोई भर नहीं पा रहा था।

शादी वाले दिन अचानक अनन्या ने दरवाजे की तरफ देखा और उसकी आँखें चमक उठीं, क्योंकि वहाँ काव्या खड़ी थी।

वह पहले से ज्यादा शांत लग रही थी, जैसे जिंदगी ने उसे बहुत कुछ सिखाकर थोड़ा मजबूत बना दिया हो।

आरव ने उसे देखा तो उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई, लेकिन इस बार उस मुस्कान में कोई उम्मीद नहीं थी बल्कि एक गहरा अपनापन था।

दोनों ने एक-दूसरे से सामान्य बातें कीं, जैसे दो लोग जिन्होंने एक-दूसरे को खोकर भी सम्मान देना नहीं छोड़ा हो।

रात में शादी की भीड़ से दूर दोनों बरामदे में खड़े थे जहाँ कभी उन्होंने साथ भविष्य के सपने देखे थे।

काव्या ने धीरे से कहा कि शायद अगर वे कुछ साल बाद मिले होते तो उनकी कहानी अलग होती।

आरव मुस्कुराया और बोला कि कुछ लोग हमारी जिंदगी में मंजिल बनकर नहीं बल्कि सफर बनकर आते हैं, और शायद वही उन्हें खास बनाता है।

बारिश फिर शुरू हो चुकी थी।

दोनों कुछ देर उसे देखते रहे और फिर बिना किसी वादे, बिना किसी उम्मीद और बिना किसी शिकायत के अलग दिशाओं में चल दिए।

क्योंकि कभी-कभी सबसे सच्चा प्यार वही होता है जो टूटने के बाद भी नफरत में नहीं बदलता, बल्कि इंसान को थोड़ा और गहरा इंसान बना देता है।

समाप्त 

एक वसीयत… और पूरा परिवार दुश्मन बन गया। पढ़िए  वसीयत

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