हितोपदेश

हितोपदेश संधि की कहानी

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बूढ़े बगुले, केंकड़े और मछलियों की कहानी

हितोपदेश : बहुत समय पहले मालव देश में पद्मगर्भ नाम का एक विशाल और सुंदर सरोवर था। उस सरोवर का जल स्वच्छ और निर्मल था। उसमें अनेक प्रकार की मछलियाँ, केंकड़े और जलचर जीव आनंद से रहते थे। उसी सरोवर के किनारे एक बूढ़ा बगुला भी रहता था। पहले वह फुर्ती से मछलियाँ पकड़कर अपना पेट भर लिया करता था, लेकिन अब वृद्धावस्था के कारण उसका शरीर कमजोर हो गया था। उसमें पहले जैसी शक्ति और तेजी नहीं रही थी। इसलिए वह भूखा रहने लगा और भोजन के लिए चिंतित रहने लगा।

एक दिन वह सरोवर के किनारे उदास और चिंतित होकर बिल्कुल शांत बैठा था। उसने ऐसा दिखावा किया मानो उसे संसार से कोई मोह न रहा हो। उसी समय एक केंकड़े ने उसे देखा। वह बगुले के पास आया और बोला, “मामा, आज आप इतने उदास और चुपचाप क्यों बैठे हैं? न तो आप भोजन कर रहे हैं और न ही किसी मछली को पकड़ने का प्रयास कर रहे हैं। क्या बात है?”
बगुले ने गहरी साँस लेते हुए दुखी स्वर में कहा, “बेटा, अब मेरा मन भोजन में नहीं लगता। मैंने नगर के पास कुछ मछुआरों को बात करते सुना है। वे लोग शीघ्र ही इस सरोवर में आकर जाल डालेंगे और यहाँ की सारी मछलियों को पकड़ ले जाएँगे। यह सोचकर मेरा हृदय दुख से भर गया है। जिन मछलियों पर मेरा जीवन चलता था, उन्हीं का विनाश मैं कैसे देख सकता हूँ? इसलिए मैंने भोजन त्याग दिया है।”

केंकड़े ने यह बात अन्य मछलियों को बताई। सब मछलियाँ घबरा गईं। वे सोचने लगीं कि यह बूढ़ा बगुला वास्तव में हमारा हित चाहता है, तभी तो हमारे दुःख में स्वयं भी दुखी है। फिर वे सब उसके पास गईं और बोलीं, “हे बगुले मामा! यदि ऐसा संकट आने वाला है, तो हमारी रक्षा का क्या उपाय है?”

बगुला मन ही मन प्रसन्न हुआ, क्योंकि उसकी चाल सफल हो रही थी। उसने गंभीरता से कहा, “यहाँ से कुछ दूर एक बहुत बड़ा और सुरक्षित सरोवर है। वहाँ न मछुआरे आते हैं और न कोई खतरा है। यदि तुम चाहो तो मैं एक-एक करके तुम्हें अपनी पीठ पर बैठाकर वहाँ पहुँचा सकता हूँ।”

डरी हुई मछलियों ने तुरंत उसकी बात मान ली। वे बोलीं, “मामा, कृपा करके हमें बचा लीजिए।”
अब बगुला प्रतिदिन एक मछली को अपनी पीठ पर बैठाकर ले जाने का बहाना करता। लेकिन वह उन्हें किसी दूसरे सरोवर में नहीं ले जाता था। थोड़ी दूर एक चट्टान के पास जाकर वह उन्हें मारकर खा जाता। इस प्रकार बिना मेहनत के उसे प्रतिदिन स्वादिष्ट भोजन मिलने लगा। धीरे-धीरे उसने बहुत सी मछलियों को इसी प्रकार धोखे से खा लिया।

कुछ समय बाद सरोवर में रहने वाले केंकड़े ने भी बगुले से कहा, “मामा, आपने इतनी मछलियों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया। अब मुझे भी वहाँ ले चलिए।”
बगुला सोचने लगा, “आज तो मुझे नए स्वाद का भोजन मिलेगा। मछलियाँ तो बहुत खा चुका, अब केंकड़े का मांस खाऊँगा।” यह सोचकर उसने बड़ी प्रसन्नता से केंकड़े को अपनी पीठ पर बैठा लिया और उड़ चला।

जब वे उस चट्टान के पास पहुँचे, तो केंकड़े ने नीचे देखा। वहाँ चारों ओर मछलियों की हड्डियाँ बिखरी पड़ी थीं। वह तुरंत समझ गया कि बगुला उन सबको खाकर यहीं समाप्त करता रहा है। अब उसे अपनी मृत्यु सामने दिखाई देने लगी। लेकिन वह घबराया नहीं। उसने सोचा, “अब संकट सामने है, इसलिए बुद्धि और साहस से काम लेना होगा।”

जैसे ही बगुला उसे नीचे उतारने लगा, केंकड़े ने अपने मजबूत पंजों से बगुले की गर्दन कसकर पकड़ ली और पूरी ताकत से उसकी गर्दन काट डाली। बगुला वहीं तड़पकर मर गया।

इसके बाद केंकड़ा धीरे-धीरे वापस सरोवर में लौट आया और उसने सारी घटना बाकी जलचरों को बता दी। सबने उसकी बुद्धिमानी की प्रशंसा की और राहत की साँस ली।

इस कथा से शिक्षा मिलती है कि मीठी बातें करने वाले हर व्यक्ति पर तुरंत विश्वास नहीं करना चाहिए। छल और कपट से दूसरों को धोखा देने वाला अंततः स्वयं अपने ही जाल में फँस जाता है। साथ ही संकट के समय बुद्धि और धैर्य ही सबसे बड़ी शक्ति होते हैं।

सुन्द और उपसुन्द नामक दो दैत्यों की कहानी

बहुत प्राचीन समय की बात है। सुन्द और उपसुन्द नाम के दो दैत्य भाई रहते थे। दोनों अत्यंत पराक्रमी, बलवान और एक-दूसरे से गहरा प्रेम करने वाले थे। वे हर कार्य साथ करते, साथ खाते-पीते और कभी अलग नहीं होते थे। उनके बीच इतना स्नेह था कि संसार में उनकी एकता का उदाहरण दिया जाता था।

लेकिन उनके मन में एक बड़ी महत्वाकांक्षा थी। वे तीनों लोकों पर अधिकार प्राप्त करना चाहते थे। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए दोनों भाइयों ने कठोर तपस्या करने का निश्चय किया। वे जंगल में जाकर वर्षों तक भगवान महादेव की आराधना करने लगे। उन्होंने भोजन, सुख और आराम का त्याग कर दिया और कठिन तप में लीन हो गए।

उनकी घोर तपस्या से अंततः भगवान महादेव प्रसन्न हुए। वे उनके सामने प्रकट हुए और बोले, “हे दैत्यों! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। जो वर माँगना चाहते हो, माँगो।”

उसी समय उनके हृदय में स्थित देवी सरस्वती ने उनकी बुद्धि भ्रमित कर दी। वे वास्तव में कुछ और माँगना चाहते थे, लेकिन मोह और अविवेक के कारण उनके मुख से कुछ और ही निकल गया। उन्होंने कहा, “यदि आप हम पर प्रसन्न हैं, तो अपनी प्रिय पत्नी पार्वतीजी हमें दे दीजिए।”

यह सुनते ही भगवान महादेव क्रोधित हो उठे। लेकिन वर देने का वचन दे चुके थे, इसलिए उन्होंने विवश होकर पार्वतीजी को उनके साथ भेज दिया।
जब दोनों दैत्यों ने माता पार्वती के अनुपम सौंदर्य को देखा, तो उनके मन में काम और मोह उत्पन्न हो गया। जो भाई पहले एक-दूसरे के लिए प्राण देने को तैयार रहते थे, वही अब पार्वतीजी को लेकर आपस में झगड़ने लगे। दोनों कहने लगे, “पार्वती मेरी है।” दूसरा कहता, “नहीं, यह मेरी है।”

धीरे-धीरे विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों एक-दूसरे के शत्रु बन बैठे। अंततः उन्होंने निश्चय किया कि किसी बुद्धिमान व्यक्ति से निर्णय करवाना चाहिए।
उसी समय भगवान महादेव स्वयं एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण करके वहाँ पहुँचे। दोनों दैत्यों ने उस वृद्ध ब्राह्मण का सम्मान किया और बोले, “हे ब्राह्मणदेव! हम दोनों ने अपने बल और तपस्या से देवी को प्राप्त किया है। अब आप ही बताइए कि इनमें से पार्वती किसकी होनी चाहिए?”

वृद्ध ब्राह्मण बने महादेव ने कुछ देर विचार करने का अभिनय किया। फिर बोले, “क्षत्रियों का धर्म बल और युद्ध है। यदि तुम दोनों अपने को अधिक योग्य मानते हो, तो तुम दोनों के बीच युद्ध होना चाहिए। जो विजयी होगा, वही पार्वती का अधिकारी कहलाएगा।”
ब्राह्मण की बात दोनों दैत्यों को उचित लगी। वे बोले, “आपने बिल्कुल सही निर्णय दिया है।”

इसके बाद दोनों भाई क्रोध और अहंकार में भरकर युद्ध करने लगे। उनका युद्ध अत्यंत भयंकर था। दोनों समान बलवान थे और कोई भी दूसरे से कम नहीं था। वे घंटों तक लड़ते रहे। अंत में दोनों ने एक-दूसरे पर घातक प्रहार किए और उसी युद्धभूमि में एक साथ मारे गए।
इस प्रकार मोह, काम और अहंकार के कारण वे दोनों दैत्य, जिन्होंने वर्षों तक तपस्या करके महान शक्ति प्राप्त की थी, अंततः अपने ही हाथों अपना विनाश कर बैठे।
इस कथा से शिक्षा मिलती है कि काम, लोभ और अहंकार मनुष्य की बुद्धि को नष्ट कर देते हैं। जो व्यक्ति अपने विवेक को खो देता है, उसका पतन निश्चित हो जाता है, चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो।

ब्राह्मण, बकरा और तीन धूर्तों की कहानी

बहुत समय पहले गौतम वन के पास एक गाँव में एक ब्राह्मण रहता था। वह धार्मिक और सरल स्वभाव का व्यक्ति था। एक दिन उसने एक बड़ा यज्ञ करने का निश्चय किया। यज्ञ की विधि पूरी करने के लिए उसे एक बकरे की आवश्यकता थी। इसलिए वह दूसरे गाँव गया और वहाँ से एक अच्छा बकरा खरीद लाया।

बकरा काफी भारी था, इसलिए ब्राह्मण उसे अपने कंधे पर रखकर पैदल ही अपने गाँव की ओर चल पड़ा। वह मन ही मन यज्ञ की तैयारी और पूजा के विषय में सोचता हुआ आगे बढ़ रहा था।

उसी रास्ते में तीन धूर्त ठग बैठे हुए थे। उन्होंने ब्राह्मण के कंधे पर बकरा देखा और लालच से भर उठे। वे सोचने लगे, “यदि किसी उपाय से यह बकरा हमें मिल जाए, तो बिना मेहनत के अच्छा भोजन मिल जाएगा।”
तीनों ठग बहुत चालाक थे। उन्होंने बल प्रयोग करने के बजाय बुद्धि से काम लेने की योजना बनाई। उन्होंने निश्चय किया कि वे ब्राह्मण को भ्रमित करके स्वयं ही बकरा छोड़ने पर मजबूर कर देंगे।

योजना के अनुसार वे तीनों अलग-अलग स्थानों पर, लगभग एक-एक कोस की दूरी पर जाकर बैठ गए।
कुछ देर बाद जब ब्राह्मण पहले ठग के पास पहुँचा, तो उसने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा, “अरे ब्राह्मण देव! यह क्या कर रहे हैं? आप अपने कंधे पर कुत्ता उठाकर क्यों ले जा रहे हैं?”

ब्राह्मण उसकी बात सुनकर क्रोधित हो गया। उसने कहा, “क्या तुम्हारी आँखें खराब हैं? यह कुत्ता नहीं, यज्ञ के लिए खरीदा गया बकरा है।”

इतना कहकर वह आगे बढ़ गया। लेकिन उसके मन में हल्का-सा संदेह उत्पन्न हो चुका था।

कुछ दूरी पर दूसरा धूर्त बैठा था। उसने भी ब्राह्मण को देखते ही वैसी ही बात कही, “हे ब्राह्मण! यह अपवित्र कुत्ता कंधे पर लेकर कहाँ जा रहे हो?”
अब ब्राह्मण थोड़ा घबरा गया। उसने तुरंत बकरे को नीचे उतारा और ध्यान से देखने लगा। उसे साफ दिखाई दिया कि वह बकरा ही है। उसने मन को समझाया कि शायद वे लोग मूर्ख होंगे। फिर उसने बकरे को दोबारा कंधे पर रखा और आगे चल पड़ा।

लेकिन अब उसके मन की स्थिरता टूट चुकी थी। वह सोचने लगा, “दो लोग एक जैसी बात क्यों कह रहे हैं? कहीं मुझसे कोई भूल तो नहीं हो रही?”
कुछ दूर आगे बढ़ने पर तीसरा धूर्त मिला। उसने भी बनावटी आश्चर्य से कहा, “अरे राम-राम! एक ब्राह्मण होकर कंधे पर कुत्ता उठाए घूम रहे हो? यह तो बहुत अनुचित बात है।”

तीसरे व्यक्ति की बात सुनते ही ब्राह्मण का विश्वास पूरी तरह डगमगा गया। उसने सोचा, “यदि एक व्यक्ति कहता तो उसे भ्रम मानता, लेकिन तीन-तीन लोग एक ही बात कह रहे हैं। अवश्य ही यह कोई कुत्ता होगा और मेरी बुद्धि ही भ्रमित हो गई होगी।”

यह सोचकर उसने डर और घृणा के कारण उस बकरे को वहीं छोड़ दिया। फिर स्वयं को अपवित्र समझकर स्नान करने के लिए नदी की ओर चला गया।
जैसे ही ब्राह्मण वहाँ से गया, तीनों धूर्त तुरंत इकट्ठे हो गए। वे बकरे को पकड़कर ले गए और आनंद से उसका मांस खाया।

इस प्रकार धूर्तों ने अपनी चालाकी और मनोवैज्ञानिक छल से एक सरल और भोले ब्राह्मण को धोखा दे दिया।
इस कथा से शिक्षा मिलती है कि बार-बार बोला गया झूठ भी कभी-कभी सत्य प्रतीत होने लगता है। इसलिए बिना स्वयं विचार किए दूसरों की बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। साथ ही, बुद्धि और विवेक को कभी भ्रमित नहीं होने देना चाहिए।

उज्जयिनी नगरी में माधव नाम का एक ब्राह्मण अपनी पत्नी और छोटे पुत्र के साथ रहता था। उनके घर में एक नेवला भी था, जिसे वे अपने परिवार के सदस्य की तरह पालते थे। वह नेवला बचपन से ही उनके घर में पला था और विशेष रूप से उस छोटे बालक की रक्षा करता था। ब्राह्मणी जब भी किसी काम से बाहर जाती, वह निश्चिंत होकर बालक को नेवले के पास छोड़ देती थी, क्योंकि उसे विश्वास था कि नेवला उसके बच्चे की रक्षा करेगा।
एक दिन ब्राह्मणी नदी पर स्नान करने जाने लगी।

उसने अपने पति माधव से कहा कि वह बालक का ध्यान रखें। उसी समय राजमहल से संदेश आया कि राजा के यहाँ श्राद्ध का आयोजन है और ब्राह्मणों को तुरंत बुलाया जा रहा है। माधव अत्यंत गरीब था। उसने सोचा कि यदि वह देर करेगा तो कोई दूसरा ब्राह्मण वहाँ पहुँच जाएगा और उसे दान-दक्षिणा नहीं मिलेगी। उसके मन में लोभ और चिंता दोनों उत्पन्न हुए। वह समझ नहीं पा रहा था कि पुत्र को अकेला छोड़कर जाए या अवसर खो दे। अंत में उसने यह सोचकर नेवले पर भरोसा किया कि वह वर्षों से घर का रक्षक बना हुआ है और बच्चे को सुरक्षित रखेगा। इसलिए वह बालक को नेवले के भरोसे छोड़कर राजमहल चला गया।

घर में बालक पालने में सो रहा था। उसी समय कहीं से एक भयंकर काला साँप घर में घुस आया और धीरे-धीरे बच्चे की ओर बढ़ने लगा। नेवले ने जैसे ही साँप को देखा, वह तुरंत सतर्क हो गया। उसने बिना डरे साँप पर आक्रमण कर दिया। दोनों के बीच भयंकर संघर्ष हुआ। नेवले ने अपने तीखे दाँतों और पंजों से साँप के कई टुकड़े कर डाले और अंततः उसे मार गिराया। लड़ाई में उसका मुँह और शरीर साँप के रक्त से भर गया, पर उसने बालक को सुरक्षित बचा लिया।

कुछ देर बाद माधव वापस लौटा। घर के बाहर नेवला उसे देखकर प्रसन्नता से उसके पैरों के पास लोटने लगा, मानो अपनी विजय और निष्ठा दिखाना चाहता हो। लेकिन ब्राह्मण ने जब उसके मुँह और पंजों पर खून देखा, तो बिना कुछ सोचे-समझे उसके मन में भयंकर भ्रम उत्पन्न हो गया। उसे लगा कि नेवले ने उसके पुत्र को मार डाला है। क्रोध और शोक में अंधा होकर उसने पास पड़ी भारी वस्तु उठाई और उसी क्षण नेवले के सिर पर प्रहार कर दिया। बेचारा वफादार नेवला वहीं तड़पकर मर गया।

नेवले को मारने के बाद घबराया हुआ ब्राह्मण तेजी से घर के भीतर भागा। वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि उसका पुत्र तो पालने में सुरक्षित और हँसता-खेलता पड़ा है, जबकि उसके पास ही काले साँप के टुकड़े बिखरे हुए हैं। यह दृश्य देखते ही माधव के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे समझते देर न लगी कि नेवले ने उसके पुत्र की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी।

अब ब्राह्मण पछतावे से भर उठा। वह रोने लगा और बार-बार अपने सिर पर हाथ मारकर कहने लगा कि उसने बिना विचार किए अपने सबसे उपकारी साथी की हत्या कर दी। जिस नेवले ने उसके पुत्र को जीवनदान दिया, उसी को उसने क्रोध और भ्रम में मार डाला। उसका हृदय ग्लानि से भर गया, लेकिन अब पछताने से कुछ नहीं हो सकता था।

इस कथा से शिक्षा मिलती है कि बिना सत्य जाने क्रोध में लिया गया निर्णय विनाश का कारण बनता है। मनुष्य को किसी भी परिस्थिति में धैर्य और विवेक नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि जल्दबाजी में किया गया कार्य जीवनभर का पश्चाताप दे सकता है।

माधव ब्राह्मण, उसका बालक, नेवला और साँप की कहानी

उज्जयिनी नगरी में माधव नाम का एक ब्राह्मण अपनी पत्नी और छोटे पुत्र के साथ रहता था। उनके घर में एक नेवला भी था, जिसे वे अपने परिवार के सदस्य की तरह पालते थे। वह नेवला बचपन से ही घर में पला था और विशेष रूप से उस छोटे बालक की रक्षा करता था। ब्राह्मणी जब भी किसी काम से बाहर जाती, वह निश्चिंत होकर बालक को नेवले के पास छोड़ देती थी, क्योंकि उसे उस पर पूरा विश्वास था।

एक दिन ब्राह्मणी स्नान करने नदी पर जाने लगी। उसने अपने पति माधव से बच्चे की देखभाल करने को कहा। तभी राजमहल से संदेश आया कि राजा के यहाँ श्राद्ध का आयोजन है और ब्राह्मणों को तुरंत बुलाया जा रहा है। माधव अत्यंत गरीब था। उसने सोचा कि यदि देर हो गई तो कोई दूसरा ब्राह्मण यह अवसर ले जाएगा और उसे दान-दक्षिणा नहीं मिलेगी।

उसके मन में दुविधा उत्पन्न हुई। एक ओर पुत्र की चिंता थी और दूसरी ओर निर्धनता की मजबूरी। अंत में उसने यह सोचकर नेवले पर भरोसा किया कि वह वर्षों से घर का रक्षक बना हुआ है। इसलिए वह बालक को नेवले की निगरानी में छोड़कर राजमहल चला गया।

घर में बालक पालने में सो रहा था। उसी समय एक भयंकर काला साँप धीरे-धीरे घर के भीतर घुस आया और बच्चे की ओर बढ़ने लगा। नेवले ने जैसे ही साँप को देखा, वह तुरंत सतर्क हो गया। उसने बिना डरे साँप पर हमला कर दिया। दोनों के बीच भयंकर संघर्ष होने लगा। नेवले ने अपने तेज दाँतों और पंजों से साँप के कई टुकड़े कर डाले और अंततः उसे मार गिराया। इस लड़ाई में उसका मुँह और शरीर साँप के खून से भर गया, लेकिन उसने बालक को सुरक्षित बचा लिया।

कुछ समय बाद माधव वापस लौटा। घर के बाहर नेवला उसे देखकर प्रसन्नता से उसके पास आया और उसके चरणों में लोटने लगा, मानो अपनी निष्ठा दिखा रहा हो। लेकिन ब्राह्मण ने जब उसके मुँह और पंजों पर खून देखा, तो बिना कुछ सोचे-समझे उसके मन में भयंकर भ्रम उत्पन्न हो गया। उसे लगा कि नेवले ने उसके पुत्र को मार डाला है।

क्रोध और दुख में अंधा होकर उसने पास पड़ी भारी वस्तु उठाई और नेवले पर प्रहार कर दिया। बेचारा वफादार नेवला वहीं तड़पकर मर गया।
इसके बाद घबराया हुआ ब्राह्मण तेजी से घर के भीतर भागा। वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि उसका पुत्र तो सुरक्षित खेल रहा है और उसके पास ही काले साँप के टुकड़े पड़े हैं। यह दृश्य देखकर माधव के होश उड़ गए। उसे समझते देर न लगी कि नेवले ने उसके पुत्र की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी।

अब ब्राह्मण पछतावे से भर उठा। वह रोने लगा और स्वयं को दोष देने लगा कि उसने बिना सत्य जाने अपने सबसे उपकारी साथी की हत्या कर दी। जिस नेवले ने उसके पुत्र को जीवनदान दिया, उसी को उसने जल्दबाजी और क्रोध में मार डाला।

इस कथा से शिक्षा मिलती है कि बिना सत्य जाने क्रोध में लिया गया निर्णय हमेशा विनाश का कारण बनता है। मनुष्य को हर परिस्थिति में धैर्य और विवेक बनाए रखना चाहिए, क्योंकि जल्दबाजी में किया गया कार्य जीवनभर का पछतावा बन सकता है।

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हितोपदेश भारतीय नीति कथाओं का प्रसिद्ध संग्रह है, जिसमें जानवरों और पात्रों के माध्यम से जीवन की महत्वपूर्ण सीख दी गई है। ये कहानियाँ मनोरंजन के साथ-साथ बुद्धिमानी, मित्रता, ईमानदारी और सही निर्णय लेने की प्रेरणा देती हैं। बच्चों से लेकर बड़ों तक, हर उम्र के लोग इन कहानियों से ज्ञान और नैतिक शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

 लेखक / मूल रचनाकार: नारायण पंडित
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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