हितोपदेश

हितोपदेश सुहृद्भेद की कहानियाँ

Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

एक बनिया, बैल, सिंह और गीदड़ों की कहानी

हितोपदेश : दक्षिण दिशा में सुवर्णवती नाम की एक समृद्ध नगरी थी। उस नगर में वर्धमान नाम का एक धनी बनिया रहता था। उसके पास पहले से ही बहुत धन-संपत्ति थी, लेकिन जब वह अपने अन्य संबंधियों और व्यापारियों को स्वयं से अधिक धनी देखता, तो उसके मन में और अधिक धन कमाने की इच्छा उत्पन्न होने लगती। वह सोचता कि संसार में उसी मनुष्य का सम्मान होता है जिसके पास अपार धन हो। निर्धन व्यक्ति चाहे कितना ही कुलीन और गुणवान क्यों न हो, लोग उसका आदर नहीं करते।

वर्धमान अत्यंत महत्वाकांक्षी था। उसने निश्चय किया कि अब वह दूर देशों में जाकर व्यापार करेगा और अपनी संपत्ति को कई गुना बढ़ाएगा। इसी विचार से उसने अपने दो बैलों, नंदक और संजीवक, को गाड़ी में जोता और उसमें अनेक प्रकार का सामान भरकर कश्मीर की ओर व्यापार के लिए निकल पड़ा। वह मार्ग में लगातार यात्रा करता हुआ घने जंगलों और कठिन रास्तों से गुजर रहा था।

यात्रा करते-करते वह सुदुर्ग नाम के एक घने वन में पहुँचा। वहाँ रास्ता बहुत कठिन और ऊबड़-खाबड़ था। उसी समय चलते-चलते संजीवक नाम के बैल का पैर फिसल गया और उसका घुटना बुरी तरह टूट गया। बैल पीड़ा से वहीं गिर पड़ा और उठने में असमर्थ हो गया। यह देखकर वर्धमान अत्यंत चिंतित हुआ। उसने कुछ समय तक उसकी देखभाल की, लेकिन जब बैल ठीक होता दिखाई नहीं दिया, तब उसने सोचा कि यदि वह यहीं रुका रहा तो व्यापार में भारी हानि होगी। अंत में उसने घायल संजीवक को वहीं छोड़ दिया और दूसरे बैल को खरीदकर अपनी यात्रा आगे बढ़ा दी।

संजीवक कुछ दिनों तक वहीं पड़ा रहा। धीरे-धीरे उसने बड़ी कठिनाई से उठना शुरू किया और तीन पैरों के सहारे चलने लगा। आसपास हरी घास और स्वच्छ जल मिलने के कारण वह धीरे-धीरे स्वस्थ और शक्तिशाली हो गया। कुछ समय बाद वह पहले से भी अधिक बलवान दिखाई देने लगा। वह वन में स्वतंत्र होकर घूमता और ऊँचे स्वर में डकारता था। उसकी गर्जना जैसी आवाज पूरे जंगल में गूँजती थी।

उसी वन में पिंगलक नाम का एक शक्तिशाली सिंह रहता था, जो उस जंगल का राजा माना जाता था। एक दिन वह प्यास बुझाने के लिए यमुना नदी के किनारे गया। तभी अचानक उसके कानों में संजीवक की जोरदार डकार सुनाई दी। वह आवाज इतनी भयानक और अनोखी थी कि सिंह घबरा गया। उसने पहले कभी ऐसी गर्जना नहीं सुनी थी। भय के कारण वह बिना पानी पिए ही वापस अपने स्थान पर लौट आया और चिंता में डूबकर चुपचाप बैठ गया।

पिंगलक के दरबार में दमनक और करटक नाम के दो गीदड़ रहते थे। वे पहले राजा के मंत्री थे, लेकिन कुछ समय से उपेक्षित चल रहे थे। जब दमनक ने सिंह को इस प्रकार भयभीत देखा, तो उसने करटक से कहा — “राजा किसी बड़े भय में दिखाई देता है। यदि हम इसका कारण जान लें और उसकी सहायता करें, तो संभव है कि हमें फिर से सम्मान प्राप्त हो जाए।” लेकिन करटक ने उसे सावधान करते हुए कहा कि बिना कारण राजा के मामलों में हस्तक्षेप करना उचित नहीं होता।

दमनक अत्यंत चतुर और महत्वाकांक्षी था। उसने निश्चय किया कि वह किसी भी प्रकार राजा का विश्वास जीतकर पुनः प्रभावशाली बनेगा। वह सीधे पिंगलक के पास पहुँचा और विनम्रता से बोला — “महाराज, आप इतने चिंतित क्यों दिखाई दे रहे हैं?” पहले तो सिंह ने बात टालनी चाही, लेकिन बाद में उसने बताया कि उसने किसी भयानक जीव की गर्जना सुनी है और उसे लगता है कि वह उससे भी अधिक शक्तिशाली प्राणी है।
दमनक भीतर ही भीतर मुस्कराया, क्योंकि वह समझ गया था कि यह आवाज संजीवक बैल की है।

उसने सिंह से कहा — “महाराज, भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। मैं उस जीव का पता लगाकर उसे आपके सामने प्रस्तुत कर सकता हूँ।” सिंह ने उसे अनुमति दे दी। इसके बाद दमनक संजीवक के पास पहुँचा और उससे मित्रता कर ली। उसने बैल से कहा कि वन का राजा पिंगलक उससे मिलना चाहता है और यदि वह उसके साथ चले, तो उसे कोई हानि नहीं होगी।
कुछ समय बाद दमनक ने संजीवक और पिंगलक की भेंट करवाई। जब दोनों मिले, तो धीरे-धीरे उनमें गहरी मित्रता हो गई। सिंह संजीवक की बुद्धिमानी और विनम्रता से बहुत प्रभावित हुआ। अब वह अधिकांश समय उसी के साथ बिताने लगा। परिणाम यह हुआ कि दमनक और करटक जैसे पुराने सेवकों की उपेक्षा होने लगी। उन्हें भोजन और सम्मान पहले जैसा नहीं मिलने लगा।

दमनक यह सब देखकर भीतर ही भीतर जलने लगा। उसने सोचा कि जिस मित्रता को उसने कराया है, उसी को तोड़कर वह फिर से राजा का प्रिय बन सकता है। उसने चालाकी से पहले पिंगलक के मन में संदेह उत्पन्न किया। वह सिंह के पास जाकर बोला — “महाराज, यह संजीवक बाहर से भले ही विनम्र दिखाई देता हो, लेकिन भीतर ही भीतर वह आपके राज्य पर अधिकार करना चाहता है। वह स्वयं को आपसे अधिक योग्य समझने लगा है।”

सिंह पहले तो इस बात पर विश्वास नहीं कर पाया, क्योंकि वह संजीवक से अत्यंत स्नेह करता था। लेकिन दमनक बार-बार उसे भड़काता रहा। उसने कहा कि राजा को कभी भी किसी एक सेवक पर अत्यधिक विश्वास नहीं करना चाहिए। धीरे-धीरे उसके शब्दों का प्रभाव पिंगलक के मन पर पड़ने लगा और उसके मन में संदेह उत्पन्न हो गया।

इसके बाद दमनक संजीवक के पास गया और वहाँ जाकर दुखी होने का अभिनय करने लगा। जब संजीवक ने उससे कारण पूछा, तो उसने बड़ी कठिनाई से जैसे कोई रहस्य बता रहा हो, वैसे कहा — “मित्र, मैं तुम्हारा हित चाहता हूँ, इसलिए सच बता रहा हूँ। राजा पिंगलक अब तुमसे क्रोधित है और उसने निश्चय किया है कि वह तुम्हें मार डालेगा।” यह सुनकर संजीवक अत्यंत दुखी और चिंतित हो गया।

दमनक ने दोनों के मन में ऐसा विष भर दिया कि अब दोनों एक-दूसरे को शत्रु समझने लगे। उसने संजीवक से कहा कि जब सिंह पूँछ उठाकर और पंजे फैलाकर तुम्हारी ओर बढ़े, तो समझ लेना कि वह आक्रमण करने वाला है। दूसरी ओर उसने सिंह से भी यही कहा कि जब संजीवक सींग उठाकर सामने आए, तो समझ लेना कि वह युद्ध करना चाहता है।

कुछ समय बाद दोनों आमने-सामने आ गए। दोनों के मन में पहले से ही भय और क्रोध भरा हुआ था। परिणामस्वरूप उनके बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया। संजीवक बहुत बलवान था और उसने पूरी शक्ति से संघर्ष किया, लेकिन अंत में सिंह ने उसे मार डाला।

जब युद्ध समाप्त हुआ और संजीवक मर गया, तब पिंगलक के मन में गहरा दुख उत्पन्न हुआ। उसे लगा कि उसने अपने प्रिय मित्र को व्यर्थ ही मार डाला। वह पश्चाताप करने लगा। लेकिन उसी समय दमनक ने उसे समझाया कि शत्रु का नाश करना ही राजा का धर्म है। उसकी बातों में आकर सिंह का मन शांत हो गया।
इस प्रकार दमनक अपनी चालाकी और कपट से फिर से राजा का प्रिय मंत्री बन गया। वह प्रसन्न होकर दरबार में रहने लगा और उसका प्रभाव पहले से भी अधिक बढ़ गया।

इस कथा से शिक्षा मिलती है कि कपटी और स्वार्थी लोगों की बातों में आकर सच्चे मित्रों पर संदेह नहीं करना चाहिए। चुगली और छल अंत में मित्रता को नष्ट कर देते हैं। साथ ही यह भी समझना चाहिए कि बुद्धि का गलत उपयोग विनाश का कारण बनता है।

धोबी, धोबन, गधा और कुत्ते की कहानी

प्राचीन समय में पवित्र नगरी वाराणसी में कर्पूरपटक नाम का एक धोबी रहता था। वह अपने काम में कुशल था और दिनभर कपड़े धोकर अपना जीवन यापन करता था। उसके घर में उसकी पत्नी, एक मेहनती गधा और एक चौकन्ना कुत्ता रहते थे। गधा दिनभर भारी कपड़ों की गठरियाँ ढोता था, जबकि कुत्ता रातभर जागकर घर की रखवाली करता था। समय बीतने के साथ धोबी अपने सुख और परिवार में इतना मग्न रहने लगा कि उसने अपने पशुओं की मेहनत और निष्ठा पर ध्यान देना कम कर दिया। विशेषकर कुत्ता, जो रात-दिन घर की रक्षा करता था, अब उपेक्षा का अनुभव करने लगा था। उसे पहले जैसा भोजन और स्नेह नहीं मिलता था।

एक रात की बात है। दिनभर के काम से थककर धोबी और उसकी पत्नी गहरी नींद में सो गए। चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। तभी अंधेरे का लाभ उठाकर एक चोर धीरे-धीरे घर के भीतर घुस आया। आँगन में बँधा गधा जाग रहा था और पास ही कुत्ता भी बैठा हुआ सब देख रहा था। गधे ने चोर को अंदर जाते देखा तो चिंतित होकर कुत्ते से बोला, “मित्र, यह समय तुम्हारे कर्तव्य का है। कोई चोर घर में घुस आया है। तुम तुरंत जोर-जोर से भौंककर स्वामी को क्यों नहीं जगा देते?”
कुत्ते ने गहरी साँस लेते हुए उत्तर दिया, “भाई, मेरे काम की चिंता तुझे नहीं करनी चाहिए। मैं वर्षों से इस घर की रखवाली कर रहा हूँ। रात-रातभर जागकर मैंने इस घर को सुरक्षित रखा, लेकिन अब मेरा स्वामी मेरी सेवा का आदर नहीं करता। पहले मुझे अच्छा भोजन मिलता था, स्नेह मिलता था, पर अब वह सब कम हो गया है। जब तक कोई बड़ी विपत्ति सामने नहीं आती, तब तक अधिकांश स्वामी अपने सेवकों का महत्व नहीं समझते।”

गधे को कुत्ते की बातें अच्छी नहीं लगीं। उसने कहा, “जो सेवक आवश्यकता पड़ने पर अपने स्वामी की सहायता करने के बदले शिकायत करने लगे, वह सच्चा सेवक नहीं कहलाता। संकट के समय सहायता करना ही सेवक का धर्म होता है।”
कुत्ते ने भी शांत स्वर में उत्तर दिया, “और जो स्वामी अपने सेवकों की निष्ठा को भूलकर केवल आवश्यकता पड़ने पर मीठे वचन बोले, वह भी अच्छा स्वामी नहीं कहलाता। सेवा और सम्मान दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।”

परंतु गधा अपनी बात पर अड़ा रहा। उसने क्रोधित होकर कहा, “तू अपने कर्तव्य से विमुख हो गया है। चाहे जो हो, मैं अपने स्वामी को अवश्य जगा दूँगा। स्वामी की रक्षा करना हमारा धर्म है।”

इतना कहकर गधा जोर-जोर से रेंकने लगा। आधी रात के उस गहरे सन्नाटे में उसकी तीखी आवाज पूरे घर में गूँज उठी। धोबी अचानक नींद से जाग गया। उसकी नींद टूट चुकी थी और वह अत्यंत क्रोधित हो उठा। उसे यह समझ नहीं आया कि गधा क्यों चिल्ला रहा है। उसने यह भी नहीं देखा कि घर में कोई चोर घुसा है। क्रोध में अंधा होकर वह तुरंत उठा, मोटी लकड़ी उठाई और गधे को पीटना शुरू कर दिया। बेचारा गधा दर्द से तड़प उठा, पर अपनी बात समझा न सका। मार इतनी कठोर थी कि अंततः उसकी वहीं मृत्यु हो गई।

उधर अवसर देखकर चोर चुपचाप घर का सामान लेकर भाग निकला। कुत्ता यह सब देखता रहा। उसे दुख भी हुआ, लेकिन उसने समझ लिया कि बिना बुद्धि के किया गया कार्य कभी-कभी विनाश का कारण बन जाता है।

इस कथा से शिक्षा मिलती है कि केवल उत्साह पर्याप्त नहीं होता, कार्य करने से पहले समय, परिस्थिति और बुद्धि का विचार करना आवश्यक है। बिना सोचे-समझे किया गया अच्छा कार्य भी कभी-कभी भारी नुकसान पहुँचा देता है।

सिंह, चूहा और बिलाव की कहानी

बहुत समय पहले उत्तर दिशा में अर्बुदशिखर नाम का एक विशाल पर्वत था। उस पर्वत की ऊँची चट्टानों और घने जंगलों के बीच एक बड़ी गुफा थी, जिसमें दुदार्ंत नाम का एक अत्यंत बलशाली और भयंकर सिंह रहता था। उसके गर्जन से पूरा वन काँप उठता था। जंगल के सभी पशु उससे भय खाते थे। वह इतना शक्तिशाली था कि बड़े-बड़े हाथी और जंगली भैंसे भी उसके सामने टिक नहीं पाते थे।

किन्तु संसार में चाहे कोई कितना ही बलवान क्यों न हो, कभी-कभी छोटी-सी समस्या भी उसे परेशान कर देती है। दुदार्ंत सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। उसकी गुफा के पास एक छोटे से बिल में एक चूहा रहता था। वह चूहा बड़ा शरारती और चंचल था। प्रतिदिन जब सिंह गहरी नींद में सो जाता, तब वह धीरे-धीरे बाहर निकलता और सिंह की गर्दन के घने बालों तथा अयाल को कुतर जाता। जब सुबह सिंह जागता, तो अपने सुंदर बालों को कटा हुआ देखकर क्रोध से भर उठता। वह तुरंत इधर-उधर देखता, गर्जना करता और चूहे को पकड़ने का प्रयास करता, लेकिन चूहा बहुत फुर्तीला था। वह तुरंत अपने बिल में घुस जाता और सिंह उसे पकड़ नहीं पाता।

दिनों तक यही क्रम चलता रहा। सिंह को यह बात अपने अपमान जैसी लगने लगी। वह सोचने लगा कि इतना बड़ा और शक्तिशाली होकर भी वह एक छोटे से चूहे का कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा। तब उसने मन ही मन विचार किया कि छोटे शत्रु को हराने के लिए कभी-कभी उसी के समान चालाक और उपयुक्त सहायक की आवश्यकता होती है। केवल बल से हर समस्या का समाधान नहीं होता।

एक दिन सिंह गाँव की ओर गया। वहाँ उसे दधिकर्ण नाम का एक बिलाव अर्थात् बिल्ली दिखाई दिया। वह बिल्ली चतुर, तेज और चूहों को पकड़ने में निपुण थी। सिंह ने उसे विश्वास दिलाया कि यदि वह उसके साथ गुफा में रहे, तो उसे प्रतिदिन स्वादिष्ट मांस खाने को मिलेगा और किसी प्रकार का भय भी नहीं रहेगा। स्वादिष्ट भोजन और सुरक्षित जीवन का लालच पाकर दधिकर्ण सिंह के साथ उसकी गुफा में रहने चला गया।

अब गुफा का वातावरण बदल गया। बिल्ली को देखते ही चूहा डर गया। पहले जहाँ वह निडर होकर बाहर निकल आता था, अब बिल से झाँकने तक का साहस नहीं करता था। सिंह भी अब चैन की नींद सोने लगा, क्योंकि उसके बाल सुरक्षित रहने लगे थे। जब कभी बिल में हल्की-सी आहट होती, सिंह समझ जाता कि चूहा अभी जीवित है और उसी भय के कारण बिल से बाहर नहीं निकल रहा। तब वह प्रसन्न होकर बिल्ली को और अधिक मांस खिलाता, ताकि वह वहीं बनी रहे और चूहे पर डर कायम रहे।

कुछ समय तक सब ठीक चलता रहा। लेकिन एक दिन चूहा कई दिनों की भूख से विवश होकर सावधानी से बिल से बाहर निकला। जैसे ही वह भोजन की तलाश में थोड़ा आगे बढ़ा, दधिकर्ण ने अवसर देखकर उस पर झपट्टा मारा और उसे तुरंत मार डाला। अब गुफा में चूहे का भय समाप्त हो गया था।

धीरे-धीरे कई दिन बीत गए। सिंह ने देखा कि अब न तो उसके बाल कटते हैं और न ही चूहे की कोई आवाज सुनाई देती है। उसने समझ लिया कि चूहा मर चुका है। अब उसे बिल्ली की आवश्यकता नहीं रही। पहले जो सिंह दधिकर्ण को बड़े आदर से भरपूर मांस खिलाता था, अब उसका ध्यान उसकी ओर कम हो गया। उसने बिल्ली को भोजन देना घटा दिया। दधिकर्ण धीरे-धीरे भूख और दुर्बलता से कमजोर होता गया। जिस आराम और सम्मान के लिए वह सिंह के पास आया था, वही धीरे-धीरे समाप्त हो गया। अंततः भोजन के अभाव में वह अत्यंत कमजोर होकर मर गया।

इस कथा से शिक्षा मिलती है कि संसार में अधिकांश लोग तभी तक सम्मान और आदर पाते हैं, जब तक वे उपयोगी बने रहते हैं। साथ ही यह भी कि केवल किसी एक उद्देश्य के लिए बनाए गए संबंध स्थायी नहीं होते। स्वार्थ समाप्त होते ही संबंधों का महत्व भी कम हो जाता है।

अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो अन्य ज्ञानवर्धक और नैतिक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।

हितोपदेश भारतीय नीति कथाओं का प्रसिद्ध संग्रह है, जिसमें जानवरों और पात्रों के माध्यम से जीवन की महत्वपूर्ण सीख दी गई है। ये कहानियाँ मनोरंजन के साथ-साथ बुद्धिमानी, मित्रता, ईमानदारी और सही निर्णय लेने की प्रेरणा देती हैं। बच्चों से लेकर बड़ों तक, हर उम्र के लोग इन कहानियों से ज्ञान और नैतिक शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

 लेखक / मूल रचनाकार: नारायण पंडित
 प्रस्तुति: Saying Central Team

आपको यह कहानी पसंद आई?

इसे रेट करने के लिए किसी स्टार पर क्लिक करें!

औसत श्रेणी 0 / 5. मतों की गिनती: 0

अभी तक कोई वोट नहीं! इस पोस्ट को रेटिंग देने वाले पहले व्यक्ति बनें।

Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

QUOTE OF THE DAY

RECENT STORIES

SHORT STORIES

FEATURED STORIES

CATEGORIES