बेताल पच्चीसी: चम्मापुर नाम के नगर में चम्पकेश्वर नाम का राजा राज्य करता था। उसकी रानी सुलोचना थी और उनकी पुत्री त्रिभुवनसुन्दरी अत्यंत रूपवती और गुणवान थी। जब वह विवाह योग्य हुई तो राजा-रानी उसके योग्य वर को लेकर चिंतित हो गए। अनेक राजाओं ने अपने-अपने पुत्रों के चित्र भेजे, पर राजकुमारी को कोई भी पसंद नहीं आया। राजा ने स्वयंवर का प्रस्ताव रखा, लेकिन राजकुमारी ने उसे भी अस्वीकार कर दिया।
अंत में राजा ने निर्णय लिया कि वह उसी व्यक्ति से अपनी पुत्री का विवाह करेगा जो रूप, बल और ज्ञान—इन तीनों में श्रेष्ठ होगा। कुछ समय बाद चार अलग-अलग देशों से चार योग्य वर राजा के दरबार में आए।
पहला वर बोला कि वह ऐसा कुशल बुनकर है जो वस्त्र बनाकर पाँच लाख में बेचता है, जिसमें से एक हिस्सा देवता को, एक अपने लिए, एक पत्नी के लिए और बाकी अपने जीवन-यापन के लिए खर्च करता है। दूसरा वर बोला कि उसे जल और थल के सभी पशुओं की भाषा का ज्ञान है। तीसरे ने कहा कि वह अत्यंत विद्वान है और शास्त्रों का गहन ज्ञान रखता है। चौथे ने कहा कि वह शब्दवेधी बाण चलाने में निपुण है।
राजा इन चारों की बात सुनकर असमंजस में पड़ गया। चारों ही रूप और गुण में श्रेष्ठ दिखाई दे रहे थे। उसने राजकुमारी से विचार पूछा, लेकिन वह चुप रही और कोई उत्तर नहीं दिया। तब बेताल ने राजा विक्रम से पूछा कि इन चारों में से राजकुमारी के लिए सर्वश्रेष्ठ वर कौन है।
राजा विक्रम ने उत्तर दिया कि चौथा वर, जो शब्दवेधी बाण चलाना जानता है, वही सबसे उपयुक्त है। उन्होंने कहा कि वह शारीरिक रूप से सबसे सक्षम और वीर है, और राजकुमारी के योग्य जीवनसाथी बनने के लिए सबसे उपयुक्त प्रतीत होता है। इसलिए वही उसका सर्वश्रेष्ठ वर है।
राजा का उत्तर सुनते ही बेताल फिर उड़कर उसी पेड़ पर जा लटका। राजा विक्रम एक बार फिर उसे पकड़ने के लिए लौट पड़ा और बेताल ने आगे की कहानी सुनानी शुरू कर दी।
बेताल पच्चीसी सबसे अधिक त्यागी कौन?
मदनपुर नाम के नगर में वीरवर नाम का राजा राज्य करता था। उसी नगर में हिरण्यदत्त नाम का एक वैश्य रहता था। उसकी पुत्री मदनसेना अत्यंत सुंदर थी। एक दिन वह अपनी सहेलियों के साथ बाग में गई, जहाँ सोमदत्त के पुत्र धर्मदत्त और उसका मित्र भी आए हुए थे। वहीं धर्मदत्त ने मदनसेना को देखकर उससे प्रेम कर लिया और घर लौटकर वह उसी के बारे में सोचता रहा।
अगले दिन वह फिर बाग में पहुँचा और मदनसेना को अकेला देखकर उससे प्रेम की बात कही। उसने कहा कि यदि वह उसे स्वीकार नहीं करेगी तो वह अपने प्राण त्याग देगा। मदनसेना ने बताया कि उसका विवाह पाँच दिनों बाद होने वाला है और वह अब किसी और की नहीं हो सकती। धर्मदत्त ने कहा कि वह उसके बिना जीवित नहीं रह सकता। इस पर मदनसेना ने उसे शांत करने के लिए कहा कि वह विवाह के बाद भी एक बार उससे अवश्य मिलेगी।
समय आने पर मदनसेना का विवाह हो गया और वह अपने पति के घर चली गई। लेकिन वह अंदर से बहुत उदास थी। अंत में उसने अपने पति से कहा कि उसे एक बार अपने पुराने वचन के अनुसार कहीं जाने की अनुमति दी जाए। पति ने पहले पूरी बात सुनी और फिर उसे जाने की अनुमति दे दी, यह सोचकर कि रोकने से कोई लाभ नहीं होगा।
मदनसेना सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनकर अपने वचन को पूरा करने निकली। रास्ते में उसे एक चोर मिला, जिसने उसका रास्ता रोक लिया और उसके गहने माँगने लगा। मदनसेना ने कहा कि वह गहने ले ले, लेकिन उसे छोड़ दे। चोर ने कहा कि वह गहने नहीं, बल्कि उसे चाहता है। तब मदनसेना ने उसे भी वही बात बताई कि उसे पहले अपने वचन को पूरा करना है, फिर वह लौट आएगी। चोर उसकी बातों से प्रभावित होकर उसे जाने देता है।
इसके बाद वह धर्मदत्त के पास पहुँची। धर्मदत्त ने उससे पूछा कि वह अपने पति के घर से कैसे निकल आई। मदनसेना ने उसे पूरी सच्चाई बता दी। यह सुनकर धर्मदत्त का मन बदल गया और उसने कहा कि अब वह उसे अपने साथ नहीं रख सकता। वह भी उसे छोड़ देता है। फिर वह वापस लौटकर उसी चोर के पास पहुँची। चोर ने जब पूरी बात सुनी तो वह भी उसकी ईमानदारी और वचन-पालन से प्रभावित हुआ और उसे बिना नुकसान पहुँचाए जाने दिया।
इस प्रकार मदनसेना तीनों लोगों के पास से सुरक्षित अपने पति के पास लौट आई। जब उसने अपने पति को पूरी बात बताई तो वह बहुत प्रसन्न हुआ और उसके साथ सुखपूर्वक रहने लगा।
इतनी कथा सुनाकर बेताल ने राजा विक्रम से पूछा कि इन तीनों—पति, धर्मदत्त और चोर—में सबसे अधिक त्यागी कौन था। राजा विक्रम ने उत्तर दिया कि सबसे अधिक त्यागी चोर था। उन्होंने कहा कि पति ने उसे इसलिए छोड़ा क्योंकि उसका मन विचलित था, धर्मदत्त ने भी स्वार्थ और भय के कारण उसे छोड़ा, लेकिन चोर न तो उसका परिचित था, न ही उसके पीछे कोई बाध्यता थी, फिर भी उसने उसे बिना किसी लाभ के छोड़ दिया। इसलिए सबसे बड़ा त्याग उसी का माना जाएगा।
राजा का उत्तर सुनते ही बेताल फिर उड़कर उसी पेड़ पर जा लटका। राजा विक्रम एक बार फिर उसे पकड़ने के लिए लौट पड़ा और बेताल ने आगे की कथा सुनानी शुरू कर दी।
बेताल पच्चीसी सबसे अधिक सुकुमार कौन?
गौड़ देश में वर्धमान नाम का एक नगर था, जहाँ गुणशेखर नाम का राजा शासन करता था। उसके दीवान का नाम अभयचन्द्र था। दीवान के प्रभाव में आकर राजा ने राज्य में सभी धार्मिक कार्य जैसे शिव और विष्णु की पूजा, गोदान, भूदान और पिंडदान आदि बंद करवा दिए थे। उसने आदेश दिया था कि जो कोई इन कार्यों को करेगा, उसकी संपत्ति छीन ली जाएगी और उसे नगर से निकाल दिया जाएगा।
एक दिन दीवान ने राजा को समझाया कि जो व्यक्ति दूसरों को दुख देता है, वह पाप के कारण जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो पाता और बार-बार कष्ट भोगता है। इसलिए मनुष्य को सभी जीवों की रक्षा करनी चाहिए और किसी को भी कष्ट नहीं देना चाहिए। उसकी बातों से राजा प्रभावित हुआ और उसी के अनुसार राज्य चलाने लगा। लेकिन समय के साथ राजा की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र धर्मराज गद्दी पर बैठा।

नए राजा ने कुछ समय बाद दीवान को राज्य से निकाल दिया। कुछ समय बाद वसंत ऋतु में राजा अपनी तीन रानियों—इन्दुलेखा, तारावली और मृगांकवती—के साथ बाग में घूमने गया। वहाँ एक घटना घटी जिसने सबको आश्चर्य में डाल दिया।
जब राजा ने इन्दुलेखा के बाल पकड़कर खींचे, तो उसके कान में लगा हुआ एक कमल उसके पैर पर गिर गया और उसी से उसकी जांघ में घाव हो गया। वह तुरंत बेहोश हो गई। इलाज के बाद वह ठीक हुई। कुछ समय बाद तारावली खुले में सो रही थी, तभी चांदनी उसके शरीर पर पड़ी और उसके शरीर में फफोले उठ आए। इलाज के बाद वह भी ठीक हो गई। फिर एक और घटना हुई, जब किसी घर में मूसल से धान कूटने की आवाज आई, तो मृगांकवती के हाथों में अचानक छाले पड़ गए, जबकि उसने मूसल को छुआ भी नहीं था। इलाज के बाद वह भी ठीक हो गई।
इन तीनों घटनाओं को देखकर राजा और सभी लोग चकित रह गए। तभी बेताल ने राजा विक्रम से पूछा कि इन तीनों में सबसे अधिक सुकुमार कौन थी। राजा विक्रम ने उत्तर दिया कि सबसे अधिक सुकुमार मृगांकवती थी, क्योंकि बाकी दो को कमल और चांदनी के स्पर्श से कष्ट हुआ, लेकिन उसे बिना किसी प्रत्यक्ष संपर्क के केवल ध्वनि से ही छाले पड़ गए। इसलिए वह सबसे अधिक कोमल और संवेदनशील थी।
राजा का उत्तर सुनते ही बेताल फिर उड़कर उसी पेड़ पर जा लटका। राजा विक्रम एक बार फिर उसे पकड़ने के लिए लौट पड़ा और बेताल ने आगे की कहानी सुनानी शुरू कर दी।
बेताल पच्चीसी दीवान की मृत्यु क्यों?
अंगदेश में यशकेतु नाम का राजा राज्य करता था। उसके पास दीर्घदर्शी नाम का एक अत्यंत चतुर और कर्तव्यनिष्ठ दीवान था। राजा विलासप्रिय था, इसलिए राज्य का पूरा कार्यभार दीवान पर छोड़कर स्वयं भोग-विलास में लिप्त रहता था। इस कारण दीवान को बार-बार अपमान और निंदा सहनी पड़ती थी, जिससे वह बहुत दुखी रहने लगा।
अंततः दीवान ने तीर्थयात्रा का बहाना बनाया और राज्य छोड़कर निकल पड़ा। रास्ते में उसे एक शिव मंदिर मिला, जहाँ उसकी मुलाकात एक व्यापारी से हुई। वह व्यापारी समुद्रपार व्यापार के लिए सुवर्णद्वीप जा रहा था। दीवान भी उसके साथ चल पड़ा। दोनों समुद्र यात्रा कर वहाँ पहुँचे और व्यापार करके बहुत धन कमाकर वापस लौटे।
लौटते समय समुद्र में दीवान को एक अद्भुत कल्पवृक्ष दिखाई दिया, जिसकी शाखाओं पर रत्नों से सजा एक आसन था और उस पर एक सुंदरी वीणा बजा रही थी। कुछ समय बाद वह दृश्य अचानक गायब हो गया। दीवान इस रहस्य से बहुत आश्चर्यचकित हुआ और अपने नगर लौट आया।
उधर राजा को दीवान के लौटने की खबर मिली और साथ ही उस अद्भुत कथा का भी पता चला। वह उस सुंदरी को पाने के लिए बेचैन हो गया और राज्य का कार्य दीवान को सौंपकर स्वयं तपस्वी का वेश धारण कर वहाँ चला गया। वहाँ उसे वही कल्पवृक्ष और वही सुंदरी मृगांकवती मिली। उसने उससे विवाह कर लिया।
मृगांकवती ने विवाह के बाद एक शर्त रखी कि वह महीने की कुछ विशेष तिथियों पर कहीं जाएगी और राजा उसे नहीं रोकेगा। राजा ने शर्त मान ली। एक बार ऐसी ही तिथि पर जब वह गई, तो राजा चुपचाप उसके पीछे चल पड़ा। वहाँ उसने देखा कि एक राक्षस उसे निगल गया। राजा ने क्रोध में आकर राक्षस का वध कर दिया, और मृगांकवती उसके पेट से जीवित बाहर निकल आई।
सारी सच्चाई सामने आई कि यह सब उसके पिता के श्राप का परिणाम था, और राजा के आने से उसका श्राप समाप्त हो गया।
राजा उसे लेकर नगर लौटा। यह देखकर दीवान को गहरा मानसिक आघात लगा। उसे लगा कि राजा फिर स्त्री-मोह में पड़कर राज्य की उपेक्षा करेगा और वही पुरानी स्थिति लौट आएगी। इसी चिंता और आघात के कारण उसका हृदय टूट गया और उसकी मृत्यु हो गई।
इतना कहकर बेताल ने राजा विक्रम से पूछा कि दीवान की मृत्यु का वास्तविक कारण क्या था।
राजा विक्रम ने उत्तर दिया कि दीवान की मृत्यु का कारण मानसिक दुःख और चिंता थी। उसे यह भय था कि राजा फिर विलास और मोह में पड़कर राज्य को अस्थिर कर देगा, और उसकी सारी मेहनत व्यर्थ हो जाएगी। इसी गहरी चिंता और मानसिक आघात से उसका हृदय टूट गया और उसकी मृत्यु हो गई।
राजा का उत्तर सुनते ही बेताल फिर उड़कर उसी पेड़ पर जा लटका। राजा विक्रम एक बार फिर उसे पकड़ने के लिए लौट पड़ा और बेताल ने आगे की कथा सुनानी शुरू कर दी।
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बेताल पच्चीसी प्राचीन भारतीय लोककथाओं का एक प्रसिद्ध संग्रह है, जिसमें राजा विक्रमादित्य और बेताल की रोचक कहानियाँ शामिल हैं। हर कहानी में नैतिक प्रश्न छिपा होता है। ये कहानियाँ बुद्धि, न्याय और सही निर्णय लेने की क्षमता को समझाने का संदेश देती हैं।
लेखक / मूल रचनाकार: बेताल भट्टराव
प्रस्तुति: Saying Central Team





