साधु और चूहा ~ मित्र सम्प्राप्ति
पंचतंत्र: दक्षिण भारत के एक शांत नगर, महिलाओं से भरे सुंदर क्षेत्र के पास भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर स्थित था। उस मंदिर में एक तपस्वी साधु निवास करते थे। वे अत्यंत सरल और दयालु स्वभाव के थे। प्रतिदिन सुबह वे नगर में भिक्षा मांगने जाते और शाम तक लौट आते। अपनी जरूरत भर भोजन रखने के बाद वे बचा हुआ अन्न एक पात्र में रख देते थे, जिसे बाद में गरीब मजदूरों में बाँट दिया जाता था। वे मजदूर बदले में मंदिर की सफाई और सजावट का कार्य किया करते थे।
उसी मंदिर के एक कोने में एक छोटा-सा चूहा भी अपने बिल में रहता था। धीरे-धीरे उसकी नजर उस भोजन के पात्र पर पड़ गई। हर रात वह चुपके से बाहर निकलता और किसी न किसी तरह कटोरे तक पहुँचकर थोड़ा-बहुत भोजन चुरा लेता था।
कुछ दिनों बाद साधु को समझ आ गया कि कोई चूहा लगातार भोजन गायब कर रहा है। उन्होंने उसे रोकने के कई उपाय किए। कभी कटोरे को बहुत ऊँचाई पर टांग देते, तो कभी हाथ में डंडा लेकर पहरा देते। लेकिन चूहा इतना फुर्तीला और चालाक था कि हर बार किसी न किसी तरीके से भोजन तक पहुँच ही जाता था।
एक दिन एक भिक्षुक उस मंदिर में साधु से मिलने पहुँचा। उस समय साधु का पूरा
ध्यान चूहे को भगाने में लगा हुआ था। वे बार-बार डंडा जमीन पर मार रहे थे ताकि चूहा पास न आए। भिक्षुक को लगा कि साधु उसका सम्मान नहीं कर रहे हैं। क्रोधित होकर वह बोला, “यदि आपको अतिथि से बात करने की फुर्सत नहीं है, तो मैं भविष्य में कभी इस आश्रम में नहीं आऊँगा।”
यह सुनकर साधु ने विनम्रता से भिक्षुक को अपनी परेशानी बताई। उन्होंने कहा, “यह छोटा-सा चूहा मुझे बहुत परेशान कर चुका है। मैंने इसे रोकने के हर उपाय किए, लेकिन यह हर बार भोजन चुरा लेता है। इसकी छलांग इतनी ऊँची है कि कोई साधारण चूहा ऐसा नहीं कर सकता।”
भिक्षुक कुछ देर सोचने लगा। फिर उसने कहा, “किसी भी जीव में बिना कारण इतना साहस और शक्ति नहीं आती। अवश्य ही इस चूहे ने कहीं बहुत सारा भोजन जमा कर रखा होगा। उसी भंडार के कारण इसे आत्मविश्वास मिला हुआ है। जिसे अपने भविष्य की चिंता नहीं होती, वह निडर बन जाता है।”
भिक्षुक की बात साधु को सही लगी। दोनों ने निश्चय किया कि अगली सुबह वे चूहे का पीछा करेंगे और उसके बिल का पता लगाएंगे।
अगले दिन सूरज निकलते ही दोनों चुपचाप चूहे के पीछे चल पड़े। कुछ देर बाद चूहा अपने बिल में घुस गया। साधु और भिक्षुक ने वहाँ खुदाई शुरू की। थोड़ी ही देर में उन्हें आश्चर्य हुआ, क्योंकि बिल के भीतर अनाज और भोजन का बहुत बड़ा भंडार छिपा हुआ था।
साधु तुरंत वह सारा अन्न निकालकर वापस मंदिर ले आए।
जब चूहा वापस अपने बिल में पहुँचा और उसने अपना पूरा भंडार खाली देखा, तो उसका मन टूट गया। उसका आत्मविश्वास गायब हो गया और वह गहरे दुख में डूब गया।
फिर भी उसने हिम्मत नहीं छोड़ी। रात होने पर उसने एक बार फिर भोजन चुराने का प्रयास किया। वह पहले की तरह छलांग लगाकर कटोरे तक पहुँचने की कोशिश करने लगा, लेकिन इस बार वह बीच में ही नीचे गिर पड़ा। अब उसमें पहले जैसी शक्ति नहीं बची थी।
उसी समय साधु ने उसे देख लिया और डंडा उठाकर उसकी ओर दौड़े। चूहा किसी तरह अपनी जान बचाकर वहाँ से भाग निकला। अब उसे समझ आ चुका था कि केवल संग्रह और घमंड के सहारे मिली शक्ति हमेशा साथ नहीं रहती।
नैतिक शिक्षा:
अत्यधिक लोभ और दूसरों का हक छीनकर जमा किया गया धन या भोजन कभी स्थायी सुख नहीं देता। सच्ची शक्ति आत्मविश्वास और ईमानदारी से आती है, न कि संग्रह और अहंकार से।
गजराज और मूषकराज की कथा
प्राचीन समय में एक विशाल नदी के किनारे एक समृद्ध नगर बसा हुआ था। वह नगर व्यापार और वैभव के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। एक वर्ष ऐसी भयंकर वर्षा हुई कि नदी ने अपना मार्ग बदल लिया। नगर में पानी की भारी कमी हो गई। धीरे-धीरे लोग उस स्थान को छोड़कर चले गए और कुछ ही समय में पूरा नगर वीरान हो गया।
अब वहाँ इंसानों की जगह केवल चूहों का बसेरा रह गया था। चारों तरफ असंख्य चूहे दिखाई देने लगे। समय बीतते-बीतते चूहों का एक बड़ा राज्य बन गया और उनका राजा बना मूषकराज।
भाग्य का खेल देखिए, चूहों के बसने के बाद नगर के बाहर जमीन से पानी का एक नया स्रोत फूट पड़ा, जिसने धीरे-धीरे एक बड़े जलाशय का रूप ले लिया। उसी क्षेत्र से थोड़ी दूरी पर एक घना जंगल था, जहाँ अनेक हाथी रहते थे। उन हाथियों का राजा था विशालकाय गजराज।
कुछ समय बाद उस जंगल में भीषण सूखा पड़ा। तालाब और नदियाँ सूखने लगीं। सभी जीव-जंतु पानी के लिए भटकने लगे। सबसे अधिक परेशानी हाथियों को हो रही थी। उनके बच्चे प्यास से तड़प रहे थे और कई तो दम भी तोड़ने लगे थे।
गजराज अपने साथियों की दशा देखकर अत्यंत चिंतित था। तभी उसकी मित्र चील उड़ती हुई उसके पास आई और बोली, “खंडहर बने नगर के पास एक बड़ा जलाशय है। वहाँ पर्याप्त पानी मौजूद है।”
यह सुनते ही गजराज ने सभी हाथियों को तुरंत वहाँ चलने का आदेश दिया। सैकड़ों हाथियों का विशाल झुंड जलाशय की ओर बढ़ चला। जलाशय तक पहुँचने के लिए उन्हें वीरान नगर के बीच से गुजरना पड़ा।
भारी हाथियों के पैरों तले हजारों चूहे कुचल गए। नगर की गलियाँ चूहों के रक्त से भर गईं। केवल एक दिन नहीं, हाथी रोज उसी रास्ते से आने-जाने लगे और हर बार अनेक चूहों की मृत्यु होने लगी।
चूहों के राज्य में शोक फैल गया। तब मूषकराज ने अपने मंत्रियों के साथ सभा की। काफी विचार-विमर्श के बाद मंत्रियों ने कहा, “महाराज, हमें स्वयं जाकर गजराज से निवेदन करना चाहिए। वे बुद्धिमान और दयालु हैं।”
अगले ही दिन मूषकराज हाथियों के वन में पहुँचा। वहाँ एक विशाल वृक्ष के नीचे गजराज खड़ा था। मूषकराज एक बड़े पत्थर पर चढ़ा और ऊँची आवाज में बोला, “गजराज को मूषकराज का प्रणाम।”
लेकिन उसकी छोटी आवाज गजराज तक ठीक से नहीं पहुँच पाई। तब दयालु गजराज नीचे बैठ गया और अपना कान उसके निकट ले जाकर बोला, “नन्हे मित्र, कृपया अपनी बात दोबारा कहिए।”
मूषकराज बोला, “हे गजराज, हम चूहे खंडहर नगर में रहते हैं। जब आपके हाथी जलाशय तक जाते हैं, तब हजारों चूहे उनके पैरों तले दबकर मर जाते हैं। यदि ऐसा ही चलता रहा तो हमारा पूरा वंश समाप्त हो जाएगा।”
गजराज यह सुनकर दुखी हो गया। उसने गंभीर स्वर में कहा, “मूषकराज, हमें इस विनाश का ज्ञान नहीं था। हम तुरंत अपना रास्ता बदल देंगे।”
मूषकराज ने कृतज्ञ होकर कहा, “महान गजराज, आपने हम छोटे जीवों की बात सुनी, इसके लिए हम आपके आभारी हैं। यदि कभी आपको हमारी आवश्यकता पड़े, तो अवश्य याद कीजिएगा।”
गजराज मुस्कुराया। उसे लगा कि छोटे-से चूहे भला हाथियों के किस काम आएँगे। फिर भी उसने प्रेमपूर्वक मूषकराज को विदा किया।
कुछ समय बाद पड़ोसी राज्य के राजा ने अपनी सेना के लिए हाथियों को पकड़ने का आदेश दिया। सैनिक जंगल में आए और जगह-जगह मजबूत जाल तथा फंदे बिछाकर चले गए। कई हाथी उन जालों में फँस गए।
एक रात गजराज जंगल में घूम रहा था। अचानक उसका पैर सूखी पत्तियों के नीचे छिपे फंदे में फँस गया। जैसे ही उसने पैर छुड़ाने की कोशिश की, रस्सी और कस गई। रस्सी का दूसरा सिरा एक विशाल पेड़ से मजबूती से बँधा था।
गजराज दर्द और भय से जोर-जोर से चिंघाड़ने लगा। उसने अपने साथियों को पुकारा, लेकिन कोई भी उसके पास आने का साहस नहीं कर पाया।
उसी जंगल में एक युवा जंगली भैंसा रहता था, जो गजराज का बहुत सम्मान करता था। बचपन में वह एक गहरे गड्ढे में गिर गया था और तब गजराज ने उसकी जान बचाई थी।
जब उसने गजराज की चिंघाड़ सुनी, तो वह तुरंत दौड़ता हुआ वहाँ पहुँचा। गजराज को फंदे में फँसा देखकर वह व्याकुल हो उठा। उसने कहा, “गजराज, मैं आपकी सहायता के लिए क्या कर सकता हूँ? आवश्यकता पड़ी तो अपनी जान भी दे दूँगा।”
गजराज ने शांत स्वर में कहा, “यदि सच में मेरी सहायता करना चाहते हो, तो तुरंत खंडहर नगर जाओ और मूषकराज को सारी बात बताओ।”
भैंसा तेज गति से दौड़ता हुआ मूषकराज के पास पहुँचा और पूरी घटना सुनाई। यह सुनते ही मूषकराज अपने सैनिक चूहों के साथ तुरंत निकल पड़ा। सभी चूहे भैंसे की पीठ पर बैठकर शीघ्र ही जंगल पहुँच गए।
वहाँ पहुँचते ही चूहों ने अपने तेज दाँतों से रस्सियों को काटना शुरू कर दिया। कुछ ही देर में मोटा फंदा कट गया और गजराज आजाद हो गया।
गजराज की आँखों में कृतज्ञता भर आई। उसे समझ आ गया कि संसार में कोई भी जीव छोटा या बेकार नहीं होता। समय आने पर सबसे छोटा मित्र भी सबसे बड़ी सहायता कर सकता है।
नैतिक शिक्षा:
कभी किसी को छोटा या कमजोर समझकर उसका अपमान नहीं करना चाहिए। सच्ची मित्रता और सहयोग समय आने पर सबसे बड़ी शक्ति बन जाते हैं।
ब्राह्मणी और तिल के बीज ~ पंचतंत्र
एक समय की बात है, एक निर्धन ब्राह्मण अपने परिवार के साथ एक छोटे-से गाँव में रहता था। उनका जीवन अत्यंत साधारण था। कई बार घर में खाने तक की कमी हो जाती थी।
एक दिन उनके घर कुछ अतिथि आ पहुँचे। घर में न अन्न बचा था और न ही कोई दूसरी खाने की वस्तु। इसी चिंता में ब्राह्मण और उसकी पत्नी आपस में बात कर रहे थे।
ब्राह्मण बोला, “कल प्रातः कर्क-संक्रांति है। मैं भिक्षा लेने दूसरे गाँव जाऊँगा। वहाँ एक दानी ब्राह्मण सूर्यदेव की पूजा के लिए दान देना चाहता है।”
यह सुनकर ब्राह्मणी दुखी स्वर में बोली, “तुम्हें इतना भी नहीं आता कि घर के लिए पर्याप्त भोजन जुटा सको। तुम्हारी पत्नी होकर मैंने कभी सुख नहीं देखा। न अच्छे वस्त्र मिले, न स्वादिष्ट भोजन और न ही कोई आभूषण।”
ब्राह्मण शांत स्वर में बोला, “देवी, ऐसा नहीं कहना चाहिए। मनुष्य को उतना ही धन मिलता है जितना उसके भाग्य में लिखा होता है। मैं पेट भरने योग्य अन्न तो ले ही आता हूँ। अधिक लोभ करना उचित नहीं। अत्यधिक लालच मनुष्य को संकट में डाल देता है।”
ब्राह्मणी ने आश्चर्य से पूछा, “यह कैसे?”
तब ब्राह्मण ने उसे एक कथा सुनाई।
उसने कहा, “एक बार एक शिकारी जंगल में शिकार करने गया। वहाँ उसे एक विशाल और काला जंगली सूअर दिखाई दिया। शिकारी ने धनुष पर बाण चढ़ाकर पूरी शक्ति से सूअर पर निशाना लगाया। बाण सूअर को जा लगा। घायल सूअर क्रोध में भरकर शिकारी पर टूट पड़ा। उसके तेज दाँतों से शिकारी गंभीर रूप से घायल हो गया। थोड़ी ही देर में दोनों की मृत्यु हो गई।”
कुछ समय बाद वहाँ एक भूखा गीदड़ पहुँचा। उसने शिकारी और सूअर दोनों को मृत पड़ा देखा तो बहुत प्रसन्न हुआ। वह सोचने लगा, “आज तो बिना परिश्रम के ही कई दिनों का भोजन मिल गया।”
फिर उसने सोचा कि यदि वह धीरे-धीरे भोजन करेगा तो यह लंबे समय तक चलेगा। इसलिए उसने पहले छोटी चीजें खाने का निश्चय किया। उसकी नजर धनुष की तनी हुई डोरी पर पड़ी।
गीदड़ ने डोरी को मुँह में दबाकर चबाना शुरू किया। जैसे ही डोरी टूटी, धनुष का सिरा तेजी से उछला और उसके माथे में जा घुसा। वह गंभीर रूप से घायल होकर वहीं मर गया। ऐसा प्रतीत होता था मानो उसके माथे पर शिखा निकल आई हो।
कहानी समाप्त करके ब्राह्मण बोला, “इसीलिए कहा जाता है कि अत्यधिक लोभ अंत में विनाश का कारण बनता है।”
ब्राह्मणी ने पति की बात सुनी और कुछ देर सोचने के बाद बोली, “घर में थोड़े-से तिल पड़े हैं। मैं उन्हें साफ करके अतिथियों के लिए भोजन तैयार कर दूँगी।”
यह सुनकर ब्राह्मण संतुष्ट हो गया और अगले दिन भिक्षा लेने दूसरे गाँव चला गया।
उधर ब्राह्मणी ने घर में रखे तिलों को साफ करना शुरू किया। उसने उन्हें अच्छी तरह छाँटा और धूप में सुखाने के लिए बाहर फैला दिया।
तभी अचानक एक कुत्ता वहाँ आ गया और उन तिलों को गंदा कर गया। यह देखकर ब्राह्मणी बहुत परेशान हो गई। वही तिल अतिथियों के भोजन के लिए रखे गए थे।
कुछ देर सोचने के बाद उसके मन में एक उपाय आया। उसने सोचा, “यदि मैं इन साफ किए हुए तिलों के बदले किसी से बिना साफ किए तिल माँगूँगी, तो शायद कोई आसानी से बदल देगा। किसी को क्या पता चलेगा कि ये तिल खराब हो चुके हैं।”
यह सोचकर उसने उन तिलों को एक छाज में रखा और घर-घर जाकर कहने लगी, “कोई बिना साफ किए तिल दे दे और बदले में साफ किए हुए तिल ले ले।”
इसी दौरान वह एक घर पहुँची। वहाँ की गृहिणी यह सौदा करने के लिए तैयार हो गई। तभी उसका पुत्र, जिसने अर्थशास्त्र पढ़ रखा था, पास आ गया।
उसने अपनी माँ से कहा, “माता, यह सौदा मत कीजिए। कोई भी समझदार व्यक्ति बिना कारण अच्छे और साफ किए हुए तिल देकर खराब तिल नहीं लेगा। अवश्य ही इन तिलों में कोई दोष है।”
पुत्र की बात सुनकर गृहिणी सावधान हो गई और उसने तिल बदलने से मना कर दिया।
इस प्रकार ब्राह्मणी की चालाकी सफल नहीं हो सकी।
नैतिक शिक्षा:
लोभ और छल से किया गया कार्य अंततः असफल ही होता है। बुद्धिमान व्यक्ति हर बात को सोच-समझकर परखता है और बिना कारण किसी लाभ के पीछे नहीं भागता।
व्यापारी के पुत्र की कहानी
एक नगर में एक व्यापारी का पुत्र रहता था। समय का चक्र ऐसा बदला कि उसकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई। निर्धन होने के बाद उसने निश्चय किया कि वह दूसरे देशों में जाकर व्यापार करेगा और फिर से धन कमाएगा।
उसके पास लोहे का एक बहुत भारी और मूल्यवान तराजू था, जिसका वजन लगभग बीस किलो था। यात्रा पर निकलने से पहले उसने वह तराजू नगर के एक धनी सेठ के पास धरोहर के रूप में रख दिया और स्वयं व्यापार के लिए दूर देश चला गया।
व्यापारी का पुत्र कई देशों में घूमता रहा। उसने मेहनत और बुद्धिमानी से व्यापार किया और धीरे-धीरे बहुत धन कमा लिया। वर्षों बाद वह अपने नगर वापस लौटा।
घर लौटने के कुछ दिन बाद वह सेठ के पास गया और विनम्रता से बोला, “सेठ जी, अब कृपया मेरा तराजू मुझे वापस दे दीजिए।”
सेठ लालची और बेईमान था। उसने तराजू लौटाने का मन नहीं बनाया। वह झूठ बोलते हुए बोला, “भाई, तुम्हारा तराजू तो चूहे खा गए। अब मैं क्या कर सकता हूँ?”
व्यापारी का पुत्र समझ गया कि सेठ धोखा दे रहा है, लेकिन उसने तुरंत कोई विवाद नहीं किया। वह शांत स्वर में बोला, “यदि चूहे तराजू खा गए तो इसमें आपका क्या दोष! मैं नदी में स्नान करने जा रहा हूँ। यदि आप अपने पुत्र को मेरे साथ भेज दें तो बड़ी कृपा होगी।”
सेठ को डर था कि कहीं व्यापारी का पुत्र उस पर चोरी का आरोप न लगा दे। इसलिए उसने अपने बेटे को उसके साथ भेज दिया।
दोनों नदी किनारे पहुँचे। स्नान करने के बाद व्यापारी के पुत्र ने अवसर देखकर लड़के को एक गुफा में छिपा दिया और गुफा का द्वार एक बड़ी चट्टान से बंद कर दिया। फिर वह अकेला ही नगर लौट आया।
सेठ ने अपने पुत्र को साथ न देखकर घबराकर पूछा, “मेरा बेटा कहाँ है?”
व्यापारी के पुत्र ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया, “जब हम नदी किनारे बैठे थे, तभी अचानक एक विशाल बाज आया और आपके पुत्र को पंजों में दबाकर उड़ गया।”
यह सुनते ही सेठ क्रोध से भर उठा। वह चिल्लाकर बोला, “तुम झूठ बोल रहे हो! कोई बाज इतने बड़े लड़के को कैसे उठा सकता है? तुरंत मेरे पुत्र को वापस लाओ, नहीं तो मैं राजा के दरबार में शिकायत करूँगा।”
व्यापारी का पुत्र शांत भाव से बोला, “ठीक है, चलिए न्यायालय चलते हैं।”
दोनों राजदरबार पहुँचे। सेठ ने न्यायाधीश के सामने व्यापारी के पुत्र पर अपने बेटे को गायब करने का आरोप लगाया।
न्यायाधीश ने व्यापारी के पुत्र से कहा, “तुम्हें सेठ का पुत्र तुरंत वापस करना होगा।”
व्यापारी के पुत्र ने विनम्रता से उत्तर दिया, “महाराज, मैं तो नदी किनारे बैठा था। तभी एक बड़ा बाज आया और सेठ के पुत्र को उठाकर ले गया। अब मैं उसे कहाँ से लाऊँ?”
न्यायाधीश ने कठोर स्वर में कहा, “यह असंभव है। कोई बाज इतने बड़े लड़के को नहीं उठा सकता।”
तब व्यापारी के पुत्र ने बुद्धिमानी से उत्तर दिया, “महाराज, यदि साधारण चूहे बीस किलो वजनी लोहे का तराजू खा सकते हैं, तो एक बड़ा बाज लड़के को भी उठा सकता है।”
यह सुनते ही न्यायाधीश सब समझ गया। उसने तुरंत सेठ से सच्चाई पूछी।
आखिरकार सेठ डर गया और उसने स्वीकार कर लिया कि उसने व्यापारी का तराजू लौटाने के लालच में झूठ बोला था।
न्यायाधीश ने आदेश दिया कि व्यापारी का तराजू तुरंत उसे वापस किया जाए। इसके बाद व्यापारी के पुत्र ने भी सेठ के लड़के को सुरक्षित वापस लौटा दिया।
इस प्रकार बुद्धिमानी और धैर्य से व्यापारी के पुत्र ने अपना अधिकार वापस प्राप्त कर लिया।
नैतिक शिक्षा:
जो व्यक्ति दूसरों के साथ छल करता है, उसे अंत में स्वयं शर्मिंदा होना पड़ता है। बुद्धिमानी और धैर्य से बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान किया जा सकता है।
अभागा बुनकर
एक नगर में सोमिलक नाम का एक जुलाहा रहता था। वह अत्यंत कुशल कारीगर था और बहुत सुंदर, रंग-बिरंगे तथा उत्कृष्ट वस्त्र तैयार करता था। उसके बनाए कपड़ों की प्रशंसा दूर-दूर तक होती थी, लेकिन इतना परिश्रम करने के बाद भी उसे केवल भोजन और साधारण जीवन चलाने भर का धन ही मिल पाता था।
उसी नगर में अन्य जुलाहे साधारण और मोटा कपड़ा बुनते थे, फिर भी वे धीरे-धीरे धनी बन चुके थे। यह देखकर सोमिलक बहुत दुखी रहने लगा।
एक दिन उसने अपनी पत्नी से कहा, “देखो, जो लोग साधारण कपड़ा बनाते हैं, वे भी धनवान हो गए हैं। लेकिन मैं इतने सुंदर वस्त्र बनाकर भी गरीब ही हूँ। लगता है यह नगर मेरे लिए भाग्यशाली नहीं है। इसलिए मैं विदेश जाकर धन कमाना चाहता हूँ।”
उसकी पत्नी ने समझाते हुए कहा, “प्रिय, केवल स्थान बदलने से भाग्य नहीं बदलता। यदि धन भाग्य में लिखा हो तो वह यहीं मिल जाएगा, और यदि भाग्य में न हो तो हाथ आया धन भी चला जाता है। इसलिए यहीं रहकर काम करना बेहतर है।”
लेकिन सोमिलक ने कहा, “भाग्य की बातें डरपोक लोग करते हैं। लक्ष्मी उसी को मिलती है जो मेहनत और साहस करता है। मैं विदेश जाकर अवश्य धन कमाऊँगा।”
यह कहकर वह वर्धमानपुर नामक नगर चला गया। वहाँ उसने कई वर्षों तक कठोर परिश्रम किया और अपने कौशल से तीन सौ सोने की मुद्राएँ जमा कर लीं।
धन लेकर वह अपने घर लौटने लगा। रास्ता लंबा था। आधे मार्ग में रात हो गई। आस-पास कहीं ठहरने का स्थान नहीं था, इसलिए वह एक बड़े पेड़ की शाखा पर चढ़कर सो गया।
रात में उसे स्वप्न दिखाई दिया। उसने देखा कि दो अद्भुत पुरुष आपस में बातचीत कर रहे हैं।
एक बोला, “हे पौरुष! तुम्हें पता है कि सोमिलक के भाग्य में भोजन और वस्त्र से अधिक धन नहीं लिखा है, फिर तुमने इसे तीन सौ स्वर्ण मुद्राएँ क्यों दीं?”
दूसरे ने उत्तर दिया, “मैं तो हर मेहनती व्य
क्ति को उसके परिश्रम का फल देता हूँ। उसके पास धन टिकेगा या नहीं, यह तुम्हारे हाथ में है।”
अचानक सोमिलक की नींद खुल गई। उसने घबराकर अपनी थैली देखी तो उसमें एक भी मुद्रा नहीं थी। सारी मेहनत का धन गायब हो चुका था।
वह बहुत दुखी हुआ, लेकिन हार नहीं मानी। वह फिर वर्धमानपुर लौट गया और इस बार पहले से भी अधिक मेहनत करने लगा।
एक वर्ष के भीतर उसने पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ जमा कर लीं। फिर वह घर की ओर रवाना हुआ।
इस बार उसने निश्चय किया कि रास्ते में कहीं नहीं रुकेगा। लेकिन चलते-चलते उसने फिर उन्हीं दो पुरुषों की आवाज सुनी।
पहला बोला, “हे पौरुष! तुम जानते हो कि सोमिलक के भाग्य में अधिक धन नहीं है, फिर तुमने इसे पाँच सौ मुद्राएँ क्यों दीं?”
दूसरा बोला, “मैं तो केवल परिश्रम का फल देता हूँ। धन टिकेगा या नहीं, यह तुम्हारे अधीन है।”
यह सुनते ही सोमिलक ने अपनी गठरी खोली। वह फिर खाली थी।
अब वह पूरी तरह टूट चुका था। उसे लगा कि उसका जीवन व्यर्थ है। दुख और निराशा में उसने सोचा कि ऐसे जीवन से तो मृत्यु बेहतर है।
वह एक वृक्ष के पास गया और रस्सी का फंदा बनाकर आत्महत्या करने की तैयारी करने लगा। तभी अचानक आकाश से आवाज आई—
“सोमिलक! ऐसा मत करो। तुम्हारे भाग्य में भोजन और वस्त्र से अधिक धन का सुख नहीं लिखा है। इसलिए तुम्हारा धन मैंने ही ले लिया। लेकिन तुम्हारे साहस और मेहनत से मैं प्रसन्न हूँ। तुम कोई वरदान माँगो।”
सोमिलक तुरंत बोला, “मुझे बहुत सारा धन चाहिए।”
आकाशवाणी ने कहा, “जब तुम्हारे भाग्य में धन का उपभोग नहीं लिखा, तब इतना धन लेकर क्या करोगे?”
लेकिन सोमिलक ने कहा, “चाहे मैं उसका उपयोग करूँ या नहीं, फिर भी धनवान कहलाना चाहता हूँ। संसार में सम्मान उसी को मिलता है जिसके पास धन होता है।”
तब देवता ने कहा, “यदि ऐसा है तो फिर वर्धमानपुर जाओ। वहाँ दो व्यापारी रहते हैं—एक का नाम गुप्तधन है और दूसरे का उपभुक्त धन। दोनों के जीवन को देखकर निर्णय करो कि तुम्हें किस प्रकार का धन चाहिए।”
यह कहकर देवता अदृश्य हो गया।
सोमिलक अगले ही दिन वर्धमानपुर पहुँचा। सबसे पहले वह गुप्तधन के घर गया।
गुप्तधन बहुत कंजूस था। उसने न तो सोमिलक का सम्मान किया और न ही प्रेम से बात की। बड़ी मुश्किल से उसने उसे सूखी रोटी खाने को दी।
रात में सोमिलक ने फिर स्वप्न देखा। वही दो पुरुष बात कर रहे थे।
एक बोला, “हे पौरुष! तुमने गुप्तधन से इतना खर्च क्यों करवा दिया कि उसने अतिथि को रोटी तक दे दी?”
दूसरे ने कहा, “अतिथि-सत्कार करवाना मेरा काम है। उसके फल का निर्णय तुम्हारे हाथ में है।”
अगले दिन गुप्तधन बीमार पड़ गया और उसे उपवास करना पड़ा। इस प्रकार उसका खर्च पूरा हो गया।
इसके बाद सोमिलक उपभुक्त धन के घर पहुँचा। वहाँ उसका बड़े आदर और प्रेम से स्वागत हुआ। उसे स्वादिष्ट भोजन कराया गया और आराम करने के लिए सुंदर बिस्तर दिया गया।
रात में उसने फिर वही स्वप्न देखा।
एक पुरुष बोला, “हे पौरुष! उपभुक्त धन ने अतिथि-सत्कार में बहुत खर्च कर दिया। अब इसकी भरपाई कैसे होगी?”
दूसरे ने कहा, “अतिथि का सम्मान करवाना मेरा कार्य था। उसके फल की व्यवस्था तुम्हारे अधीन है।”
अगली सुबह राजदरबार से एक सेवक वहाँ पहुँचा और राजा की ओर से उपभुक्त धन को पुरस्कार स्वरूप बहुत सारा धन देकर गया।
यह देखकर सोमिलक को समझ आ गया कि जो धन दूसरों के काम आए, दान और सत्कार में खर्च हो, वही श्रेष्ठ होता है। केवल संग्रह करके रखा गया धन किसी काम का नहीं होता।
तब उसने निश्चय किया कि संचय से अधिक महत्वपूर्ण धन का सदुपयोग है।
नैतिक शिक्षा:
केवल धन जमा करना ही बुद्धिमानी नहीं है। सच्चा सुख उसी धन में है जो अच्छे कार्यों, दान और दूसरों की सहायता में उपयोग किया जाए।
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पंचतंत्र भारत की प्राचीन और प्रसिद्ध नीति कथाओं का संग्रह है, जिन्हें आचार्य विष्णु शर्मा द्वारा रचित माना जाता है। इन कहानियों के माध्यम से बुद्धिमानी, मित्रता, नीति, व्यवहार और जीवन की महत्वपूर्ण सीख सरल और रोचक तरीके से दी जाती है। आज भी पंचतंत्र की कथाएँ बच्चों और बड़ों दोनों के बीच समान रूप से लोकप्रिय हैं क्योंकि हर कहानी अपने भीतर एक गहरी नैतिक शिक्षा छुपाए होती है।
लेखक / मूल रचनाकार: आचार्य विष्णु शर्मा
प्रस्तुति: Saying Central Team





