बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी सबसे ज्यादा प्रेम में अंधा कौन?

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बेताल पच्चीसी: विशाला नाम की नगरी में पदमनाभ नाम का राजा राज करता था। उसी नगर में अर्थदत्त नाम का एक साहूकार रहता था। उसकी पुत्री अनंगमंजरी का विवाह मणिवर्मा नामक धनी साहूकार के पुत्र से हुआ। मणिवर्मा पत्नी को बहुत प्रेम करता था, पर पत्नी उसे प्रेम नहीं करती थी। इसी बीच मणिवर्मा के बाहर जाने पर अनंगमंजरी का आकर्षण राजपुरोहित के पुत्र कमलाकर की ओर हो गया और दोनों एक-दूसरे को चाहने लगे।

अनंगमंजरी ने चंडी देवी से प्रार्थना की कि वह अगले जन्म या इस जन्म में कमलाकर को ही पति रूप में पाए। वह आत्महत्या करने को तैयार हो गई, लेकिन सखी ने उसे रोक लिया और दोनों के मिलने का प्रबंध कर दिया। जब दोनों मिले तो अत्यधिक प्रेम और उत्तेजना में अनंगमंजरी की मृत्यु हो गई। यह देखकर कमलाकर भी शोक से मर गया। तभी मणिवर्मा लौट आया और अपनी पत्नी को पराए पुरुष के साथ मृत देखकर वह भी अत्यंत दुख से मर गया। तीनों की मृत्यु हो गई। बाद में चंडी देवी ने उन्हें जीवित कर दिया।

बेताल ने पूछा, “हे राजन्! बताओ, इन तीनों में सबसे ज्यादा प्रेम में अंधा कौन था?”

राजा ने कहा, “मेरे विचार से मणिवर्मा सबसे अधिक प्रेम में अंधा था, क्योंकि उसने अपनी पत्नी को परपुरुष से प्रेम करते देख भी इतना गहरा शोक किया कि अपने प्राण त्याग दिए। बाकी दोनों की मृत्यु भावावेश और अचानक मिलन से हुई, इसलिए उसमें आश्चर्य नहीं।”
राजा का उत्तर सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका।

बेताल पच्चीसी शेर बनाने का अपराधी कौन?

कुसुमपुर नगर में एक ब्राह्मण के चार पुत्र थे। पिता की मृत्यु के बाद चारों बिखर गये और अलग-अलग दिशाओं में विद्या सीखने चले गये। कुछ समय बाद वे फिर मिले और हर एक ने अपनी-अपनी सिद्धि बताई—एक हड्डियों से मांस बना सकता था, दूसरा खाल और बाल पैदा कर सकता था, तीसरा अंग जोड़ सकता था और चौथा उसमें प्राण डाल सकता था।

अपनी शक्ति की परीक्षा के लिए वे जंगल गये। वहाँ उन्हें एक मृत शेर की हड्डियाँ मिलीं। चारों ने मिलकर अपनी-अपनी विद्या का प्रयोग किया और शेर को जीवित कर दिया। जैसे ही शेर जीवित हुआ, वह झपट पड़ा और चारों को खा गया।

बेताल ने पूछा, “हे राजन्! बताओ, इस शेर को बनाने का असली अपराधी कौन है?”

राजा ने कहा, “अपराधी वही है जिसने उसमें प्राण डाले, क्योंकि बाकी तीन को परिणाम का ज्ञान नहीं था। बिना जान डाले शेर जीवित नहीं हो सकता था, इसलिए मूल दोष उसी का है जिसने उसे जीवन दिया।”
यह सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका।

बेताल पच्चीसी योगी पहले क्यों रोया, फिर क्यों हँसा?

कलिंग देश के शोभावती नगर में राजा प्रद्युम्न राज्य करता था। उसी नगर में एक ब्राह्मण का पुत्र देवसोम था, जो सोलह वर्ष की आयु में सभी विद्याएँ सीख चुका था, लेकिन दुर्भाग्यवश उसकी मृत्यु हो गई। माता-पिता और नगरवासी उसके लिए शोक करने लगे और शव को श्मशान ले जाया गया।

वहाँ एक योगी अपनी कुटिया से निकलकर आया। मृत युवक को देखकर वह पहले जोर-जोर से रोने लगा, फिर अचानक हँसने लगा। उसके बाद उसने योग-बल से अपना शरीर छोड़कर उस बालक के शरीर में प्रवेश कर लिया और वह युवक जीवित हो उठा। सब लोग आश्चर्यचकित होकर प्रसन्न हो गए।

बेताल ने पूछा, “हे राजन्! बताओ, योगी पहले क्यों रोया और फिर क्यों हँसा?”

राजा ने कहा, “वह पहले इसलिए रोया क्योंकि उसे अपने पुराने शरीर और संसारिक संबंधों का मोह क्षण भर को याद आ गया। फिर वह इसलिए हँसा क्योंकि उसने यह समझ लिया कि नए शरीर में प्रवेश करके वह फिर से सिद्धियाँ और साधना का अवसर प्राप्त कर लेगा।”
इतना सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका।

बेताल पच्चीसी माँ-बेटी के बच्चों में क्या रिश्ता?

किसी नगर में मांडलिक नाम का राजा था। उसकी पत्नी चडवती और पुत्री लावण्यवती थीं। राजगद्दी छिन जाने पर वे तीनों वन में निकल पड़े। रास्ते में राजा भीलों से लड़ते हुए मारा गया। माँ-बेटी शोक में जंगल में भटकती रहीं और अंत में एक तालाब के पास पहुँचीं।


उधर चंडसिंह नाम का साहूकार अपने पुत्र के साथ शिकार पर निकला हुआ था। उसने माँ-बेटी को देखा और विवाह का विचार किया। योजना के अनुसार रानी का विवाह साहूकार से और बेटी का विवाह उसके पुत्र से कर दिया गया। संयोग से रानी की सास अपनी ही बेटी बन गई और बेटी की सास उसकी माँ बन गई। आगे चलकर दोनों के संतानें हुईं।

बेताल ने पूछा, “हे राजन्! बताओ, माँ-बेटी के इन बच्चों का आपस में क्या रिश्ता हुआ?”

राजा इस उलझन को सुलझा नहीं सका और चुप रह गया। तब बेताल बोला और पेड़ पर लौट गया।

बेताल पच्चीसी की अंतिम कहानी

योगी राजा और मुर्दे को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने कहा, “हे राजन्! तुमने यह कठिन कार्य पूरा करके मेरा बड़ा उपकार किया है।” फिर उसने मुर्दे को स्नान कराया, फूलों से सजाया और मंत्रों द्वारा बेताल का आवाहन करके उसकी पूजा की।

पूजा के बाद योगी ने राजा से कहा, “अब तुम सिर झुकाकर इस मुर्दे को प्रणाम करो।” राजा को बेताल की चेतावनी याद थी। उसने कहा, “मैंने कभी किसी के आगे सिर नहीं झुकाया। पहले आप करके दिखाइए।”


जैसे ही योगी ने सिर झुकाया, राजा ने तलवार से उसका सिर काट डाला। तभी बेताल प्रकट हुआ और प्रसन्न होकर बोला, “राजन्! यह योगी विद्याधरों का स्वामी बनना चाहता था, लेकिन अब वह अधिकार तुम्हें मिलेगा। तुम जो वर माँगना चाहो माँगो।”
राजा ने कहा, “मेरी यही इच्छा है कि आपकी सुनाई हुई ये चौबीस कथाएँ और यह पच्चीसवीं कथा संसार में प्रसिद्ध हों और लोग इन्हें आदरपूर्वक पढ़ें।”
बेताल ने कहा, “ऐसा ही होगा। ये कथाएँ ‘बेताल पच्चीसी’ के नाम से प्रसिद्ध होंगी। जो इन्हें पढ़ेगा, उसके पाप दूर होंगे।”

इसके बाद भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने राजा की प्रशंसा की और आशीर्वाद दिया कि वह सातों द्वीपों सहित पूरी पृथ्वी पर राज्य करेगा। कुछ समय बाद राजा महान सम्राट बना और दीर्घकाल तक सुखपूर्वक राज्य करके अंत में भगवान में लीन हो गया।

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बेताल पच्चीसी प्राचीन भारतीय लोककथाओं का एक प्रसिद्ध संग्रह है, जिसमें राजा विक्रमादित्य और बेताल की रोचक कहानियाँ शामिल हैं। हर कहानी में नैतिक प्रश्न छिपा होता है। ये कहानियाँ बुद्धि, न्याय और सही निर्णय लेने की क्षमता को समझाने का संदेश देती हैं।

 लेखक / मूल रचनाकार: बेताल भट्टराव
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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