हितोपदेश

हितोपदेश विग्रह की कहानियाँ

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नील से रंगे हुए गीदड़ की कहानी

हितोपदेश : बहुत समय पहले एक घने वन में एक गीदड़ रहता था। वह अत्यंत चालाक था, लेकिन भोजन की तलाश में अक्सर जंगल छोड़कर नगर के आसपास भटकने चला जाता था। एक रात भोजन की खोज में घूमते-घूमते वह नगर के भीतर जा पहुँचा। वहाँ कुत्तों ने उसे देख लिया और जोर-जोर से भौंकते हुए उसके पीछे दौड़ पड़े। अपनी जान बचाने के लिए गीदड़ इधर-उधर भागने लगा। घबराहट में उसे कुछ दिखाई नहीं दिया और वह दौड़ते-दौड़ते एक रंगरेज के घर में रखे बड़े नील के हौद में जा गिरा।

हौद गहरा था और उसमें गहरा नीला रंग भरा हुआ था। गीदड़ पूरी तरह उस रंग में डूब गया। किसी प्रकार वह बाहर निकल तो आया, लेकिन रातभर डर के कारण वहीं छिपा रहा। सुबह होने पर रंगरेज के नौकरों ने उसे देखा। वे उसे मरा हुआ जानकर बाहर खींच लाए और नगर से दूर फेंक दिया। अवसर मिलते ही गीदड़ तुरंत उठकर जंगल की ओर भाग गया।

जब वह वन में पहुँचा और एक जलाशय में अपनी परछाई देखी, तो वह स्वयं चकित रह गया। उसका पूरा शरीर गहरे नीले रंग में रंग चुका था। ऐसा विचित्र रंग उसने पहले कभी किसी पशु पर नहीं देखा था। तभी उसके मन में एक चालाक विचार आया। उसने सोचा, “अब मेरा रूप सब जानवरों से अलग और अद्भुत हो गया है। यदि मैं बुद्धि से काम लूँ, तो पूरे जंगल का राजा बन सकता हूँ।”

यह सोचकर उसने जंगल के सभी पशुओं को अपने पास बुलवाया। जब सिंह, बाघ, भालू, हाथी, हिरण और दूसरे जानवरों ने उस विचित्र नीले प्राणी को देखा, तो वे भय और आश्चर्य से भर गए। किसी ने भी ऐसा जीव पहले कभी नहीं देखा था।

तब गीदड़ ने गंभीर स्वर बनाकर कहा, “हे वनवासियो! भयभीत मत हो। मुझे स्वयं वनदेवी ने इस जंगल का राजा बनाकर भेजा है। उन्होंने मुझे दिव्य रंगों से अभिषिक्त किया है और आदेश दिया है कि अब मैं तुम सबका शासन करूँ। इसलिए आज से तुम सबको मेरी आज्ञा का पालन करना होगा।”

उसका अनोखा रूप देखकर सभी पशु उसकी बातों पर विश्वास कर बैठे। उन्होंने उसे सचमुच कोई दिव्य प्राणी समझ लिया। सबने झुककर उसे प्रणाम किया और उसे अपना राजा स्वीकार कर लिया।

धीरे-धीरे वह गीदड़ पूरे जंगल का शासक बन बैठा। उसने सिंह और बाघ जैसे शक्तिशाली पशुओं को अपना मंत्री बना लिया। हाथी उसके सेवक बन गए और दूसरे जानवर उसकी सेवा करने लगे। अब उसे बिना मेहनत के उत्तम भोजन मिलने लगा और वह बड़े गर्व से रहने लगा।

लेकिन राजा बनते ही उसमें अहंकार आ गया। उसने सबसे पहले अपने ही जाति के गीदड़ों का अपमान करना शुरू कर दिया। जब भी कोई गीदड़ उसके पास आता, वह उसे तुच्छ समझकर दूर भगा देता। वह डरता था कि कहीं उसकी असलियत सबके सामने न आ जाए।

दूसरे गीदड़ यह सब देखकर दुखी और क्रोधित हुए। उनमें से एक बूढ़ा और बुद्धिमान गीदड़ बोला, “यह मूर्ख केवल रंग बदल जाने से स्वयं को राजा समझ बैठा है। इसने अपनी जाति और अपने साथियों का अपमान किया है। हमें इसकी सच्चाई सबके सामने लानी होगी। इसका असली स्वभाव कभी नहीं बदल सकता।”
फिर उसने एक योजना बनाई। उसने सब गीदड़ों से कहा कि संध्या के समय जब जंगल शांत हो जाए, तब सब एक साथ जोर-जोर से हुआँ-हुआँ करना। यदि यह सचमुच गीदड़ है, तो अपने स्वभाव के कारण स्वयं भी चिल्लाने लगेगा।

अगली संध्या को सभी गीदड़ एक साथ जोर-जोर से हुआँ-हुआँ करने लगे। वह आवाज सुनते ही नीला गीदड़ अपने स्वभाव पर नियंत्रण नहीं रख सका। वह भी उत्साह में भरकर जोर-जोर से गीदड़ों की तरह हुआँ-हुआँ करने लगा।

बस, उसी क्षण उसकी सच्चाई सबके सामने खुल गई। सिंह, बाघ और दूसरे पशु समझ गए कि यह कोई दिव्य प्राणी नहीं, बल्कि साधारण गीदड़ है जिसने छल से उन्हें मूर्ख बनाया था। वे सब अत्यंत क्रोधित हो उठे। फिर सभी पशुओं ने मिलकर उस धोखेबाज गीदड़ को मार डाला।

इस कथा से शिक्षा मिलती है कि बाहरी रूप बदल लेने से किसी का वास्तविक स्वभाव नहीं बदलता। छल और धोखे से प्राप्त सम्मान अधिक समय तक टिक नहीं सकता, क्योंकि एक न एक दिन सत्य अवश्य प्रकट हो जाता है।

राजकुमार वीरवर और उसके पुत्र के बलिदान की कहानी

बहुत समय पहले शूद्रक नाम का एक प्रतापी और न्यायप्रिय राजा राज्य करता था। उसका राज्य समृद्ध, व्यवस्थित और प्रजा सुखी थी। एक दिन उसके राजदरबार के द्वार पर एक तेजस्वी युवक आकर खड़ा हुआ। वह देखने में साहसी, बलवान और राजवंशीय प्रतीत होता था। उसने द्वारपाल से कहा, “मैं एक राजकुमार हूँ। मैं राजा की सेवा करना चाहता हूँ। कृपया मेरा परिचय महाराज से करा दीजिए।”
द्वारपाल उसे राजा शूद्रक के सामने ले गया। राजा ने उस युवक को देखकर पूछा, “तुम कौन हो और क्या चाहते हो?”

युवक ने विनम्रता से उत्तर दिया, “मेरा नाम वीरवर है। मैं आपकी सेवा में रहकर कार्य करना चाहता हूँ।”
राजा ने पूछा, “तुम्हें वेतन कितना चाहिए?”
वीरवर बोला, “प्रतिदिन पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ।”
इतना बड़ा वेतन सुनकर राजा चकित रह गया। उसने पूछा, “तुम्हारे पास ऐसी कौन-सी विशेषता है जिसके कारण तुम इतना धन चाहते हो?”
वीरवर ने शांत स्वर में कहा, “मेरे पास दो बलवान भुजाएँ हैं और तीसरा मेरा खड्ग। यही मेरी सम्पत्ति और सामर्थ्य है।”

राजा को उसकी बात असंगत लगी। उसने उसे अस्वीकार कर दिया। वीरवर बिना कुछ कहे वहाँ से लौटने लगा। लेकिन दरबार के बुद्धिमान मंत्रियों ने राजा से कहा, “महाराज, कुछ दिनों के लिए इसे अवसर देकर देखना चाहिए। संभव है यह वास्तव में कोई असाधारण व्यक्ति हो।”

मंत्रियों की सलाह मानकर राजा ने वीरवर को वापस बुलाया और चार दिनों के लिए सेवा में रख लिया। उसे प्रतिदिन पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ मिलने लगीं।

राजा ने गुप्त रूप से यह जानने का प्रयास किया कि वह इतना धन किस प्रकार खर्च करता है। उसने देखा कि वीरवर अपने वेतन का आधा भाग देवताओं और ब्राह्मणों को दान कर देता था। बचे हुए धन का आधा वह गरीबों, दुखियों और जरूरतमंदों की सहायता में खर्च करता था। जो थोड़ा धन बचता, उसी से अपने परिवार का भोजन और आवश्यक खर्च चलाता था।

दिन-रात वह हाथ में तलवार लेकर राजमहल के द्वार पर पहरा देता रहता। जब तक स्वयं राजा अनुमति न देता, वह अपने घर भी नहीं जाता था। उसकी निष्ठा, अनुशासन और सेवा देखकर राजा अत्यंत प्रसन्न रहने लगा।

एक रात कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी थी। चारों ओर घना अंधकार फैला हुआ था। आधी रात के समय राजा शूद्रक को किसी स्त्री के करुण विलाप की आवाज सुनाई दी। उसने तुरंत पूछा, “द्वार पर कौन है?”
वीरवर ने उत्तर दिया, “महाराज, मैं उपस्थित हूँ।”
राजा ने आदेश दिया, “जाकर पता लगाओ कि यह रोने की आवाज कहाँ से आ रही है।”

वीरवर तलवार लेकर तुरंत निकल पड़ा। लेकिन राजा को चिंता हुई कि उसने अपने विश्वासी सेवक को अकेले ऐसे भयावह अंधकार में भेज दिया है। इसलिए वह स्वयं भी गुप्त रूप से तलवार लेकर उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।

नगर से बाहर जाकर वीरवर ने एक अत्यंत सुंदर स्त्री को देखा। वह बहुमूल्य आभूषणों से सुसज्जित थी और रो रही थी। वीरवर ने पूछा, “देवि, आप कौन हैं और इस प्रकार क्यों विलाप कर रही हैं?”
स्त्री ने उत्तर दिया, “मैं इस राज्य की राजलक्ष्मी हूँ। लंबे समय से राजा शूद्रक के राज्य में सुखपूर्वक निवास कर रही थी। लेकिन अब समय आ गया है कि मैं इस राज्य को छोड़ दूँ।”

वीरवर ने विनम्रता से कहा, “यदि कोई संकट आया है, तो उसका उपाय भी अवश्य होगा। कृपया बताइए कि आपको यहाँ रोकने का क्या उपाय है?”
राजलक्ष्मी बोली, “यदि तुम अपने पुत्र शक्तिधर की बलि सर्वमंगला देवी को अर्पित कर दो, तो मैं इस राज्य को नहीं छोड़ूँगी और यह राज्य दीर्घकाल तक सुरक्षित रहेगा।”

इतना कहकर वह अदृश्य हो गई।
वीरवर तुरंत अपने घर पहुँचा। उसने अपनी पत्नी और पुत्र शक्तिधर को जगाया और पूरी बात उन्हें बता दी। यह सुनकर उसका पुत्र प्रसन्न होकर बोला, “पिताजी, यदि मेरे प्राणों से महाराज और राज्य की रक्षा होती है, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या हो सकता है? ऐसे शुभ कार्य में देह त्याग करना ही श्रेष्ठ है।”
उसकी माता ने भी कहा, “यदि हम राजा का इतना बड़ा उपकार नहीं करेंगे, तो इतने दिनों तक प्राप्त वेतन का ऋण कैसे उतार पाएँगे?”

फिर तीनों मिलकर सर्वमंगला देवी के मंदिर पहुँचे। वहाँ विधिपूर्वक पूजा की गई। इसके बाद वीरवर ने देवी से प्रार्थना की, “हे देवी! राजा शूद्रक की सदा विजय हो। कृपा करके यह बलि स्वीकार करें।”
इतना कहकर उसने काँपते हुए भी दृढ़ मन से अपने पुत्र शक्तिधर का सिर काट दिया।

इसके बाद वीरवर ने सोचा, “जिस पुत्र के लिए जीवन प्रिय था, वही अब नहीं रहा। अब मेरे जीवित रहने का क्या अर्थ है?” यह सोचकर उसने भी अपना सिर काट दिया।
पति और पुत्र दोनों को मृत देखकर वीरवर की पत्नी शोक से व्याकुल हो उठी। उसने भी अपने प्राण त्याग दिए।

राजा शूद्रक यह सब दूर खड़े होकर देख रहा था। यह अद्भुत त्याग देखकर उसकी आँखें भर आईं। वह सोचने लगा, “मेरे जैसे सामान्य लोग तो जीते और मरते रहते हैं, लेकिन ऐसा महान और स्वामीभक्त मनुष्य संसार में दुर्लभ है।”

राजा ने निश्चय किया कि ऐसे महान सेवक के बिना जीवन और राज्य दोनों व्यर्थ हैं। उसने भी अपनी तलवार उठाई और अपना सिर काटने को तैयार हो गया।

तभी अचानक देवी सर्वमंगला प्रकट हुईं। उन्होंने राजा का हाथ रोक लिया और बोलीं, “हे पुत्र! मैं तुमसे अत्यंत प्रसन्न हूँ। इतना बड़ा साहस मत करो। तुम्हारा राज्य सदा सुरक्षित रहेगा।”

राजा ने हाथ जोड़कर कहा, “हे देवी! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे राज्य या जीवन कुछ नहीं चाहिए। मेरी केवल यही इच्छा है कि वीरवर, उसकी पत्नी और उसका पुत्र पुनः जीवित हो जाएँ।”

देवी उसकी निस्वार्थ भावना से प्रसन्न हो गईं। उन्होंने वरदान दिया और उसी क्षण वीरवर, उसकी पत्नी और शक्तिधर पुनः जीवित हो उठे, मानो उन्हें कुछ हुआ ही न हो।

इसके बाद देवी अंतर्धान हो गईं। वीरवर अपने परिवार सहित घर लौट आया और राजा भी चुपचाप महल में वापस आ गया।

अगली सुबह राजा ने सामान्य भाव से वीरवर से पूछा, “रात को रोने वाली स्त्री का क्या रहस्य था?”
वीरवर ने विनम्रता से उत्तर दिया, “महाराज, वह स्त्री मुझे देखकर अचानक अदृश्य हो गई। मैं कुछ और नहीं जान सका।”

उसकी विनम्रता और महानता देखकर राजा अत्यंत प्रभावित हुआ। उसने दरबार में सबके सामने पूरी घटना सुनाई और वीरवर की स्वामीभक्ति, त्याग और साहस की प्रशंसा की। प्रसन्न होकर राजा शूद्रक ने उसे कर्नाटक का राज्य प्रदान कर दिया।

इस कथा से शिक्षा मिलती है कि सच्ची निष्ठा, त्याग और कर्तव्यपालन मनुष्य को महान बना देते हैं। जो व्यक्ति स्वार्थ छोड़कर धर्म और कर्तव्य के लिए कार्य करता है, उसे अंततः सम्मान और यश अवश्य प्राप्त होता है।

क्षत्रिय, नाई और भिखारी की कहानी

बहुत समय पहले अयोध्या नगरी में चूड़ामणि नाम का एक क्षत्रिय रहता था। वह स्वभाव से धर्मपरायण और ईश्वरभक्त था, लेकिन उसके जीवन में अत्यंत दरिद्रता थी। घर की स्थिति इतनी खराब हो चुकी थी कि कभी-कभी भोजन का प्रबंध करना भी कठिन हो जाता था। धन की कमी से वह दिन-रात चिंतित रहने लगा।
अंततः उसने निश्चय किया कि वह भगवान महादेव की आराधना करेगा। वह पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ शिवजी की तपस्या में लग गया। लंबे समय तक उसने कठिन व्रत, पूजा और उपासना की। उसकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर एक दिन भगवान शंकर की आज्ञा से धन के देवता कुबेर ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए।

स्वप्न में कुबेर ने उससे कहा, “प्रातःकाल स्नान और क्षौर करके अपने घर में लाठी लेकर एकांत में छिपकर बैठ जाना। थोड़ी देर बाद तुम्हारे आँगन में एक भिखारी आएगा। तुम बिना दया किए उस पर लाठी से प्रहार करना। जैसे ही वह मरेगा, वह स्वर्ण से भरे कलश में बदल जाएगा। उस धन से तुम जीवनभर सुखपूर्वक रह सकोगे।”

सुबह उठते ही चूड़ामणि ने स्वप्न के अनुसार सब कार्य किए। उसने स्नान किया, क्षौर कराया और लाठी लेकर घर में छिपकर बैठ गया। कुछ समय बाद सचमुच एक भिखारी उसके आँगन में आ पहुँचा। उसने साहस करके उस भिखारी पर लाठी से प्रहार किया। जैसे ही भिखारी मरा, वह तत्काल स्वर्ण के कलश में परिवर्तित हो गया।
चूड़ामणि यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया। उसकी गरीबी दूर हो गई और वह सुखपूर्वक जीवन बिताने लगा।

उसी समय वहाँ से गुजर रहा एक नाई यह पूरा दृश्य छिपकर देख रहा था। उसने केवल इतना देखा कि एक भिखारी को मारते ही वह सोने के कलश में बदल गया। लेकिन वह यह नहीं समझ पाया कि यह सब भगवान की कृपा और विशेष आदेश के कारण हुआ था।
नाई के मन में लालच जाग उठा। उसने सोचा, “यदि ऐसा करने से धन मिलता है, तो मैं भी यही उपाय करूँगा और बहुत अमीर बन जाऊँगा।”

उस दिन से वह भी अपने घर में लाठी लेकर छिपकर बैठने लगा और किसी भिखारी के आने की प्रतीक्षा करने लगा। कुछ दिनों बाद एक गरीब भिखारी उसके दरवाजे पर आया। नाई ने बिना कुछ सोचे-समझे उस पर लाठी से प्रहार कर दिया और उसे मार डाला।
लेकिन इस बार

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हितोपदेश भारतीय नीति कथाओं का प्रसिद्ध संग्रह है, जिसमें जानवरों और पात्रों के माध्यम से जीवन की महत्वपूर्ण सीख दी गई है। ये कहानियाँ मनोरंजन के साथ-साथ बुद्धिमानी, मित्रता, ईमानदारी और सही निर्णय लेने की प्रेरणा देती हैं। बच्चों से लेकर बड़ों तक, हर उम्र के लोग इन कहानियों से ज्ञान और नैतिक शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

 लेखक / मूल रचनाकार: नारायण पंडित
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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