हितोपदेश

हितोपदेश की कहानियाँ

Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

प्रश्न — हितोपदेश क्या है?

हितोपदेश भारतीय जनजीवन, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से प्रेरित एक प्रसिद्ध नीति-कथा ग्रंथ है। इसकी रचना महान विद्वान पंडित नारायण ने की थी। उन्होंने पंचतंत्र तथा अन्य नीति-ग्रंथों से प्रेरणा लेकर इस कृति का निर्माण किया। भारतीय नीतिकथाओं में पंचतंत्र को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है और हितोपदेश उसी पर आधारित एक सरल, रोचक तथा शिक्षाप्रद ग्रंथ माना जाता है। स्वयं रचयिता ने भी स्वीकार किया है कि यह ग्रंथ पंचतंत्र और अन्य पुस्तकों से सामग्री लेकर तैयार किया गया है — “पंचतंत्रान्तथाडन्यस्माद् ग्रंथादाकृष्य लिख्यते।” हितोपदेश की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सहज और सुबोध कथाएँ हैं, जिन्हें पशु-पक्षियों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इन कहानियों में जानवरों को मानवीय गुणों और व्यवहारों के साथ दिखाया गया है, ताकि पाठकों को नीति, बुद्धिमानी, मित्रता, व्यवहार-कुशलता और जीवन के महत्वपूर्ण सिद्धांत सरल ढंग से समझाए जा सकें। प्रत्येक कथा के अंत में कोई न कोई प्रेरणादायक शिक्षा अवश्य मिलती है, जिससे यह ग्रंथ केवल मनोरंजन ही नहीं बल्कि ज्ञान और नैतिक सीख का भी महत्वपूर्ण स्रोत बन जाता है।

हितोपदेश की प्रमुख कथाएँ

हितोपदेश में अनेक शिक्षाप्रद और रोचक कथाएँ संकलित हैं। इन कहानियों के माध्यम से मित्रता, बुद्धिमानी, नीति, सावधानी, एकता और व्यवहार-कुशलता की शिक्षा दी गई है। इसकी प्रमुख कथाएँ निम्नलिखित हैं —

मित्रलाभ

सुवर्ण कंकण धारण करने वाले बूढ़े बाघ और मुसाफिर की कथा
कबूतर, कौआ, कछुआ, हिरण और चूहे की कथा
हिरण, कौआ और गीदड़ की कथा
भैरव शिकारी, हिरण, सूअर, साँप और गीदड़ की कथा
धूर्त गीदड़ और हाथी की कथा

सुहृद्भेद

एक बनिये, बैल, सिंह और गीदड़ों की कथा
धोबी, धोबिन, गधे और कुत्ते की कथा
सिंह, चूहे और बिलाव की कथा
बंदर, घंटा और कराला नामक कुटनी की कथा
सिंह और बूढ़े खरगोश की कथा
कौओं के जोड़े और काले साँप की कथा

विग्रह

पक्षियों और बंदरों की कथा
बाघ की खाल ओढ़े धोबी के गधे और खेत के रखवालों की कथा
हाथियों के झुंड और बूढ़े खरगोश की कथा
हंस, कौआ और एक मुसाफिर की कथा
नीले रंग में रंगे गीदड़ की कथा
राजकुमार और उसके पुत्र के बलिदान की कथा
एक क्षत्रिय, नाई और भिखारी की कथा

संधि

संन्यासी और चूहे की कथा
बूढ़े बगुले, केंकड़े और मछलियों की कथा
सुन्द और उपसुन्द नामक दो दैत्यों की कथा
एक ब्राह्मण, बकरे और तीन धूर्त व्यक्तियों की कथा
माधव ब्राह्मण, उसके पुत्र, नेवले और साँप की कथा

मित्रलाभ

सुवर्ण कंकणधारी बूढ़ा बाघ और मुसाफिर की कहानी

बहुत समय पहले दक्षिण दिशा के एक घने वन में एक बूढ़ा बाघ रहता था। उम्र अधिक हो जाने के कारण अब वह पहले की तरह शिकार नहीं कर पाता था। एक दिन वह नदी में स्नान करके बाहर आया और हाथ में कुश धारण करके धर्मात्मा बनने का दिखावा करने लगा। फिर वह रास्ते से गुजरने वाले यात्रियों को ऊँची आवाज़ में पुकारते हुए कहने लगा — “हे पथिकों! मेरे पास यह सोने का कंगन है, जिसे कोई लेना चाहता हो तो आकर ले जाए।”

उसकी बातें सुनकर एक मुसाफिर के मन में लालच उत्पन्न हो गया। उसने मन ही मन सोचा कि ऐसा बहुमूल्य सुवर्ण कंगन हर किसी को भाग्य से ही मिलता है। लेकिन अगले ही क्षण उसके मन में भय भी जाग उठा, क्योंकि सामने एक बाघ खड़ा था और उसके पास जाना प्राणों को संकट में डालना था। वह सोचने लगा कि जहाँ मृत्यु का डर हो, वहाँ लाभ दिखाई देने पर भी सावधानी बरतनी चाहिए। जिस प्रकार विष मिला हुआ अमृत भी अंत में मृत्यु का कारण बन जाता है, उसी प्रकार संकट भरे स्थान पर प्राप्त होने वाला धन भी विनाश ला सकता है।

फिर मुसाफिर ने अपने मन को समझाते हुए सोचा कि संसार में धन कमाने के अधिकांश कार्य किसी न किसी जोखिम से भरे होते हैं। जो व्यक्ति हर डर से पीछे हट जाता है, वह कभी सफलता और लाभ प्राप्त नहीं कर पाता। इसलिए उसने निश्चय किया कि पहले इस बाघ की बातों की सच्चाई परखनी चाहिए। उसने दूर से ही ऊँची आवाज़ में पूछा — “यदि तुम्हारे पास सचमुच सोने का कंगन है, तो मुझे दिखाओ।” यह सुनकर बाघ ने अपना पंजा आगे बढ़ाया और चमकता हुआ स्वर्ण कंगन दिखाने लगा।

कंगन देखकर मुसाफिर का लोभ और बढ़ गया, लेकिन उसका डर अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। उसने संदेह भरे स्वर में कहा — “तुम तो मनुष्यों का शिकार करने वाले हिंसक जीव हो, फिर तुम पर विश्वास कैसे किया जा सकता है?” यह सुनकर बाघ बहुत मीठी वाणी में बोला — “लोग मुझे केवल पुरानी धारणाओं के कारण दुष्ट समझते हैं। पहले मैं अवश्य पापी था, लेकिन अब मैंने हिंसा छोड़ दी है और धर्म का मार्ग अपना लिया है। मैं दान देकर अपने पुराने पापों का प्रायश्चित करना चाहता हूँ, इसलिए यह सुवर्ण कंगन किसी निर्धन व्यक्ति को देना चाहता हूँ।”

बाघ आगे धर्म और दया की बातें करने लगा। उसने कहा — “जिस प्रकार मरुभूमि में वर्षा का होना उपयोगी माना जाता है, और जैसे भूखे व्यक्ति को भोजन कराने से पुण्य मिलता है, वैसे ही गरीब व्यक्ति को दिया गया दान सबसे अधिक फलदायी होता है। संसार में सज्जन वही कहलाता है जो सभी जीवों को अपने समान समझे और दूसरों के दुख को अपना दुख माने।” फिर उसने कई नीति वचन सुनाते हुए मुसाफिर को अपने शब्दों के जाल में फँसाना शुरू कर दिया।

बाघ की मीठी और धार्मिक बातें सुनकर मुसाफिर का भय धीरे-धीरे कम होने लगा। अब उसके मन में यह विश्वास पैदा होने लगा कि शायद बाघ सचमुच बदल चुका है। वह सोचने लगा कि भाग्य से मिलने वाली वस्तु को छोड़ देना मूर्खता होगी। उसने यह भी विचार किया कि जब चंद्रमा जैसा तेजस्वी ग्रह भी कभी-कभी राहु के प्रभाव में आ जाता है, तब संसार में भाग्य से बढ़कर कुछ नहीं होता। जो विधाता ने मनुष्य के भाग्य में लिख दिया है, उसे कोई मिटा नहीं सकता।

इन्हीं विचारों में डूबा हुआ वह मुसाफिर धीरे-धीरे बाघ के पास पहुँच गया। जैसे ही वह उसके निकट पहुँचा, बाघ ने अचानक उस पर आक्रमण कर दिया। मुसाफिर संभल भी नहीं पाया और देखते ही देखते बाघ ने उसे मार डाला। इसके बाद वह उसे खाकर शांतिपूर्वक बैठ गया।

इसीलिए कहा गया है कि लोभ मनुष्य की बुद्धि को नष्ट कर देता है। जो व्यक्ति बिना सोच-विचार के केवल लालच में आकर निर्णय लेता है, उसका अंत अक्सर दुख और विनाश में होता है। इसलिए किसी भी कार्य को करने से पहले उसके परिणामों पर अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिए।

कबूतर, काक, कछुआ, मृग और चूहे की कहानी

गोदावरी नदी के किनारे एक बहुत विशाल सैमल का पेड़ था। उस पेड़ पर दूर-दूर से आने वाले अनेक पक्षी रात के समय विश्राम किया करते थे। एक दिन रात समाप्त होने ही वाली थी और चंद्रमा धीरे-धीरे अस्त होने जा रहा था। उसी समय लघुपतनक नाम का एक बुद्धिमान कौआ नींद से जागा। उसने सामने से एक बहेलिये को आते हुए देखा, जो हाथ में जाल और अन्य सामान लिए हुए था। उसे देखकर कौए के मन में अशुभ विचार उत्पन्न हुआ और वह सोचने लगा कि आज प्रातःकाल ही किसी अनिष्ट का संकेत दिखाई दे रहा है।

कुछ ही देर बाद वह बहेलिया पेड़ के नीचे पहुँचा और उसने बड़ी चालाकी से चावल के दाने चारों ओर बिखेर दिए। फिर उसने उन दानों के ऊपर अपना जाल फैला दिया और पास ही छिपकर बैठ गया। उसी समय चित्रग्रीव नाम का कबूतरों का राजा अपने पूरे समूह के साथ आकाश में उड़ता हुआ वहाँ पहुँचा। उड़ते-उड़ते उसकी दृष्टि नीचे बिखरे हुए चावलों पर पड़ी। यह देखकर उसने अपने साथियों से कहा कि इस सुनसान वन में अचानक इतने चावल दिखाई देना साधारण बात नहीं है। अवश्य ही इसके पीछे कोई छल छिपा हुआ है, इसलिए बिना सोचे-समझे नीचे उतरना उचित नहीं होगा।

चित्रग्रीव ने अपने साथियों को समझाते हुए कहा कि हर कार्य को सोच-विचार कर करना चाहिए। बिना विचार किए उठाया गया कदम कई बार मनुष्य को संकट में डाल देता है। उसने कहा कि जो व्यक्ति धैर्य और बुद्धि से काम लेता है, वही लंबे समय तक सुखी रहता है। लेकिन उसके समूह में एक घमंडी कबूतर था, जिसे अपने ज्ञान और समझ पर बहुत अभिमान था। उसने राजा की बात सुनकर हँसते हुए कहा कि हर बात में संदेह करना भी उचित नहीं होता। यदि मनुष्य हर जगह डरता रहे, तो वह जीवन में कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता।

उस घमंडी कबूतर ने बाकी कबूतरों को भी अपने पक्ष में कर लिया। उसने कहा कि संसार में हर वस्तु में कुछ न कुछ भय और संदेह होता ही है। यदि हर बार शंका करके पीछे हट जाएँ, तो भोजन और जीवन दोनों कठिन हो जाएँगे। उसके शब्द सुनकर बाकी कबूतर भी लालच में आ गए और सभी नीचे उतरकर चावल चुगने लगे। जैसे ही वे दाने खाने लगे, उसी क्षण बहेलिये का जाल उन पर गिर पड़ा और पूरा झुंड उसमें फँस गया।

जाल में फँसते ही सभी कबूतर घबरा गए और अपने भाग्य को कोसने लगे। लेकिन चित्रग्रीव ने धैर्य नहीं खोया। उसने अपने साथियों से कहा कि संकट के समय घबराने के बजाय बुद्धि से काम लेना चाहिए। उसने सबको एक साथ मिलकर उड़ने का आदेश दिया। राजा की बात मानकर सभी कबूतरों ने एक साथ अपने पंख फड़फड़ाए और पूरे जाल को उठाकर आकाश में उड़ गए। यह देखकर बहेलिया आश्चर्यचकित रह गया और उनके पीछे भागने लगा, लेकिन कबूतर बहुत दूर निकल चुके थे।

उड़ते-उड़ते चित्रग्रीव अपने पुराने मित्र हिरण्यक नाम के चूहे के पास पहुँचा, जो एक सुरक्षित बिल में रहता था। कबूतरों को जाल में फँसा देखकर चूहा पहले घबरा गया, लेकिन जब उसने चित्रग्रीव को पहचाना तो तुरंत बाहर आ गया। चित्रग्रीव ने अपने मित्र से सहायता माँगी। चूहे ने बिना देर किए अपने तेज दाँतों से जाल को काटना शुरू कर दिया। उसने सबसे पहले अपने मित्र राजा चित्रग्रीव को मुक्त करने के बजाय बाकी कबूतरों के बंधन काटे। यह देखकर चित्रग्रीव बहुत प्रसन्न हुआ, क्योंकि सच्चा नेता वही होता है जो अपने साथियों का हित पहले सोचता है।

कुछ समय बाद सभी कबूतर जाल से मुक्त हो गए और चूहे को धन्यवाद देने लगे। यह दृश्य पेड़ पर बैठा लघुपतनक कौआ भी देख रहा था। वह चूहे की बुद्धिमानी और मित्रता से अत्यंत प्रभावित हुआ। धीरे-धीरे कौए और चूहे में भी गहरी मित्रता हो गई। बाद में उनके साथ एक कछुआ और एक हिरण भी मित्र बन गए। वे सभी आपस में प्रेम, सहयोग और विश्वास के साथ रहने लगे।

इस कथा से शिक्षा मिलती है कि लोभ मनुष्य की बुद्धि को नष्ट कर देता है। लालच में आकर लिया गया निर्णय अक्सर दुख और संकट का कारण बनता है। साथ ही यह भी सीख मिलती है कि संकट के समय धैर्य, एकता और सच्ची मित्रता ही मनुष्य को कठिन परिस्थितियों से बाहर निकालती है।

अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो अन्य ज्ञानवर्धक और नैतिक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।

हितोपदेश भारतीय नीति कथाओं का प्रसिद्ध संग्रह है, जिसमें जानवरों और पात्रों के माध्यम से जीवन की महत्वपूर्ण सीख दी गई है। ये कहानियाँ मनोरंजन के साथ-साथ बुद्धिमानी, मित्रता, ईमानदारी और सही निर्णय लेने की प्रेरणा देती हैं। बच्चों से लेकर बड़ों तक, हर उम्र के लोग इन कहानियों से ज्ञान और नैतिक शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

 लेखक / मूल रचनाकार: नारायण पंडित
 प्रस्तुति: Saying Central Team

आपको यह कहानी पसंद आई?

इसे रेट करने के लिए किसी स्टार पर क्लिक करें!

औसत श्रेणी 0 / 5. मतों की गिनती: 0

अभी तक कोई वोट नहीं! इस पोस्ट को रेटिंग देने वाले पहले व्यक्ति बनें।

Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

QUOTE OF THE DAY

RECENT STORIES

SHORT STORIES

FEATURED STORIES

CATEGORIES