बेताल पच्चीसी: चन्द्रशेखर नगर में रत्नदत्त नाम का एक सेठ रहता था। उसकी पुत्री उन्मादिनी अत्यंत सुंदर थी। सेठ ने राजा को विवाह का प्रस्ताव दिया, लेकिन राजा ने दासियों से उसकी जाँच करवाई। दासियाँ उसके रूप से प्रभावित तो हुईं, लेकिन ईर्ष्या के कारण उसे “कुलक्षिणी” बताकर राजा से विवाह रोक दिया। बाद में सेठ ने उसका विवाह सेनापति बलभद्र से कर दिया।
उन्मादिनी और सेनापति सुखपूर्वक रहने लगे। कुछ समय बाद राजा की नजर उस पर पड़ी और वह उसके सौंदर्य पर मोहित हो गया। जब उसे पता चला कि वह सेनापति की पत्नी है, तो वह अत्यंत व्याकुल हो गया, लेकिन उसने धर्म और राजधर्म के कारण उसे पाने से इनकार कर दिया।
यह विरह इतना बढ़ा कि राजा मानसिक पीड़ा में बीमार पड़ गया और अंततः उसकी मृत्यु हो गई। सेनापति ने अपने गुरु से सलाह ली। गुरु ने कहा कि सेवक का धर्म स्वामी के लिए अपना जीवन त्याग देना है। इसके बाद सेनापति राजा की चिता में कूदकर अपने प्राण त्याग देता है।
जब उन्मादिनी को यह पता चला, तो वह भी अपने पति के प्रति समर्पण दिखाते हुए उसी चिता में प्रवेश कर जाती है और भस्म हो जाती है।
बेताल ने राजा विक्रम से पूछा कि इन दोनों—राजा और सेनापति—में अधिक साहसी कौन था।
राजा विक्रम ने उत्तर दिया कि अधिक साहसी राजा था। क्योंकि उसने अपने मन के आकर्षण और भावनाओं पर विजय पाकर राजधर्म को सर्वोपरि रखा और प्राण त्याग दिए, लेकिन गलत निर्णय नहीं लिया। सेनापति का बलिदान उसके स्वामीभक्त धर्म का परिणाम था, जो अपेक्षित था। असली साहस वही है जो अपने कर्तव्य और धर्म पर अडिग रहकर अपने प्राण भी दे दे, लेकिन सिद्धांत न छोड़े।
राजा का उत्तर सुनते ही बेताल फिर उड़कर उसी पेड़ पर जा लटका। राजा विक्रम एक बार फिर उसे पकड़ने के लिए लौट पड़ा और बेताल ने अगली कथा सुनानी शुरू कर दी।
बेताल पच्चीसी विद्या क्यों नष्ट हुई?
उज्जैन नगर में महासेन नाम का राजा राज्य करता था। उसके राज्य में वासुदेव शर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जिसका पुत्र गुणाकर अत्यंत जुआरी स्वभाव का था। उसने अपने पिता का सारा धन जुए में गंवा दिया, जिससे ब्राह्मण ने उसे घर से निकाल दिया। अपमानित होकर वह दूसरे नगर चला गया।
वहाँ उसकी भेंट एक योगी से हुई। योगी ने उसे भोजन कराने की इच्छा की, लेकिन गुणाकर ने ब्राह्मण पुत्र होने के कारण भोजन स्वीकार करने से मना कर दिया। योगी उसकी स्थिति समझ गया और अपनी सिद्धि के बल पर उसके लिए सोने का भव्य महल उत्पन्न कर दिया, जहाँ उसने रात बिताई। सुबह होते ही वह सब कुछ गायब हो गया।
गुणाकर उस अद्भुत दृश्य से प्रभावित हो गया और उसने योगी से उस शक्ति का रहस्य जानने की इच्छा व्यक्त की। योगी ने बताया कि यह विद्या जल में खड़े होकर मंत्र जपने से प्राप्त हो सकती है, लेकिन उसने चेतावनी भी दी कि यह मार्ग कठिन है और माया का प्रभाव बहुत शक्तिशाली होता है।
गुणाकर ने योगी की चेतावनी को अनदेखा कर दिया और विद्या प्राप्त करने का निश्चय किया। योगी ने उसे मंत्र दिया और अभ्यास शुरू करवाया। जैसे-जैसे वह साधना करता गया, उसे अनेक भ्रम और माया दिखाई देने लगी। वह कभी अपने जीवन को अलग रूप में देखता, कभी अपने परिवार और संसार के बंधनों में उलझ जाता।
अंततः वह मानसिक द्वंद्व में फंस गया और अग्नि में प्रवेश करने के निर्णय तक पहुँच गया, जैसा योगी ने कहा था। लेकिन अंतिम क्षण में उसके मन में शंका उत्पन्न हुई कि क्या यह सब सत्य है या भ्रम। इसी शंका के कारण उसकी एकाग्रता टूट गई और वह माया से मुक्त हो गया।
जब वह वापस योगी के पास लौटा, तो दोनों ने फिर से प्रयास किया, लेकिन अब न तो योगी की सिद्धि कार्य कर रही थी और न ही गुणाकर को विद्या प्राप्त हो सकी। दोनों की शक्तियाँ समाप्त हो गईं।
यह कथा सुनाकर बेताल ने राजा विक्रम से पूछा कि दोनों की विद्या क्यों नष्ट हो गई।
राजा विक्रम ने उत्तर दिया कि विद्या और सिद्धि केवल शुद्ध मन और दृढ़ विश्वास से ही टिकती हैं। गुणाकर की विद्या इसलिए नष्ट हुई क्योंकि उसके मन में संदेह और अस्थिरता आ गई, जिससे उसका साधना-बल टूट गया। योगी की विद्या इसलिए नष्ट हुई क्योंकि उसने ऐसी शक्ति का प्रयोग ऐसे व्यक्ति पर किया जो मानसिक रूप से तैयार नहीं था और अपात्र था। गलत पात्रता और अविश्वास—दोनों ही सिद्धि के नाश का कारण बने।
राजा का उत्तर सुनते ही बेताल फिर उड़कर उसी पेड़ पर जा लटका। राजा विक्रम एक बार फिर उसे पकड़ने के लिए लौट पड़ा और बेताल आगे की कथा सुनाने लगा।
बेताल पच्चीसी पिण्ड दान का अधिकारी कौन?
वक्रोलक नामक नगर में सूर्यप्रभ नाम का राजा राज करता था। उसके कोई सन्तान न थी। उसी समय एक दूसरी नगरी में धनपाल नाम का साहूकार रहता था। उसकी स्त्री का नाम हिरण्यवती था और उसकी पुत्री धनवती थी। जब धनवती बड़ी हुई तो धनपाल की मृत्यु हो गयी और उसके रिश्तेदार सारा धन ले गये।
हिरण्यवती अपनी पुत्री को लेकर रात में नगर छोड़कर चल दी। रास्ते में उन्हें एक चोर सूली पर लटका मिला जो अभी जीवित था। उसने हिरण्यवती से कहा कि वह उसे एक हज़ार अशर्फियाँ देगा, बदले में वह अपनी पुत्री का विवाह उससे कर दे। पहले तो हिरण्यवती ने मना किया, पर लालच में आकर मान गयी। चोर ने कहा कि बड़ के पेड़ के नीचे धन गड़ा है, उसे ले लेना और उसके मरने पर उसका क्रिया-कर्म कर देना। कुछ समय बाद चोर मर गया और हिरण्यवती ने वैसा ही किया।
आगे चलकर धनवती का संबंध मनस्वामी नामक एक ब्राह्मण शिष्य से हुआ, जो धन के बदले उससे विवाह करने को तैयार हुआ। उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसे बाद में राजा सूर्यप्रभ ने अपने सपने के निर्देश पर अपना पुत्र मानकर पाला और गद्दी सौंप दी।

वह बालक बड़ा होकर राजा बना और एक दिन गया में पिण्डदान करने गया। वहाँ पिण्ड देने पर तीन हाथ निकले—एक चोर का, एक ब्राह्मण का और एक राजा का। सभी में विवाद हुआ कि असली अधिकारी कौन है।
बेताल ने पूछा, “राजन्, बताओ पिण्ड का अधिकारी कौन है?”
राजा ने कहा, “चोर ही असली अधिकारी है, क्योंकि वही उसका वास्तविक पिता था। बाकी दोनों तो केवल परिस्थितिवश जुड़े थे।”
इतना सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका।
बेताल पच्चीसी बालक क्यों हँसा?
चित्रकूट नगर में एक राजा रहता था। एक दिन वह शिकार खेलने जंगल में गया। घूमते-घूमते वह रास्ता भूल गया और अकेला रह गया। थक कर वह एक पेड़ की छाया में लेटा कि उसे एक ऋषि-कन्या दिखाई दी। उसे देखकर राजा उस पर मोहित हो गया। थोड़ी देर में ऋषि स्वयं आ गये। ऋषि ने पूछा, “तुम यहाँ कैसे आये हो?” राजा ने कहा, “मैं शिकार खेलने आया हूँ।” ऋषि बोले, “बेटा, तुम क्यों जीवों को मारकर पाप कमाते हो?” राजा ने वादा किया कि वह अब कभी शिकार नहीं खेलेगा। खुश होकर ऋषि ने कहा, “तुम्हें जो माँगना हो, माँग लो।” राजा ने ऋषि-कन्या माँगी और ऋषि ने उनका विवाह कर दिया।
राजा जब उसे लेकर चला तो रास्ते में एक भयंकर राक्षस मिला। उसने कहा, “मैं तुम्हारी रानी को खाऊँगा। अगर चाहते हो कि वह बच जाये तो सात दिन के भीतर एक ऐसे ब्राह्मण-पुत्र का बलिदान करो, जो अपनी इच्छा से अपने को दे और उसके माता-पिता उसे मारते समय उसके हाथ-पैर पकड़ें।” डर के मारे राजा ने बात मान ली और दीवान को सब बताया।
दीवान ने योजना बनाई और एक सात वर्ष के ब्राह्मण बालक की सोने की मूर्ति बनवाकर घोषणा करवाई कि जो बालक बलिदान देगा उसे सौ गाँव मिलेंगे। एक ब्राह्मण बालक स्वयं तैयार हो गया। माता-पिता मना करते रहे लेकिन वह नहीं माना। अंत में वे उसे राजा के पास ले गये।
राक्षस के सामने माता-पिता ने उसके हाथ-पैर पकड़े और राजा तलवार उठाने लगा। उसी समय बालक जोर से हँस पड़ा।
बेताल ने पूछा, “हे राजन्! बताओ वह बालक क्यों हँसा?”
राजा ने कहा, “वह इसलिए हँसा क्योंकि उसे यह दृश्य अत्यंत विचित्र लगा—माता-पिता पकड़े हैं, राजा मारने को तैयार है और राक्षस खाने को खड़ा है, फिर भी वह स्वयं परोपकार के लिए बलिदान दे रहा है। इस अद्भुत स्थिति के हर्ष और आश्चर्य से वह हँसा।”
इतना सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका।
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बेताल पच्चीसी प्राचीन भारतीय लोककथाओं का एक प्रसिद्ध संग्रह है, जिसमें राजा विक्रमादित्य और बेताल की रोचक कहानियाँ शामिल हैं। हर कहानी में नैतिक प्रश्न छिपा होता है। ये कहानियाँ बुद्धि, न्याय और सही निर्णय लेने की क्षमता को समझाने का संदेश देती हैं।
लेखक / मूल रचनाकार: बेताल भट्टराव
प्रस्तुति: Saying Central Team





