पंचतंत्र

पंचतंत्र की प्रमुख कहानियाँ: लब्धप्रणाशा

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बंदर और मगरमच्छ

पंचतंत्र: किसी नदी के किनारे एक विशाल पेड़ था। उस पेड़ पर एक बंदर रहता था। पेड़ पर बहुत मीठे और स्वादिष्ट फल लगते थे। बंदर रोज उन्हीं फलों को खाकर आनंद से अपना जीवन बिताता था। वह अकेला था, लेकिन अपनी दुनिया में खुश रहता था।
एक दिन एक मगरमच्छ नदी से निकलकर उसी पेड़ के नीचे आ पहुंचा। बंदर ने ऊपर से उसे देखकर पूछा,
“भाई, तुम कौन हो?”
मगरमच्छ ने जवाब दिया,


“मैं एक मगर हूं। काफी दूर से यहां तक आया हूं और भोजन की तलाश में भटक रहा हूं।”
बंदर ने मुस्कुराते हुए कहा,
“तो फिर चिंता क्यों करते हो? इस पेड़ पर बहुत सारे मीठे फल हैं। तुम इन्हें खाकर देखो।”
इतना कहकर उसने कुछ पके हुए फल तोड़कर नीचे फेंक दिए। मगरमच्छ ने फल खाए तो उसे उनका स्वाद बहुत अच्छा लगा। वह खुशी से बोला,


“वाह! इतने स्वादिष्ट फल मैंने पहले कभी नहीं खाए।”
बंदर ने उसे और फल दिए। मगरमच्छ ने पेट भरकर फल खाए और जाते समय बोला,
“अगर तुम अनुमति दो तो मैं कल फिर आऊं?”
बंदर ने हंसते हुए कहा,
“क्यों नहीं! तुम रोज आ सकते हो।”


अगले दिन मगरमच्छ फिर आया। दोनों ने साथ बैठकर बातें कीं। धीरे-धीरे उनकी दोस्ती गहरी होती चली गई। मगरमच्छ रोज वहां आता, फल खाता और बंदर से घंटों बातें करता।
एक दिन बातचीत के दौरान बंदर ने कहा,
“मित्र, मैं इस दुनिया में बिल्कुल अकेला हूं। तुम्हारे जैसा दोस्त पाकर मुझे बहुत खुशी मिली है।”
मगरमच्छ बोला,
“मैं अकेला नहीं हूं। नदी के उस पार मेरी पत्नी भी रहती है।”
यह सुनकर बंदर बोला,


“अरे! तुमने पहले क्यों नहीं बताया? मैं भाभी के लिए भी फल भेजता।”
उस दिन बंदर ने मगरमच्छ की पत्नी के लिए ढेर सारे मीठे फल दिए। मगरमच्छ उन्हें अपने घर ले गया। उसकी पत्नी को फल बहुत पसंद आए। उसने रोज ऐसे फल लाने के लिए कहा।
समय बीतता गया। मगरमच्छ रोज बंदर से मिलने जाता और अपनी पत्नी के लिए फल भी ले जाता। लेकिन मगरमच्छ की पत्नी को यह बात पसंद नहीं थी कि उसका पति इतना समय बंदर के साथ बिताए।
एक दिन उसने मगरमच्छ से कहा,
“मुझे विश्वास नहीं होता कि मगर और बंदर में दोस्ती हो सकती है।”
मगरमच्छ ने कहा,


“वह बहुत अच्छा है। रोज तुम्हारे लिए इतने स्वादिष्ट फल भेजता है।”
मगरमच्छ की पत्नी के मन में लालच आ गया। उसने सोचा,
“जो बंदर रोज इतने मीठे फल खाता है, उसका कलेजा कितना स्वादिष्ट होगा!”
उसने मगरमच्छ से कहा,
“एक दिन अपने मित्र को घर जरूर लेकर आना। मैं उससे मिलना चाहती हूं।”
मगरमच्छ ने समझाया,
“वह पानी में नहीं रह सकता। डूब जाएगा।”


लेकिन उसकी पत्नी जिद पर अड़ गई।
कुछ दिनों बाद उसने बीमारी का नाटक किया और रोते हुए बोली,
“वैद्य ने कहा है कि अगर मुझे बंदर का कलेजा खाने को मिल जाए तभी मैं ठीक हो सकती हूं।”
यह सुनकर मगरमच्छ बहुत परेशान हो गया। वह अपने दोस्त को मारना नहीं चाहता था, लेकिन पत्नी को भी बचाना चाहता था।
आखिरकार वह दुखी मन से बंदर के पास गया।
बंदर ने पूछा,


“मित्र, आज तुम इतने उदास क्यों हो?”
मगरमच्छ बोला,
“मेरी पत्नी तुमसे मिलना चाहती है। अगर तुम मेरे साथ घर चलो तो उसे बहुत खुशी होगी।”
बंदर ने कहा,
“मैं पानी में कैसे जाऊंगा? मैं तो डूब जाऊंगा।”
मगरमच्छ बोला,
“तुम चिंता मत करो। मेरी पीठ पर बैठ जाना।”
बंदर उसकी बात मान गया और मगरमच्छ की पीठ पर बैठकर नदी पार करने लगा।
जब वे नदी के बीच पहुंचे तो मगरमच्छ धीरे-धीरे पानी में नीचे जाने लगा। बंदर डर गया और बोला,
“यह क्या कर रहे हो? मैं डूब जाऊंगा!”
तब मगरमच्छ बोला,


“सच तो यह है कि मैं तुम्हें मारने ले जा रहा हूं। मेरी पत्नी तुम्हारा कलेजा खाना चाहती है।”
यह सुनकर बंदर घबरा गया, लेकिन उसने तुरंत अपनी बुद्धि से काम लिया। वह बोला,
“अरे मित्र! अगर तुमने पहले बताया होता तो मैं अपना कलेजा साथ ले आता। मैंने उसे सुरक्षित रखने के लिए पेड़ पर रखा हुआ है।”
मगरमच्छ आश्चर्य में पड़ गया और बोला,
“सच?”
बंदर ने कहा,


“हां, जल्दी वापस चलो, नहीं तो देर हो जाएगी।”
मगरमच्छ तुरंत वापस पेड़ की ओर मुड़ गया। जैसे ही वे किनारे पहुंचे, बंदर फुर्ती से छलांग लगाकर पेड़ पर चढ़ गया।
ऊपर बैठकर वह हंसते हुए बोला,
“अरे मूर्ख! क्या कोई अपना कलेजा शरीर से अलग रख सकता है? तुमने अपनी पत्नी की बातों में आकर दोस्ती का विश्वास तोड़ दिया।”
मगरमच्छ शर्मिंदा होकर चुपचाप वहां से चला गया।

नैतिक शिक्षा:
संकट के समय बुद्धिमानी और सूझबूझ से काम लेने वाला व्यक्ति बड़ी से बड़ी मुसीबत से भी बच सकता है। साथ ही, सच्ची मित्रता में विश्वासघात नहीं होना चाहिए।

लालची नागदेव और मेढकों का राजा

एक पुराने कुएं में बहुत सारे मेंढक रहते थे और उनका राजा गंगदत्त था। गंगदत्त का स्वभाव बेहद झगड़ालू था। आसपास के दूसरे कुओं में रहने वाले मेंढकों और उनके राजाओं से उसका आए दिन किसी न किसी बात पर विवाद होता रहता था। इतना ही नहीं, अगर उसके अपने कुएं का कोई समझदार मेंढक उसे सही सलाह देने की कोशिश करता, तो वह अपने चहेते गुंडा मेंढकों से उसकी पिटाई तक करवा देता। धीरे-धीरे पूरे कुएं के मेंढकों के मन में अपने राजा के लिए गुस्सा और नफरत भरने लगी थी। घर में भी उसकी आदतों के कारण हर समय कलह मची रहती थी।


एक दिन पड़ोसी कुएं के राजा से गंगदत्त का बहुत बड़ा झगड़ा हो गया। दोनों के बीच खूब बहस हुई और अपमानजनक बातें भी कही गईं। अपने कुएं में लौटकर गंगदत्त ने क्रोध में आकर घोषणा कर दी कि पड़ोसी राजा ने उसका घोर अपमान किया है और अब बदला लेने के लिए हमला करना ही पड़ेगा। उसने अपने मेंढकों को आदेश दिया कि वे दूसरे कुएं पर चढ़ाई कर दें, लेकिन कुएं के समझदार और अनुभवी मेंढकों ने एक साथ विरोध करते हुए कहा कि दुश्मन उनसे कहीं ज्यादा ताकतवर और संख्या में बड़ा है, इसलिए यह लड़ाई लड़ना मूर्खता होगी।


यह सुनकर गंगदत्त का क्रोध और भड़क उठा। उसे लगा कि उसकी अपनी प्रजा भी अब उसका सम्मान नहीं करती। उसने अपने बेटों को बुलाकर उन्हें उकसाया कि वे जाकर पड़ोसी राजा के बेटों को सबक सिखाएं, लेकिन उसके बेटों ने भी साफ शब्दों में कह दिया कि बिना साहस और जोश के वे किसी से लड़ नहीं सकते। उन्होंने ताना मारते हुए कहा कि पिता ने उन्हें कभी खुलकर टर्राने तक नहीं दिया, जबकि मेंढकों का उत्साह और शक्ति उसी से आती है।


अब गंगदत्त भीतर ही भीतर जलने लगा। एक दिन वह गुस्से में कुएं से बाहर निकलकर इधर-उधर घूम रहा था कि तभी उसकी नजर एक भयंकर नाग पर पड़ी, जो अपने बिल में घुस रहा था। उसी क्षण उसके दिमाग में एक खतरनाक योजना कौंधी। वह नाग के बिल के पास पहुंचा और विनम्र स्वर में बोला, “हे नागदेव, आपको मेरा प्रणाम।”
नाग ने फुफकारते हुए कहा, “अरे मूर्ख मेंढक! मैं तो तुम्हारी जाति का दुश्मन हूं। तुम्हें खा जाता हूं और तुम खुद मेरे सामने चले आए हो?”

गंगदत्त ने दुखी बनने का नाटक करते हुए कहा, “कभी-कभी अपने ही लोग सबसे बड़े शत्रु बन जाते हैं। मेरी जाति वालों ने मेरा इतना अपमान किया है कि अब उनसे बदला लेने के लिए मुझे तुम्हारी सहायता चाहिए। अगर तुम मेरा साथ दो तो तुम्हें खाने की कभी कमी नहीं रहेगी।”


यह सुनकर नाग का लालच जाग उठा। उसने बिल से सिर बाहर निकालकर पूछा, “कैसे?”
गंगदत्त ने गर्व से बताया कि उसने गुप्त सुरंगें खुदवा रखी हैं, जो दूसरे कुओं तक जाती हैं। उन सुरंगों के बीच एक कक्ष है, जहां नाग आराम से रह सकता है और गंगदत्त जिस-जिस मेंढक की ओर इशारा करेगा, नाग उसे खा जाएगा। नाग तुरंत तैयार हो गया, क्योंकि उसे बिना मेहनत के भोजन मिलने वाला था।


कुछ ही दिनों में नाग ने पड़ोसी कुओं के सारे मेंढकों को खत्म कर दिया। जब वे समाप्त हो गए तो उसने गंगदत्त से अगला शिकार मांगा। अब गंगदत्त ने अपने ही कुएं के बुद्धिमान और समझदार मेंढकों के नाम बताने शुरू कर दिए। एक-एक करके वे भी नाग के पेट में समा गए। उसके बाद आम प्रजा की बारी आई। गंगदत्त ने सोचा कि ऐसी प्रजा का क्या फायदा जो हर समय शिकायत करती रहती है। नाग उन्हें भी खाता गया।


धीरे-धीरे पूरा कुआं खाली होने लगा। आखिर वह समय भी आ गया जब केवल गंगदत्त का परिवार और उसके करीबी मित्र ही बचे। नाग ने फिर भोजन मांगा तो गंगदत्त डर गया। अपनी जान बचाने के लिए उसने अपने मित्रों को नाग के हवाले कर दिया। उसके बाद उसके बेटे भी नाग का भोजन बन गए। गंगदत्त ने खुद को दिलासा दिया कि अगर वह और उसकी पत्नी जिंदा रहे तो और संतान पैदा कर लेंगे।


लेकिन नाग की भूख कहां खत्म होने वाली थी। उसने फिर भोजन मांगा। डर से कांपते हुए गंगदत्त ने अपनी पत्नी की ओर इशारा कर दिया। पत्नी को भी निगल जाने के बाद नाग ने दोबारा फुफकारते हुए कहा, “अब अगला भोजन कहां है?”
अब गंगदत्त पूरी तरह टूट चुका था। उसने हाथ जोड़कर कहा, “अब तो केवल मैं ही बचा हूं। मैं तुम्हारा मित्र हूं। अब तुम यहां से चले जाओ।”


नाग जोर से हंसा और बोला, “मूर्ख! जो अपने ही लोगों का नहीं हुआ, वह मेरा दोस्त कैसे हो सकता है?”
इतना कहकर नाग ने गंगदत्त को भी निगल लिया और उस कुएं में सन्नाटा छा गया।

नैतिक शिक्षा:
जो व्यक्ति अपने स्वार्थ और बदले की भावना में अंधा होकर अपनों को ही नुकसान पहुंचाता है, अंत में उसका विनाश निश्चित होता है।

शेर और मूर्ख गधा

एक घने जंगल में करालकेसर नाम का एक शक्तिशाली शेर रहता था। उसके साथ धूसरक नाम का एक चालाक गीदड़ हमेशा उसकी सेवा में लगा रहता था। एक बार शेर की भयंकर लड़ाई एक मदमस्त हाथी से हो गई थी, जिसमें उसके शरीर पर कई गहरे घाव हो गए और उसकी एक टांग भी टूट गई। अब उसकी हालत ऐसी हो चुकी थी कि कुछ कदम चलना भी मुश्किल था,

इसलिए जंगल में शिकार करना उसके बस की बात नहीं रही थी। कई दिनों से भूखे रहने के कारण शेर और गीदड़ दोनों बहुत परेशान थे।
एक दिन शेर ने गीदड़ से कहा, “तुम किसी जानवर को बहला-फुसलाकर यहां ले आओ। मैं पास आते ही उसे मार डालूंगा, फिर हम दोनों आराम से भोजन करेंगे।”


गीदड़ भोजन की तलाश में पास के गांव की ओर निकल पड़ा। वहां उसने तालाब के किनारे एक दुबले-पतले गधे को घास खाते देखा। उस गधे का नाम लम्बकर्ण था। गीदड़ उसके पास पहुंचा और बड़े प्यार से बोला, “मामा, प्रणाम! बहुत दिनों बाद दिखाई दिए। इतने कमजोर और दुखी क्यों लग रहे हो?”


गधे ने दुखी स्वर में कहा, “क्या बताऊं भांजे, मेरा मालिक धोबी बहुत निर्दयी है। दिनभर भारी बोझ ढोना पड़ता है और थोड़ा भी धीरे चलूं तो डंडों से पीटता है। खाने को ढंग की घास तक नहीं देता। इसी कारण मेरी यह हालत हो गई है।”
गीदड़ तुरंत बोला, “अगर ऐसी बात है तो मैं तुम्हें ऐसी जगह ले चलता हूं जहां चारों ओर हरी-भरी मुलायम घास है, साफ पानी का तालाब है और आराम ही आराम है। वहां तुम बिना किसी डर के मजे से जीवन बिता सकते हो।”


लम्बकर्ण ने डरते हुए कहा, “लेकिन जंगल में तो जंगली जानवर रहते हैं। कहीं कोई मुझे मारकर खा गया तो?”
गीदड़ हंस पड़ा और बोला, “अरे मामा, डरने की कोई बात नहीं। उस इलाके में मेरा पूरा रौब चलता है। वहां कई गधियां भी रहती हैं, जिन्होंने मुझसे कहा था कि उनके लिए कोई अच्छा गर्दभपति ढूंढकर लाऊं। तुम्हें देखकर लगा कि तुम उनके लिए बिल्कुल योग्य हो।”
गधे को यह बात बहुत अच्छी लगी। वह मन ही मन खुश हो गया और गीदड़ के साथ जंगल की ओर चल पड़ा। कुछ ही देर में दोनों उस स्थान पर पहुंच गए जहां घायल शेर भूखा बैठा था। जैसे ही शेर उठकर आगे बढ़ा, गधा डर गया और तेजी से भागने लगा। भागते समय शेर का पंजा उसकी पीठ पर लगा, लेकिन वह किसी तरह बचकर वहां से निकल गया।


गधे के भाग जाने पर गीदड़ ने शेर से कहा, “महाराज, आपका पंजा तो अब बिल्कुल बेकार हो गया है। एक साधारण गधा भी आपके वार से बच निकला।”
शेर थोड़ा शर्मिंदा होकर बोला, “मैं पूरी तरह तैयार नहीं था, इसलिए वह बच गया। अगर मैं सच में हमला करता तो हाथी भी नहीं बच पाता।”


गीदड़ बोला, “ठीक है, मैं उसे एक बार फिर यहां लेकर आता हूं। इस बार मौका हाथ से मत जाने देना।”
शेर ने आश्चर्य से कहा, “जो गधा अपनी आंखों से मुझे देखकर भाग चुका है, वह दोबारा यहां कैसे आएगा?”
गीदड़ मुस्कुराकर बोला, “यह काम मुझ पर छोड़ दीजिए।”


वह फिर उसी तालाब के पास पहुंचा, जहां गधा घास चर रहा था। गधे ने उसे देखते ही कहा, “तू तो मुझे मरवाने ले गया था। अगर मैं समय रहते भागता नहीं तो आज जिंदा नहीं बचता। वह कौन भयानक जानवर था जिसने मुझ पर हमला किया?”
गीदड़ हंसते हुए बोला, “मामा, तुम भी बड़े भोले हो। वह कोई जंगली जानवर नहीं था, बल्कि एक गधी थी जो तुम्हें देखकर प्रेम में पागल हो गई थी। उसने तुम्हें गले लगाने के लिए आगे कदम बढ़ाया था और तुम डरकर भाग निकले। अब वह तुम्हारे वियोग में रो-रोकर मरने वाली है। उसने कहा है कि अगर लम्बकर्ण उसका पति नहीं बना तो वह जान दे देगी।”


यह सुनकर मूर्ख गधा फिर उसके झांसे में आ गया और खुशी-खुशी गीदड़ के पीछे जंगल की ओर चल पड़ा।
इस बार जैसे ही वह शेर के पास पहुंचा, शेर पूरी ताकत से उस पर टूट पड़ा और एक ही वार में उसे मार डाला। शिकार करने के बाद शेर स्नान करने तालाब की ओर चला गया और गीदड़ को रखवाली के लिए वहीं छोड़ गया।
लेकिन गीदड़ कई दिनों से भूखा था। लालच में आकर उसने गधे के कान और दिल निकालकर खा लिए। थोड़ी देर बाद जब शेर वापस लौटा तो उसने देखा कि गधे के कान और दिल गायब हैं। वह गुस्से में दहाड़ते हुए बोला, “दुष्ट! तूने शिकार को जूठा क्यों कर दिया?”


गीदड़ ने बड़ी चालाकी से सिर झुकाकर कहा, “महाराज, इस गधे के कान और दिल थे ही नहीं। अगर उसके पास दिल और दिमाग होता तो वह एक बार मौत से बचकर फिर दोबारा यहां लौटकर क्यों आता?”
शेर को गीदड़ की बात सही लगी। उसके बाद दोनों ने मिलकर गधे का मांस खाया और अपनी भूख मिटाई।

नैतिक शिक्षा:
मूर्ख व्यक्ति बार-बार धोखा खाता है, जबकि चालाक लोग उसकी कमजोरी का फायदा उठाकर अपना स्वार्थ पूरा कर लेते हैं।

कुम्हार की कहानी

बहुत समय पहले युधिष्ठिर नाम का एक कुम्हार था। एक दिन वह अपने घर में काम कर रहा था कि अचानक उसका पैर टूटे हुए घड़े के नुकीले टुकड़े पर पड़ गया और वह जोर से गिर पड़ा। गिरते समय वह नुकीला ठीकरा उसके माथे में गहराई तक धंस गया। घाव इतना भयानक था कि खून लगातार बहने लगा। लंबे समय तक दवा-दारू कराने के बाद भी घाव जल्दी नहीं भरा और कई महीनों तक उसे कष्ट सहना पड़ा। आखिरकार घाव तो ठीक हो गया, लेकिन माथे पर एक गहरा और डरावना निशान हमेशा के लिए रह गया।


कुछ समय बाद उसके राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। खाने-पीने की समस्या बढ़ने लगी, इसलिए युधिष्ठिर अपना गांव छोड़कर दूसरे राज्य में चला गया। वहां उसने किसी तरह राजा की सेवा में नौकरी प्राप्त कर ली। एक दिन राजा की नजर उसके माथे पर पड़े गहरे घाव के निशान पर पड़ी। राजा ने सोचा कि यह व्यक्ति अवश्य कोई महान योद्धा होगा, जिसने युद्धभूमि में वीरता से लड़ते हुए यह घाव पाया होगा। उसी गलतफहमी में राजा ने उसे अपनी सेना में ऊंचा पद दे दिया।


राजा के पुत्र और बड़े-बड़े सेनापति यह देखकर भीतर ही भीतर जलने लगे। उन्हें आश्चर्य होता कि अचानक आया यह आदमी इतनी इज्जत और सम्मान कैसे पा गया, लेकिन राजा के डर से कोई कुछ बोल नहीं पाता था।
कुछ दिनों बाद पड़ोसी राज्य के साथ युद्ध की स्थिति बन गई। पूरे राज्य में युद्ध की तैयारियां शुरू हो गईं। हाथियों को सजाया जा रहा था, घोड़ों पर काठी बांधी जा रही थी और सैनिकों के बीच रणभेरी बज रही थी। उसी दौरान राजा ने प्रसन्न होकर युधिष्ठिर से पूछा, “वीर सैनिक, तुम्हारे माथे पर यह गहरा घाव किस युद्ध में लगा था? किस शत्रु से लड़ते हुए तुम घायल हुए थे?”


अब तक राजा का विश्वास और निकटता पाकर युधिष्ठिर को लगा कि सच बता देने पर भी उसकी इज्जत कम नहीं होगी। इसलिए उसने बिना कुछ छिपाए सारी सच्चाई बता दी। वह बोला, “महाराज, मैं कोई योद्धा नहीं हूं। मैं तो एक साधारण कुम्हार हूं। एक दिन शराब पीकर घर में लड़खड़ाते हुए गिर पड़ा था और टूटे हुए घड़े का नुकीला टुकड़ा मेरे माथे में धंस गया था। यह निशान उसी चोट का है।”


सच्चाई सुनते ही राजा का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। उसे अपनी भूल पर बहुत शर्म आई। वह गुस्से से कांपते हुए बोला, “तूने मुझे धोखा देकर इतना बड़ा पद हासिल कर लिया। तुरंत मेरे राज्य से निकल जा।”
युधिष्ठिर घबराकर राजा के सामने हाथ जोड़ने लगा। उसने विनती करते हुए कहा, “महाराज, भले ही मैं जन्म से कुम्हार हूं, लेकिन युद्धभूमि में आपके लिए अपने प्राण देने को तैयार हूं। कम से कम एक बार मेरी वीरता की परीक्षा तो ले लीजिए।”


लेकिन राजा का क्रोध शांत नहीं हुआ। उसने कठोर स्वर में कहा, “हो सकता है तुम गुणवान और साहसी हो, लेकिन तुम्हारा जन्म योद्धाओं के कुल में नहीं हुआ। तुम्हारी हालत उस गीदड़ जैसी है, जो शेरों के बीच पल तो गया, लेकिन असली युद्ध का सामना नहीं कर पाया।”


राजा ने आगे कहा, “इससे पहले कि दूसरे राजकुमार और सैनिक तुम्हारी सच्चाई जान जाएं और तुम्हें अपमानित करें, बेहतर यही है कि तुम यहां से चले जाओ और अपने लोगों के बीच लौट जाओ।”
राजा की बात सुनकर युधिष्ठिर बहुत दुखी हुआ। आखिरकार वह चुपचाप उस राज्य को छोड़कर चला गया और फिर कभी वापस नहीं लौटा।

नैतिक शिक्षा:
झूठ और गलतफहमी के आधार पर मिली प्रतिष्ठा ज्यादा समय तक टिक नहीं पाती। सच्चाई एक न एक दिन सामने आ ही जाती है।

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पंचतंत्र भारत की प्राचीन और प्रसिद्ध नीति कथाओं का संग्रह है, जिन्हें आचार्य विष्णु शर्मा द्वारा रचित माना जाता है। इन कहानियों के माध्यम से बुद्धिमानी, मित्रता, नीति, व्यवहार और जीवन की महत्वपूर्ण सीख सरल और रोचक तरीके से दी जाती है। आज भी पंचतंत्र की कथाएँ बच्चों और बड़ों दोनों के बीच समान रूप से लोकप्रिय हैं क्योंकि हर कहानी अपने भीतर एक गहरी नैतिक शिक्षा छुपाए होती है।

 लेखक / मूल रचनाकार: आचार्य विष्णु शर्मा
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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