महाभारत भारत के सबसे महान और प्राचीन महाकाव्यों में से एक माना जाता है। इसमें केवल कुरुक्षेत्र के युद्ध का वर्णन ही नहीं, बल्कि जीवन, धर्म, रिश्तों, नीति और कर्म से जुड़ी गहरी सीख भी छिपी हुई है। महाभारत की कथाएँ आज भी लोगों को प्रेरणा और मार्गदर्शन देती हैं। ऐसी ही कुछ रोचक और ज्ञानवर्धक कहानियाँ हम आपके साथ साझा कर रहे हैं।
पाण्डवों का स्वर्गारोहण
महाभारत के युद्ध के बाद जब हस्तिनापुर में शांति स्थापित हो गई और धर्मराज युधिष्ठिर न्यायपूर्वक राज्य चलाने लगे, तब भी समय की गति निरंतर आगे बढ़ती रही। एक दिन अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से मिलने तथा भविष्य की स्थिति जानने के लिए द्वारिका गए।
कई महीने बीत जाने के बाद भी जब अर्जुन वापस नहीं लौटे, तब युधिष्ठिर के मन में गहरी चिंता उत्पन्न होने लगी। उन्हें चारों ओर अजीब और भयावह संकेत दिखाई देने लगे। कभी आकाश में उल्काएँ टूटतीं, कभी पृथ्वी काँप उठती। सूर्य का तेज मंद पड़ चुका था और रात के समय चंद्रमा के चारों ओर विचित्र मंडल दिखाई देते थे। पशु-पक्षियों का असामान्य व्यवहार भी आने वाले किसी बड़े अनर्थ की सूचना दे रहा था।
धर्मराज युधिष्ठिर ने व्याकुल होकर भीमसेन से कहा कि प्रकृति के ये संकेत साधारण नहीं हैं। सियार दिन में रो रहे हैं, कुत्ते और उल्लू रातभर अशुभ ध्वनि कर रहे हैं, गायों की आँखों से आँसू बह रहे हैं और वातावरण में एक अजीब सी उदासी छा गई है।
उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पृथ्वी पर कोई बहुत बड़ा परिवर्तन होने वाला हो। उनके मन में सबसे अधिक चिंता भगवान श्रीकृष्ण को लेकर थी। वे सोचने लगे कि कहीं द्वारिका में कोई विपत्ति तो नहीं आ गई। इसी चिंता और अशांति के बीच अचानक अर्जुन हस्तिनापुर लौटते दिखाई दिए, परंतु उनका स्वरूप देखकर सभी चकित रह गए।
अर्जुन का तेज मानो कहीं खो चुका था। उनका सिर झुका हुआ था, आँखों से निरंतर आँसू बह रहे थे और शरीर अत्यंत दुर्बल प्रतीत हो रहा था। वे सीधे युधिष्ठिर के चरणों में गिर पड़े। धर्मराज ने घबराकर उनसे द्वारिका का समाचार पूछा। उन्होंने एक-एक करके अपने सभी संबंधियों का हाल जानना चाहा—वसुदेव, देवकी, उग्रसेन, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, साम्ब और भगवान श्रीकृष्ण की समस्त रानियों का।
युधिष्ठिर बार-बार पूछते रहे कि सब कुशल तो है, परंतु अर्जुन के आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। अंततः भारी दुःख से भरे हुए अर्जुन ने काँपती आवाज़ में कहा कि अब द्वारिका में कुछ भी शेष नहीं रहा।
अर्जुन ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण इस संसार से अपने दिव्य धाम को प्रस्थान कर चुके हैं। उनके जाते ही समस्त यदुवंश विनाश के मार्ग पर चल पड़ा। ब्राह्मणों के श्राप और आपसी अहंकार के कारण यादवों में भयंकर कलह उत्पन्न हो गया।
मदिरा के प्रभाव में वे एक-दूसरे के शत्रु बन बैठे और युद्ध करते-करते पूरा यदुवंश नष्ट हो गया। द्वारिका की भूमि शोक और विनाश से भर गई। भगवान श्रीकृष्ण ने भी अपनी लीला पूर्ण कर संसार का त्याग कर दिया। अर्जुन यह कहते हुए बार-बार रो उठते कि जिन श्रीकृष्ण के साथ रहते हुए देवता भी उनसे भय खाते थे, उन्हीं के बिना वे अब बिल्कुल असहाय हो गए हैं।
अर्जुन ने आगे बताया कि जब वे श्रीकृष्ण की रानियों और स्त्रियों को सुरक्षित हस्तिनापुर ला रहे थे, तब मार्ग में कुछ भीलों ने उन पर आक्रमण कर दिया। उनके हाथ में वही गाण्डीव धनुष था, वही दिव्य बाण थे और वही रथ था जिसने महाभारत के महायुद्ध में असंख्य महारथियों को परास्त किया था, लेकिन उस दिन उनकी सारी शक्ति मानो समाप्त हो चुकी थी।
वे उन स्त्रियों की रक्षा नहीं कर सके और साधारण भीलों के सामने स्वयं को निर्बल अनुभव करते रहे। अर्जुन को तब समझ आया कि उनकी सारी शक्ति वास्तव में श्रीकृष्ण की कृपा से ही थी। भगवान के बिना उनका पराक्रम भी नष्ट हो चुका था।
अर्जुन की बातें सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर गहरे विचार में डूब गए। उन्होंने समझ लिया कि अब द्वापर युग समाप्त हो चुका है और कलियुग का आरंभ होने वाला है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी का भार उतारने के लिए मानव रूप धारण किया था और अब अपना कार्य पूर्ण करके वे वापस चले गए हैं।
इसलिए अब संसार में रहने का कोई उद्देश्य शेष नहीं बचा। युधिष्ठिर ने निश्चय किया कि अब उन्हें भी राजपाट त्यागकर परमधाम की यात्रा करनी चाहिए। इसी बीच माता कुन्ती को जब श्रीकृष्ण के प्रस्थान का समाचार मिला, तब उन्होंने भी भगवान का ध्यान करते हुए अपने प्राण त्याग दिए।
इसके बाद युधिष्ठिर ने राज्य की सारी जिम्मेदारियाँ अगली पीढ़ी को सौंप दीं। उन्होंने अर्जुन के पौत्र परीक्षित का हस्तिनापुर के सिंहासन पर अभिषेक किया और मथुरा में अनिरुद्ध के पुत्र वज्र को राजा बनाया। सब कार्य पूर्ण करने के बाद पाँचों पाण्डव और द्रौपदी राजसी वस्त्र त्यागकर साधु के समान जीवन धारण करने लगे। युधिष्ठिर ने मौन व्रत धारण किया, अपने केश खोल दिए और सांसारिक मोह-माया से स्वयं को पूरी तरह अलग कर लिया।
इसके बाद वे अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ हिमालय की ओर अंतिम यात्रा पर निकल पड़े। इस यात्रा को महाप्रस्थान कहा गया।
हिमालय की कठिन यात्रा में सबसे पहले द्रौपदी गिर पड़ीं। भीमसेन ने युधिष्ठिर से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि द्रौपदी पाँचों पतियों में अर्जुन को सबसे अधिक प्रेम करती थीं, इसलिए उन्हें यह फल मिला। आगे बढ़ने पर सहदेव गिरे क्योंकि उन्हें अपने ज्ञान पर गर्व था।
फिर नकुल गिरे क्योंकि उन्हें अपने सौंदर्य का अहंकार था। उसके बाद अर्जुन भी गिर पड़े क्योंकि उन्हें अपने पराक्रम पर अत्यधिक अभिमान था। अंत में भीमसेन भी धरती पर गिर गए क्योंकि उन्हें अपनी शक्ति और भोजन प्रियता पर गर्व था। युधिष्ठिर अकेले आगे बढ़ते रहे क्योंकि उन्होंने धर्म का कभी साथ नहीं छोड़ा था।
अंततः देवराज इन्द्र दिव्य रथ लेकर युधिष्ठिर के पास आए और उन्हें स्वर्ग चलने के लिए कहा। युधिष्ठिर अपने धर्म और सत्य के कारण जीवित शरीर से ही स्वर्ग पहुँचने वाले प्रथम मनुष्य बने। स्वर्ग में उन्होंने अपने भाइयों, द्रौपदी तथा महाभारत में मारे गए अनेक वीरों को दिव्य स्वरूप में देखा। वहाँ भगवान श्रीकृष्ण भी अपने परम तेजस्वी रूप में विराजमान थे।

अपने प्रिय सखा के दर्शन करके युधिष्ठिर का हृदय आनंद और शांति से भर गया। इस प्रकार पाण्डवों की पृथ्वी पर लीला समाप्त हुई और वे अपने दिव्य लोक को प्राप्त हुए। कहते हैं कि जो श्रद्धा और भक्ति से इस कथा का स्मरण करता है, उसके मन में धर्म, वैराग्य और भगवान के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है।
श्रीकृष्ण का स्वधाम गमन
महाभारत का भीषण युद्ध समाप्त हो चुका था। कुरुक्षेत्र की भूमि पर चारों ओर विनाश और मृत्यु का सन्नाटा फैला हुआ था। पाण्डव विजय प्राप्त कर चुके थे, किन्तु इस विजय के पीछे असंख्य वीरों का रक्त और अनगिनत परिवारों का दुःख छिपा था।
युद्ध समाप्त होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ युद्धभूमि से लौट रहे थे। तभी उन्होंने अर्जुन से कहा कि वे तुरंत अपने रथ से नीचे उतर जाएँ। अर्जुन को यह बात कुछ विचित्र लगी, क्योंकि युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण स्वयं अंत में रथ से उतरते थे। फिर भी उन्होंने बिना प्रश्न किए आज्ञा का पालन किया और रथ से नीचे उतर आए।
अर्जुन के नीचे उतरते ही भगवान श्रीकृष्ण उन्हें थोड़ी दूरी पर ले गए। इसके बाद उन्होंने रथ के ध्वज पर विराजमान श्रीहनुमान को संकेत किया कि अब वे भी वहाँ से प्रस्थान करें। जैसे ही पवनपुत्र हनुमान ध्वज से अदृश्य हुए, उसी क्षण अर्जुन के रथ के घोड़े भयंकर अग्नि में जल उठे और पूरा रथ एक प्रचंड विस्फोट के साथ भस्म हो गया।
यह दृश्य देखकर अर्जुन भय और आश्चर्य से काँप उठे। उन्हें समझ ही नहीं आया कि ऐसा कैसे हो गया। तब श्रीकृष्ण मुस्कराए और बोले कि युद्ध के दौरान भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण और अश्वत्थामा जैसे महायोद्धाओं ने अनेक दिव्य और विनाशकारी अस्त्र इस रथ पर चलाए थे। उन अस्त्रों की अग्नि उसी समय रथ को नष्ट कर सकती थी, लेकिन भगवान की कृपा और हनुमानजी की दिव्य शक्ति के कारण वह अब तक सुरक्षित था।
युद्ध समाप्त होने के बाद हस्तिनापुर में शोक और विलाप का वातावरण था। अपने सौ पुत्रों की मृत्यु से माता गांधारी का हृदय टूट चुका था। जब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें सांत्वना देने पहुँचे, तब गांधारी के भीतर का दुःख क्रोध में बदल गया। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि यदि वे चाहते तो यह महाविनाश रोक सकते थे, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया।
अपने पुत्रों के वियोग में व्याकुल गांधारी ने क्रोध और पीड़ा में भगवान श्रीकृष्ण को श्राप दे दिया कि जैसे कौरव आपस में लड़कर नष्ट हुए हैं, वैसे ही एक दिन यदुवंश भी अपने ही हाथों विनाश को प्राप्त होगा। श्रीकृष्ण सब जानते हुए भी शांत रहे, क्योंकि वे समझते थे कि समय का विधान बदलना संभव नहीं है।
समय बीतता गया और धीरे-धीरे यादवों में शक्ति, वैभव और अहंकार बढ़ने लगा। द्वारिका के वीर यदुवंशी अपने पराक्रम पर अत्यधिक गर्व करने लगे थे। एक दिन कुछ यदुवंशी युवकों ने ऋषियों के साथ अनुचित व्यवहार किया। उन्होंने मज़ाक और अहंकार में आकर महान तपस्वी ऋषियों का अपमान कर दिया।
ऋषियों ने क्रोधित होकर उन्हें श्राप दिया कि यही अहंकार एक दिन पूरे यदुवंश के विनाश का कारण बनेगा। भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि अब पृथ्वी पर उनकी लीला समाप्त होने का समय निकट आ गया है, इसलिए उन्होंने भी समय की गति को उसी दिशा में बढ़ने दिया।
कुछ समय बाद सभी यदुवंशी प्रभास क्षेत्र में एक पर्व के अवसर पर एकत्र हुए। वहाँ उत्सव और आनंद के वातावरण में उन्होंने अत्यधिक मदिरा का सेवन कर लिया। मदिरा के प्रभाव से उनका विवेक नष्ट हो गया और छोटी-छोटी बातों पर विवाद प्रारंभ हो गया।
धीरे-धीरे यह विवाद भयंकर युद्ध में बदल गया। जो वीर कभी बाहरी शत्रुओं को पराजित करते थे, वे अब अपने ही भाइयों और संबंधियों के रक्त के प्यासे बन गए। क्रोध और नशे में अंधे होकर उन्होंने एक-दूसरे पर प्रहार करना शुरू कर दिया। कुछ ही समय में पूरा प्रभास क्षेत्र युद्धभूमि बन गया और देखते ही देखते यदुवंश का विनाश हो गया। भगवान श्रीकृष्ण के अतिरिक्त कोई भी यादव जीवित नहीं बचा।
अपने प्रिय कुल का यह अंत देखकर भी भगवान श्रीकृष्ण शांत रहे, क्योंकि यह सब उनकी दिव्य लीला और समय के विधान का हिस्सा था। उन्होंने समझ लिया कि अब पृथ्वी पर उनका कार्य पूर्ण हो चुका है। वे द्वारिका छोड़कर सोमनाथ के निकट एक शांत वन में चले गए। वहाँ एक विशाल पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर उन्होंने ध्यान लगाना आरंभ किया।
उनका मन अब सांसारिक लीला से पूरी तरह मुक्त हो चुका था। वे योगबल से अपने परमधाम लौटने की तैयारी कर रहे थे। उस समय उनके चरणों का तलवा दूर से किसी हिरण की आँख जैसा चमक रहा था।
उसी वन में जरा नाम का एक बहेलिया शिकार की खोज में घूम रहा था। उसने दूर से भगवान श्रीकृष्ण के चरणों को हिरण समझ लिया और बिना ध्यान से देखे अपने धनुष से एक विषैला बाण चला दिया। वह बाण जाकर श्रीकृष्ण के चरण में लगा।
जब बहेलिया पास आया और उसे अपनी भूल का पता चला, तब वह भय और पश्चाताप से काँप उठा। वह भगवान के चरणों में गिर पड़ा और क्षमा माँगने लगा। लेकिन श्रीकृष्ण ने उसे प्रेमपूर्वक सांत्वना दी और कहा कि यह सब पूर्वनिश्चित था। उन्होंने बहेलिये को दोषमुक्त किया और उसे आशीर्वाद दिया।
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य दृष्टि से समस्त संसार को देखा और धीरे-धीरे योगबल से अपने देह का त्याग कर वैकुण्ठ धाम को प्रस्थान किया। उनके स्वधाम गमन के साथ ही द्वापर युग का अंत हो गया और कलियुग का आरंभ हुआ। पृथ्वी से धर्म और सत्य का प्रकाश धीरे-धीरे कम होने लगा।
श्रीकृष्ण की यह लीला केवल एक अंत नहीं थी, बल्कि यह संदेश भी थी कि इस संसार में जन्म लेने वाला प्रत्येक प्राणी एक दिन समय के साथ विलीन हो जाता है, केवल भगवान और उनका सत्य ही सदा शाश्वत रहता है।
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महाभारत भारतीय संस्कृति का महान महाकाव्य है। इसमें कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध, धर्म-अधर्म, सत्य, कर्तव्य और मानव जीवन के मूल्यों का वर्णन किया गया है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित यह ग्रंथ भारतीय इतिहास, दर्शन और नैतिक शिक्षा का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
लेखक / मूल रचनाकार: वेद व्यास
प्रस्तुति: Saying Central Team





