बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी असली वर कौन?

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बेताल पच्चीसी: उज्जैन नगरी में महाबल नाम का एक प्रतापी राजा राज्य करता था। उसके दरबार में हरिदास नाम का एक विश्वसनीय दूत था। हरिदास की महादेवी नाम की एक अत्यंत सुंदर कन्या थी। जब वह विवाह योग्य हुई तो हरिदास उसकी शादी को लेकर बहुत चिंतित रहने लगा। उसी समय राजा ने हरिदास को एक दूसरे राज्य में संदेश लेकर भेजा। कई दिनों की यात्रा के बाद वह वहाँ पहुँचा। दूसरे राजा ने उसका बड़ा सम्मान किया और उसे अपने महल में ठहराया।

एक दिन वहाँ एक ब्राह्मण युवक हरिदास के पास आया और बोला कि वह उसकी पुत्री से विवाह करना चाहता है। हरिदास ने कहा कि वह अपनी पुत्री का विवाह उसी से करेगा जिसमें सभी गुण होंगे। तब उस ब्राह्मण ने कहा कि उसके पास एक ऐसा अद्भुत रथ है जिसमें बैठकर कोई भी व्यक्ति एक घड़ी में कहीं भी पहुँच सकता है। हरिदास उसकी बात सुनकर चकित रह गया और बोला कि वह अगले दिन अपना रथ लेकर आए।

अगली सुबह ब्राह्मण अपना रथ लेकर आया। हरिदास उसके साथ उस रथ पर बैठा और देखते ही देखते उज्जैन पहुँच गया। लेकिन वहाँ पहुँचकर उसे पता चला कि उसके आने से पहले उसकी पत्नी अपनी पुत्री का विवाह किसी दूसरे युवक से करने का वचन दे चुकी है और उसका पुत्र भी अपनी बहन का रिश्ता एक तीसरे युवक से तय कर चुका है। इस प्रकार कन्या के लिए तीन वर सामने आ गये। हरिदास बड़ी चिंता में पड़ गया कि एक कन्या का विवाह तीन लोगों में से किससे किया जाए।

इसी बीच अचानक एक भयानक राक्षस वहाँ आया और महादेवी को उठाकर विंध्याचल पर्वत की ओर उड़ गया। पूरे घर में हाहाकार मच गया। उन तीनों वरों में से एक युवक अत्यंत ज्ञानी था। हरिदास ने उससे पूछा कि कन्या कहाँ गयी है। उसने ध्यान लगाकर बताया कि एक राक्षस उसे उठाकर विंध्याचल पर्वत पर ले गया है। यह सुनते ही दूसरे युवक ने कहा कि उसके दिव्य रथ पर बैठकर वे तुरंत वहाँ पहुँच सकते हैं।

तीसरे युवक ने कहा कि वह शब्दभेदी बाण चलाने में निपुण है और उसी के बल पर वह राक्षस का वध करेगा। फिर सभी लोग उस अद्भुत रथ पर सवार होकर विंध्याचल पर्वत पहुँचे। वहाँ उस भयानक राक्षस ने कन्या को बंदी बना रखा था। तभी तीसरे युवक ने अपने शब्दभेदी तीर से राक्षस पर वार किया। उसका निशाना बिल्कुल सही लगा और राक्षस वहीं मारा गया। इसके बाद उन्होंने महादेवी को सुरक्षित वापस ले लिया।

इतनी कथा सुनाकर बेताल ने राजा विक्रम से पूछा कि उन तीनों वरों में से वास्तविक वर कौन कहलाने योग्य है। राजा ने उत्तर दिया कि जिस युवक ने राक्षस का वध करके कन्या की रक्षा की, उसी को कन्या का पति बनने का अधिकार है। राजा ने कहा कि पहला युवक केवल स्थान का पता बता सका और दूसरे ने यात्रा में सहायता की, लेकिन असली वीरता और साहस तीसरे युवक ने दिखाया जिसने अपने प्राणों का जोखिम उठाकर राक्षस को मार गिराया। इसलिए वही महादेवी का सच्चा वर कहलाने योग्य है।

राजा का उत्तर सुनते ही बेताल फिर से उड़कर उसी पेड़ पर जा लटका। राजा विक्रम एक बार फिर उसे पकड़ने के लिए लौट पड़ा और रास्ते में बेताल ने अगली कहानी सुनानी शुरू कर दी।

बेताल पच्चीसी पत्नी किसकी?

धर्मपुर नाम की एक प्रसिद्ध नगरी थी, जहाँ धर्मशील नाम का राजा राज्य करता था। उसके दरबार में अन्धक नाम का एक बुद्धिमान दीवान था। एक दिन दीवान ने राजा से कहा कि यदि नगर में देवी का एक भव्य मंदिर बनवाकर उनकी स्थापना की जाए और विधिपूर्वक पूजा की जाए, तो इससे बहुत बड़ा पुण्य प्राप्त होगा। राजा को यह बात उचित लगी और उसने तुरंत एक सुंदर मंदिर बनवाकर उसमें देवी की मूर्ति स्थापित करवा दी। प्रतिदिन वहाँ बड़े श्रद्धा भाव से पूजा होने लगी।
कुछ समय बाद देवी राजा की भक्ति से प्रसन्न हुईं और एक दिन प्रकट होकर बोलीं कि वह जो चाहे वरदान माँग सकता है। राजा के कोई संतान नहीं थी, इसलिए उसने देवी से एक पुत्र का वरदान माँगा। देवी ने कहा कि उसे एक अत्यंत प्रतापी पुत्र प्राप्त होगा। कुछ समय बाद राजा के यहाँ पुत्र का जन्म हुआ। पूरे नगर में उत्सव मनाया गया और लोग अत्यंत प्रसन्न हुए।

एक दिन एक धोबी अपने मित्र के साथ उस नगर में आया। घूमते-घूमते उसकी नजर देवी के मंदिर पर पड़ी। वह देवी के दर्शन करने भीतर गया। उसी समय उसकी दृष्टि एक अत्यंत सुंदर धोबी कन्या पर पड़ी। उसे देखते ही वह युवक उसके प्रेम में पागल हो गया। वह तुरंत देवी के सामने जाकर प्रार्थना करने लगा कि यदि वह कन्या उसे पत्नी के रूप में मिल जाए तो वह अपना सिर देवी को अर्पित कर देगा।

उस दिन के बाद वह हर समय उसी कन्या के बारे में सोचने लगा। उसकी हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती गयी। उसके मित्र ने उसकी दशा देखकर उसके पिता को सारी बात बता दी। पुत्र की ऐसी स्थिति देखकर पिता स्वयं उस लड़की के घर गया और विनती करके दोनों का विवाह तय करवा दिया। कुछ समय बाद दोनों का विवाह धूमधाम से संपन्न हो गया और युवक अत्यंत प्रसन्न रहने लगा।

विवाह के कुछ दिन बाद लड़की के पिता के यहाँ एक बड़ा उत्सव आयोजित हुआ। नवविवाहित दंपति को भी उसमें आने का निमंत्रण मिला। युवक अपनी पत्नी और मित्र के साथ वहाँ जाने के लिए निकला। रास्ते में वही देवी का मंदिर पड़ा, जहाँ उसने कभी मनौती माँगी थी। मंदिर को देखते ही उसे अपना वचन याद आ गया। उसने अपनी पत्नी और मित्र से कुछ देर बाहर प्रतीक्षा करने को कहा और स्वयं मंदिर के भीतर चला गया।

मंदिर में पहुँचकर उसने देवी को प्रणाम किया और बिना एक क्षण गँवाए तलवार उठाकर अपना सिर देवी के चरणों में अर्पित कर दिया। बहुत देर तक जब वह बाहर नहीं आया तो उसका मित्र चिंता में पड़ गया और उसे देखने मंदिर के भीतर गया। अंदर का दृश्य देखकर वह स्तब्ध रह गया। उसके मित्र का सिर धड़ से अलग पड़ा था। उसने सोचा कि यदि लोग यह देखेंगे तो यही समझेंगे कि उसने अपने मित्र की हत्या उसकी सुंदर पत्नी को पाने के लिए की है। बदनामी और अपमान के भय से उसने भी तलवार उठाई और अपना सिर काट दिया।

उधर बाहर खड़ी पत्नी जब काफी देर तक दोनों को वापस आता नहीं देख सकी तो वह भी मंदिर के भीतर गयी। वहाँ का दृश्य देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गयी। उसने सोचा कि संसार उसे ही दोषी मानेगा और लोग कहेंगे कि उसी के कारण दोनों मित्र मारे गये। इस अपमान से बचने के लिए उसने भी अपने प्राण त्यागने का निश्चय किया। जैसे ही वह तलवार अपनी गर्दन पर चलाने लगी, उसी समय देवी प्रकट हो गयीं और उसका हाथ पकड़ लिया।

देवी ने प्रसन्न होकर उससे वर माँगने को कहा। स्त्री ने हाथ जोड़कर केवल यही प्रार्थना की कि दोनों पुरुषों को फिर से जीवित कर दिया जाए। देवी ने कहा कि वह दोनों के सिर उनके धड़ों से जोड़ दे। घबराहट और दुख में स्त्री से भूल हो गयी और उसने एक का सिर दूसरे के धड़ पर लगा दिया। देवी ने दोनों को पुनः जीवित कर दिया। जीवित होते ही दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया। एक कहने लगा कि स्त्री उसकी पत्नी है, जबकि दूसरा भी उस पर अपना अधिकार जताने लगा।

इतनी कथा सुनाकर बेताल ने राजा विक्रम से पूछा कि वह स्त्री वास्तव में किसकी पत्नी मानी जाए। राजा ने उत्तर दिया कि जिस पुरुष का सिर उसके शरीर पर लगा है, वही उसका वास्तविक पति है। राजा ने समझाया कि शरीर के सभी अंगों में सिर को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। मनुष्य की पहचान उसके सिर और बुद्धि से होती है, इसलिए जिस शरीर पर पति का सिर मौजूद है, उसी को स्त्री का सच्चा पति माना जाएगा।

बेताल पच्चीसी किसका पुण्य बड़ा?

मिथलावती नाम की एक नगरी थी, जहाँ गुणाधिप नाम का राजा राज करता था। उसकी सेवा करने के लिए एक दूर देश का राजकुमार वहाँ आया। वह कई दिनों तक दरबार में आता-जाता रहा, लेकिन राजा की उस पर कोई विशेष दृष्टि नहीं पड़ी। धीरे-धीरे उसके पास का सारा धन समाप्त हो गया और वह अत्यंत कमजोर तथा दुखी रहने लगा।

एक दिन राजा शिकार खेलने जंगल की ओर निकला। वह राजकुमार भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। घूमते-घूमते राजा अपने सेवकों से बिछड़ गया और केवल वही राजकुमार उसके साथ रह गया। राजा ने जब उसकी दुबली अवस्था देखी तो कारण पूछा। राजकुमार ने विनम्रता से कहा कि यह उसके भाग्य का दोष है। उसने कहा कि जिस राजा की सेवा वह करता है, वह हजारों लोगों का पालन करता है, लेकिन उसकी ओर कभी ध्यान नहीं देता।

राजकुमार ने आगे कहा कि छह बातें मनुष्य को छोटा बना देती हैं—दुष्ट व्यक्ति से प्रेम, बिना कारण हँसना, स्त्री से झगड़ा करना, बुरे स्वामी की सेवा, गधे की सवारी और अशुद्ध भाषा बोलना। उसने यह भी कहा कि जन्म के साथ ही मनुष्य की आयु, कर्म, धन, विद्या और यश विधाता पहले से लिख देता है। जब तक मनुष्य का पुण्य साथ देता है, तब तक लोग उसके आसपास रहते हैं, लेकिन पुण्य घटते ही अपने भी पराये हो जाते हैं। फिर भी स्वामी की सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती, उसका फल अवश्य मिलता है।

राजा को उसकी बातें बहुत अच्छी लगीं। नगर लौटने के बाद उसने उस राजकुमार को अपने पास नौकरी दे दी और उसे अच्छे वस्त्र तथा गहने देकर सम्मानित किया। कुछ समय बाद एक दिन वह राजकुमार किसी कार्य से बाहर गया। रास्ते में उसे देवी का एक मंदिर दिखाई दिया। वह अंदर गया और श्रद्धा से देवी की पूजा की। जब वह मंदिर से बाहर निकला तो उसने देखा कि एक अत्यंत सुंदर स्त्री उसके पीछे-पीछे चली आ रही है।

राजकुमार उस स्त्री को देखकर मोहित हो गया। स्त्री ने उससे कहा कि पहले वह सामने वाले कुण्ड में स्नान करके आए, फिर वह उसकी हर बात मानेगी। राजकुमार तुरंत कुण्ड में उतरा और जैसे ही उसने गोता लगाया, वह अचानक अपने ही नगर में पहुँच गया। यह अद्भुत घटना देखकर वह हैरान रह गया और तुरंत राजा के पास जाकर सारी बात बता दी। राजा को भी यह सुनकर आश्चर्य हुआ और उसने स्वयं उस चमत्कार को देखने की इच्छा जताई।

दोनों घोड़ों पर सवार होकर मंदिर पहुँचे। उन्होंने देवी के दर्शन किये और बाहर निकले ही थे कि वही सुंदर स्त्री फिर प्रकट हो गयी। इस बार उसने राजा को देखकर कहा कि वह उसके रूप पर मोहित हो गयी है और वह जो कहेगा वही करेगी। राजा ने उससे कहा कि यदि ऐसा है तो वह उसके सेवक अर्थात उस राजकुमार से विवाह कर ले। स्त्री ने मना करते हुए कहा कि वह केवल राजा को चाहती है।

राजा ने शांत स्वर में कहा कि सज्जन व्यक्ति अपने वचन से पीछे नहीं हटते। चूँकि उसने कहा है कि वह उसकी हर बात मानेगी, इसलिए उसे अपने वचन का पालन करना चाहिए। अंत में स्त्री को राजा की बात माननी पड़ी और राजा ने उसका विवाह अपने सेवक से करा दिया।

इतनी कथा सुनाकर बेताल ने राजा विक्रम से पूछा कि राजा और सेवक में किसका पुण्य बड़ा था। राजा विक्रम ने उत्तर दिया कि सेवक का पुण्य अधिक बड़ा था। उन्होंने कहा कि दूसरों पर उपकार करना राजा का धर्म होता है, इसलिए उसके द्वारा किया गया त्याग उतना महान नहीं माना जाएगा। लेकिन सेवक ने ऐसा कार्य किया जो उसके धर्म में नहीं था, फिर भी उसने निष्ठा और विनम्रता दिखाई। इसलिए उसका पुण्य राजा से बड़ा माना जाएगा।
राजा का उत्तर सुनते ही बेताल फिर उड़कर उसी पेड़ पर जा लटका। राजा विक्रम एक बार फिर उसे पकड़ने के लिए लौट पड़ा और बेताल ने आगे की कहानी सुनानी शुरू कर दी।

सबसे बढ़कर कौन?

अंग देश के एक गाँव में एक धनी ब्राह्मण रहता था। उसके तीन पुत्र थे। एक बार ब्राह्मण ने यज्ञ करने का निश्चय किया, जिसके लिए उसे एक कछुए की आवश्यकता थी। उसने अपने तीनों पुत्रों को कछुआ लाने के लिए समुद्र तट पर भेजा। वहाँ उन्हें एक कछुआ मिल गया, लेकिन तीनों में यह विवाद शुरू हो गया कि कौन उसे ले जाएगा।

बड़ा पुत्र बोला कि वह “भोजनचंग” है, इसलिए उसे जीव-जंतु को छूने में दोष लगता है। मझला पुत्र बोला कि वह “नारीचंग” है, इसलिए वह कोई कार्य नहीं करेगा। सबसे छोटा पुत्र बोला कि वह “शैयाचंग” है, इसलिए वह भी उस कछुए को नहीं ले जाएगा। इस प्रकार तीनों में यह बहस छिड़ गयी कि कौन सबसे श्रेष्ठ है। जब कोई निर्णय नहीं निकला तो वे राजा के पास गए।

राजा ने उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया। सबसे पहले उसने एक स्वादिष्ट भोजन तैयार करवाया और तीनों को खाने के लिए बुलाया। बड़े पुत्र ने जैसे ही भोजन सूंघा, उसने कहा कि इसमें मरे हुए जीव की गंध आ रही है और वह बिना खाए ही उठ गया। जाँच करने पर पता चला कि वह भोजन श्मशान के पास उगाए गए अनाज से बना था। राजा ने माना कि वह सचमुच भोजनचंग है, क्योंकि उसे भोजन की सूक्ष्म गंध का ज्ञान था।

इसके बाद राजा ने मझले पुत्र की परीक्षा ली। उसने एक सुंदर स्त्री को उसके पास भेजा। जैसे ही वह उसके पास पहुँची, मझले पुत्र ने उसे पहचान लिया और कहा कि उसके शरीर से बकरी के दूध की गंध आ रही है और वह सामान्य स्त्री नहीं है। जाँच करने पर पता चला कि वह स्त्री बचपन में बकरी के दूध पर पली थी। राजा उसकी सूक्ष्म समझ से प्रभावित हुआ और उसे नारीचंग घोषित किया।

अब तीसरे पुत्र की परीक्षा ली गयी। उसे सात गद्दों वाला एक अत्यंत आरामदायक पलंग दिया गया। जैसे ही वह उस पर लेटा, वह अचानक चौंककर उठ बैठा और उसकी पीठ पर लाल रेखा बन गयी थी। जाँच करने पर पता चला कि नीचे के गद्दों में एक सूक्ष्म बाल था, जिसने उसे चुभकर वह निशान बना दिया था। राजा यह देखकर बहुत चकित हुआ कि उसे इतनी सूक्ष्म चीज का भी अनुभव हो गया।

राजा ने तीनों को एक-एक लाख अशर्फियाँ देकर सम्मानित किया, और तीनों कछुआ लाना भूलकर वहीं आनंद से रहने लगे। इसके बाद बेताल ने राजा विक्रम से पूछा कि उन तीनों में सबसे बढ़कर कौन था।
राजा विक्रम ने उत्तर दिया कि सबसे बढ़कर तीसरा पुत्र अर्थात “शैयाचंग” था। उन्होंने कहा कि पहले दो लोगों की क्षमता किसी बाहरी जानकारी या अनुमान पर आधारित लगती है, लेकिन तीसरे ने अपने अनुभव से अत्यंत सूक्ष्म सत्य को प्रत्यक्ष रूप से महसूस किया, जो सबसे कठिन और श्रेष्ठ योग्यता है। इसलिए वही सबसे बढ़कर माना जाएगा।

राजा का उत्तर सुनते ही बेताल फिर उड़कर उसी पेड़ पर जा लटका। राजा विक्रम एक बार फिर उसे पकड़ने के लिए लौट पड़ा और बेताल ने अगली कहानी सुनानी शुरू कर दी।

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बेताल पच्चीसी प्राचीन भारतीय लोककथाओं का एक प्रसिद्ध संग्रह है, जिसमें राजा विक्रमादित्य और बेताल की रोचक कहानियाँ शामिल हैं। हर कहानी में नैतिक प्रश्न छिपा होता है। ये कहानियाँ बुद्धि, न्याय और सही निर्णय लेने की क्षमता को समझाने का संदेश देती हैं।

 लेखक / मूल रचनाकार: बेताल भट्टराव
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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