पंचतंत्र

पंचतंत्र की प्रमुख कहानियाँ: अपरीक्षितकारक

Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

पाँचवा तंत्र

पंचतंत्र: दक्षिण दिशा में स्थित प्रसिद्ध नगर पाटलीपुत्र में मणिभद्र नाम का एक धनी महाजन रहता था। वह अत्यंत दयालु और धर्मपरायण व्यक्ति था। वह अपना धन लोक-सेवा, दान और धर्म-कर्म में खर्च करता रहता था। धीरे-धीरे उसकी संपत्ति कम होने लगी और उसके सम्मान में भी कमी आने लगी।

समाज में घटते मान-सम्मान को देखकर मणिभद्र अत्यंत दुखी रहने लगा। वह दिन-रात चिंता में डूबा रहता। उसे लगने लगा कि निर्धन व्यक्ति के गुणों का भी कोई मूल्य नहीं होता। चाहे मनुष्य कितना ही विद्वान, शीलवान और प्रतिभाशाली क्यों न हो, गरीबी उसके सारे गुणों को ढक देती है।

उसे यह भी महसूस होने लगा कि जब घर में धन की कमी हो जाती है, तब परिवार का सुख भी समाप्त होने लगता है। घर की छोटी-छोटी आवश्यकताओं की चिंता मनुष्य की बुद्धि और प्रतिभा को नष्ट कर देती है। सम्मानहीन जीवन उसे मृत्यु से भी अधिक दुखद लगने लगा।

एक रात चिंता करते-करते वह सो गया। नींद में उसने एक अद्भुत स्वप्न देखा। उसके स्वप्न में पद्मनिधि नामक देवता एक भिक्षु के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने कहा, “तुम चिंता छोड़ दो। तुम्हारे पूर्वजों ने मेरा बहुत आदर किया था, इसलिए मैं तुम्हारी सहायता करने आया हूँ। कल सुबह मैं इसी भिक्षु के वेश में तुम्हारे सामने आऊँगा। तुम मुझे लाठी से मार देना। मेरे मरते ही मेरा शरीर स्वर्ण में बदल जाएगा और तुम्हारी दरिद्रता हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी।”


सुबह उठने पर मणिभद्र इसी स्वप्न के बारे में सोचता रहा। वह समझ नहीं पा रहा था कि यह सपना सच था या केवल उसकी कल्पना। तभी अचानक उसके सामने वही भिक्षु आ पहुँचा, जैसा उसने स्वप्न में देखा था।
भिक्षु को देखते ही उसे स्वप्न की बात याद आ गई। उसने पास रखी लाठी उठाई और भिक्षु के सिर पर प्रहार कर दिया। प्रहार लगते ही भिक्षु वहीं गिर पड़ा और उसका शरीर स्वर्णमय हो गया। यह देखकर मणिभद्र अत्यंत आश्चर्यचकित हुआ। उसने तुरंत उस स्वर्णमय शरीर को छिपा दिया।

लेकिन उसी समय वहाँ एक नाई मौजूद था। उसने पूरी घटना अपनी आँखों से देख ली थी। मणिभद्र ने उसे धन और वस्त्र देकर यह बात किसी से न कहने के लिए मना लिया।
नाई ने यह बात किसी को नहीं बताई, परंतु उसके मन में लालच उत्पन्न हो गया। उसने सोचा कि यदि एक भिक्षु को मारने से वह स्वर्ण बन सकता है, तो दूसरे भिक्षु भी स्वर्ण बन सकते हैं। उसने निश्चय किया कि वह भी यही उपाय करके शीघ्र धनी बन जाएगा।
अगले दिन सुबह वह भिक्षुओं के मठ में पहुँचा। वहाँ जाकर उसने प्रधान भिक्षु को प्रणाम किया और विनम्रता से कहा कि वे अपने सभी भिक्षुओं सहित उसके घर भिक्षा ग्रहण करने आएँ।
प्रधान भिक्षु ने कहा, “हम लोग किसी निमंत्रण पर भोजन करने नहीं जाते। हम तो घूमते-घूमते जहाँ इच्छा होती है, वहीं भिक्षा ग्रहण कर लेते हैं। इसलिए तुम व्यर्थ आग्रह मत करो।”

नाई ने चतुराई से कहा, “मैं केवल भोजन के लिए नहीं बुला रहा हूँ। मैं आप सभी को पुस्तक-लेखन की सामग्री और दान देना चाहता हूँ।”
यह सुनकर प्रधान भिक्षु तैयार हो गया। नाई तुरंत घर पहुँचा और पहले से रखी हुई लाठियों को दरवाजे के पास जमा कर दिया। थोड़ी देर बाद वह भिक्षुओं को लेकर घर आया।
भिक्षु भी दान और वस्त्र मिलने की आशा में उसके साथ चले आए। जैसे ही वे घर के भीतर पहुँचे, नाई ने दरवाजा बंद कर दिया और लाठी से उन पर प्रहार करना शुरू कर दिया। कई भिक्षु वहीं मर गए और अनेक गंभीर रूप से घायल हो गए।
उनकी चीख-पुकार सुनकर आसपास के लोग और नगर के सैनिक वहाँ पहुँच गए। उन्होंने देखा कि घर के भीतर खून फैला हुआ है और कई भिक्षु घायल अवस्था में पड़े हैं।


जब अधिकारियों ने नाई से इस हत्याकांड का कारण पूछा, तब उसने मणिभद्र और स्वर्णमय भिक्षु की पूरी घटना बता दी।
इसके बाद राजा के आदेश से मणिभद्र को बुलाया गया। उसने अपना स्वप्न और उससे जुड़ी पूरी घटना सच-सच बता दी।
सभी बातें सुनने के बाद धर्माधिकारियों ने निर्णय दिया कि नाई ने बिना सोचे-समझे केवल लालच में आकर यह भयंकर अपराध किया है। इसलिए उसे मृत्युदंड दिया जाए।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति बिना परखे और बिना विचार किए किसी कार्य को करता है, उसका परिणाम अंत में विनाश ही होता है।

नैतिक शिक्षा:
किसी भी कार्य को बिना समझे और बिना पूरी सच्चाई जाने केवल दूसरों की नकल में नहीं करना चाहिए। लालच और जल्दबाजी मनुष्य को विनाश की ओर ले जाते हैं।

पंचतंत्र : ब्राह्मणी और नेवला की कथा

बहुत समय पहले देवशर्मा नाम का एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। जिस दिन उनके घर पुत्र का जन्म हुआ, उसी दिन उनके घर में रहने वाली एक नकुली ने भी एक छोटे नेवले को जन्म दिया। ब्राह्मण की पत्नी का स्वभाव अत्यंत दयालु था। उसने उस नन्हे नेवले को भी अपने पुत्र की तरह प्रेम से पाला-पोसा। समय बीतने लगा और दोनों साथ-साथ बड़े होने लगे। नेवला और बालक में गहरा स्नेह हो गया था। वे हर समय साथ खेलते रहते थे।


हालाँकि ब्राह्मणी दोनों का प्रेम देखकर प्रसन्न होती थी, लेकिन उसके मन में हमेशा एक डर बना रहता था। उसे चिंता रहती कि कहीं नेवला कभी अज्ञानवश उसके पुत्र को नुकसान न पहुँचा दे। वह सोचती कि पशु आखिर पशु ही होता है, कब उसका स्वभाव बदल जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता।


एक दिन ब्राह्मणी अपने पुत्र को एक वृक्ष की छाया में सुलाकर पास के तालाब से पानी भरने जाने लगी। जाते समय उसने अपने पति देवशर्मा से कहा कि वे बच्चे का ध्यान रखें और कहीं बाहर न जाएँ। उसने विशेष रूप से यह भी कहा कि नेवले पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता।
पत्नी के जाने के बाद देवशर्मा ने सोचा कि नेवला तो बच्चे का सच्चा साथी है, वह कभी उसे हानि नहीं पहुँचाएगा। इसी विचार से वह भी भिक्षा लेने के लोभ में घर से बाहर चला गया और बच्चा तथा नेवला वहीं अकेले रह गए।


कुछ देर बाद अचानक पास के बिल से एक भयंकर काला नाग बाहर निकला। वह धीरे-धीरे बच्चे की ओर बढ़ने लगा। नेवले ने जैसे ही नाग को देखा, वह तुरंत सतर्क हो गया। उसे अपने छोटे मित्र की चिंता हुई। बिना समय गँवाए वह साँप पर टूट पड़ा। दोनों के बीच भयंकर संघर्ष हुआ। नाग बार-बार वार करता रहा, लेकिन नेवला भी पूरी बहादुरी से लड़ता रहा। अंततः नेवले ने नाग के टुकड़े-टुकड़े कर दिए, हालांकि इस लड़ाई में उसका शरीर भी बुरी तरह घायल हो गया और वह खून से लथपथ हो गया।
साँप को मारने के बाद नेवला प्रसन्न मन से उस दिशा में दौड़ा जिधर ब्राह्मणी पानी भरने गई थी। उसे लगा कि ब्राह्मणी उसकी वीरता देखकर बहुत खुश होगी।


लेकिन जैसे ही ब्राह्मणी ने नेवले को खून से सना देखा, उसके मन में पुराना भय जाग उठा। उसने बिना कुछ सोचे समझे यह मान लिया कि नेवले ने उसके बच्चे को मार डाला है। क्रोध और दुख में अंधी होकर उसने सिर पर रखा पानी से भरा भारी घड़ा नेवले पर दे मारा। घड़े की चोट लगते ही बेचारा नेवला वहीं तड़पकर मर गया।


इसके बाद ब्राह्मणी घबराकर तुरंत वृक्ष के पास पहुँची। वहाँ जाकर उसने देखा कि उसका पुत्र तो शांतिपूर्वक सो रहा है और थोड़ी दूरी पर एक काले नाग का कटा हुआ शरीर पड़ा है। यह दृश्य देखकर उसे सारी सच्चाई समझ में आ गई। उसे एहसास हुआ कि नेवले ने उसके पुत्र की रक्षा के लिए अपने प्राण तक दाँव पर लगा दिए थे।


अब ब्राह्मणी पछतावे से भर उठी। वह रो-रोकर विलाप करने लगी। उसी समय देवशर्मा भी वापस लौट आया। पत्नी को रोते देखकर वह घबरा गया, लेकिन जब उसने बच्चे को सुरक्षित देखा तो उसकी जान में जान आई। तब ब्राह्मणी ने रोते हुए सारी घटना सुनाई और अपने पति से कहा कि यदि वह उसके कहे अनुसार वहीं रुककर बच्चे की देखभाल करता, तो शायद यह अनर्थ न होता।

नैतिक शिक्षा:
बिना पूरी सच्चाई जाने जल्दबाजी में लिया गया निर्णय अक्सर भारी पश्चाताप का कारण बनता है। इसलिए किसी भी परिस्थिति में सोच-समझकर ही कार्य करना चाहिए।

पंचतंत्र : मस्तक पर चक्र

एक नगर में चार ब्राह्मण पुत्र रहते थे। चारों आपस में अत्यंत घनिष्ठ मित्र थे। वे सभी बहुत निर्धन थे और अपनी गरीबी से अत्यंत दुखी रहते थे। उन्होंने अनुभव किया था कि निर्धन व्यक्ति को समाज में सम्मान नहीं मिलता। रिश्तेदार भी उससे दूरी बना लेते हैं, परिवार तक उसका आदर नहीं करता। बिना धन के न सुख मिलता है और न यश।
चारों मित्रों ने विचार किया कि इस प्रकार अपमान भरा जीवन जीने से अच्छा है कि कहीं दूर जाकर धन कमाया जाए। यही सोचकर वे अपने नगर और परिवार को छोड़कर विदेश यात्रा पर निकल पड़े।
यात्रा करते-करते वे क्षिप्रा नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने स्नान किया और महाकाल के दर्शन कर आगे बढ़े। कुछ दूरी पर उन्हें जटाधारी योगी दिखाई दिए। उनका नाम भैरवानंद था।


योगी ने उन्हें अपने आश्रम में बुलाया और यात्रा का उद्देश्य पूछा। चारों युवकों ने कहा, “हम धन प्राप्त करने के लिए निकले हैं। या तो धन लेकर लौटेंगे या फिर प्राण त्याग देंगे। निर्धन जीवन से मृत्यु बेहतर है।”
योगी ने उनकी दृढ़ता की परीक्षा लेते हुए कहा, “धन प्राप्ति तो भाग्य के अधीन होती है।”
इस पर युवकों ने उत्तर दिया, “भाग्य का अपना स्थान है, परंतु साहसी मनुष्य अपने परिश्रम और पुरुषार्थ से भाग्य भी बदल सकता है। इसलिए कृपया हमारा मार्गदर्शन करें।”

उनकी बातों से प्रसन्न होकर योगी ने उन्हें चार दीपक दिए और कहा, “तुम लोग हिमालय की ओर जाओ। चलते समय जिस व्यक्ति के हाथ से दीपक गिर जाए, वहीं भूमि खोदना। तुम्हें धन प्राप्त होगा।”
चारों मित्र दीपक लेकर चल पड़े। कुछ दूर जाने पर पहले युवक के हाथ से दीपक गिर पड़ा। उन्होंने वहाँ खुदाई की तो ताँबे की खान निकली।


पहला युवक बोला, “इतना ताँबा ही हमारे लिए बहुत है। इससे हमारी गरीबी दूर हो जाएगी।”
लेकिन बाकी तीनों ने कहा, “ताँबा कोई बड़ी संपत्ति नहीं। आगे इससे भी अधिक मूल्यवान वस्तु मिलेगी।”
पहला युवक वहीं रुक गया और ताँबा लेकर वापस घर लौट आया।


बाकी तीन मित्र आगे बढ़ते रहे। कुछ दूर जाने पर दूसरे युवक का दीपक गिरा। जमीन खोदने पर चाँदी की खान मिली।
दूसरा युवक प्रसन्न होकर बोला, “अब हमें आगे जाने की आवश्यकता नहीं। चाँदी से हमारा जीवन सुखी हो जाएगा।”
किन्तु बाकी दोनों मित्र बोले, “पहले ताँबा मिला और अब चाँदी। निश्चित ही आगे सोना मिलेगा।”
दूसरा युवक भी चाँदी लेकर लौट गया और शेष दो मित्र आगे बढ़ गए।

कुछ दूरी पर तीसरे युवक के हाथ से दीपक गिरा। खुदाई करने पर वहाँ सोने की खान निकली।
तीसरा युवक खुशी से बोला, “अब तो हमारी सारी दरिद्रता समाप्त हो जाएगी। इससे अधिक मूल्यवान वस्तु क्या हो सकती है?”
लेकिन चौथा युवक बोला, “जब ताँबे के बाद चाँदी और चाँदी के बाद सोना मिला है, तो निश्चित ही आगे रत्नों की खान होगी। मैं आगे ही जाऊँगा।”


तीसरे युवक ने उसे बहुत समझाया, पर वह नहीं माना। अंततः तीसरा युवक सोना लेकर घर लौट गया और चौथा अकेला आगे बढ़ता रहा।
अब रास्ता अत्यंत कठिन हो गया। काँटों से उसके पैर घायल हो गए। बर्फीले पर्वतों पर चलते-चलते उसका शरीर थक गया, फिर भी धन के लोभ में वह लगातार आगे बढ़ता रहा।
बहुत दूर जाने पर उसने एक विचित्र व्यक्ति को देखा। उसका पूरा शरीर रक्त से लथपथ था और उसके मस्तक पर एक तेज़ घूमता हुआ चक्र लगा था।

युवक ने उसके पास जाकर पूछा, “तुम कौन हो? तुम्हारे सिर पर यह चक्र क्यों घूम रहा है? मुझे बहुत प्यास लगी है, क्या यहाँ कहीं पानी मिलेगा?”
जैसे ही उसने यह कहा, वह घूमता हुआ चक्र अचानक उस व्यक्ति के सिर से उतरकर ब्राह्मण युवक के मस्तक पर आ गया।
चक्र लगते ही युवक दर्द से कराह उठा। उसने घबराकर पूछा, “यह क्या हुआ? यह चक्र मेरे सिर पर क्यों आ गया?”
वह व्यक्ति बोला, “मेरे साथ भी यही हुआ था। अब यह चक्र तुम्हारे सिर पर तब तक घूमता रहेगा, जब तक कोई और लोभी मनुष्य यहाँ आकर तुमसे यही प्रश्न नहीं करेगा।”

युवक ने पूछा, “तुम यहाँ कब से हो?”
उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, “जब राजा राम का राज्य था, तब मैं धन के लोभ में यहाँ पहुँचा था। तब से यह चक्र मेरे सिर पर घूम रहा था।”

युवक ने आश्चर्य से पूछा, “इतने समय तक तुम बिना भोजन और जल के कैसे जीवित रहे?”
उस व्यक्ति ने कहा, “यह चक्र अत्यधिक लोभी मनुष्यों को दंड देने के लिए है। जिसके सिर पर यह लग जाता है, उसे भूख, प्यास, नींद या मृत्यु का भय नहीं रहता। केवल इस चक्र का असहनीय कष्ट जीवन भर सहना पड़ता है।”
इतना कहकर वह व्यक्ति वहाँ से चला गया और लालची ब्राह्मण युवक उसी पीड़ा को सहने के लिए वहीं रह गया।

नैतिक शिक्षा:
अत्यधिक लोभ मनुष्य के विनाश का कारण बनता है। संतोष ही सबसे बड़ा धन है।

पंचतंत्र : जब शेर जी उठा

किसी नगर में चार मित्र रहा करते थे। उनमें से तीन अत्यंत विद्वान और विज्ञान के ज्ञाता थे, लेकिन उनमें व्यावहारिक बुद्धि का अभाव था। चौथा मित्र अधिक पढ़ा-लिखा नहीं था, फिर भी वह बहुत समझदार और दूरदर्शी था। एक दिन चारों ने विचार किया कि केवल विद्या प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है, उसका लाभ तभी है जब उससे धन और सम्मान प्राप्त किया जाए। इसी उद्देश्य से उन्होंने विदेश जाकर धन कमाने का निश्चय किया और यात्रा पर निकल पड़े।

कुछ दूर चलने के बाद सबसे बड़े विद्वान मित्र ने कहा कि हम चारों में से एक व्यक्ति ऐसा है जिसके पास कोई विशेष विद्या नहीं है। वह केवल बुद्धिमान है, लेकिन धन प्राप्त करने और राजाओं को प्रसन्न करने के लिए विद्या आवश्यक होती है। हमारी विद्या ही हमें सम्मान और धन दिलाएगी, इसलिए जो व्यक्ति विद्या से रहित है, उसे हमारे द्वारा कमाए गए धन में कोई हिस्सा नहीं मिलना चाहिए। यह सुनकर दूसरे विद्वान ने भी उसकी बात का समर्थन किया।


लेकिन तीसरे विद्वान का हृदय कुछ उदार था। उसने कहा कि बचपन से हम चारों ने साथ जीवन बिताया है, सुख-दुःख में एक-दूसरे का साथ दिया है। इसलिए केवल विद्या के अभाव में अपने मित्र को छोड़ देना उचित नहीं है। सच्चे मित्रों में भेदभाव नहीं होता। उदार लोगों के लिए पूरा संसार ही परिवार के समान होता है। उसकी बात सुनकर बाकी दोनों भी मान गए और चारों मित्र साथ आगे बढ़ने लगे।


यात्रा करते-करते वे एक घने जंगल में पहुँचे। वहाँ उन्हें एक मरा हुआ शेर दिखाई दिया, जिसकी हड्डियाँ और शरीर के अंग इधर-उधर बिखरे पड़े थे। उस दृश्य को देखकर तीनों विद्वानों के मन में अपनी विद्या की शक्ति परखने का विचार आया। उन्होंने उत्साह से कहा कि यही सही अवसर है जब हम अपनी शिक्षा और विज्ञान का चमत्कार दिखा सकते हैं। यदि हम इस मृत शेर को पुनः जीवित कर दें, तो यह सिद्ध हो जाएगा कि हमारी विद्या कितनी महान है।

इसके बाद तीनों अपने-अपने कार्य में लग गए। पहले विद्वान ने शेर की बिखरी हुई हड्डियों को एकत्र कर सही ढंग से जोड़ दिया। दूसरे ने उसके शरीर पर मांस, चमड़ी और रक्त का निर्माण कर दिया। तीसरा अपनी विद्या के प्रभाव से उसमें प्राण डालने की तैयारी करने लगा। तभी चौथे बुद्धिमान मित्र ने उन्हें सावधान करते हुए कहा कि यह कार्य बहुत खतरनाक हो सकता है। उसने समझाया कि यदि शेर जीवित हो गया, तो वह स्वभाव से हिंसक होने के कारण सबसे पहले हम पर ही हमला करेगा और हमें मार डालेगा।


लेकिन विद्या के अभिमान में डूबे उन तीनों ने उसकी बात को महत्व नहीं दिया। उन्हें अपनी शक्ति और ज्ञान पर इतना घमंड था कि वे किसी की सलाह सुनने को तैयार नहीं थे। तब बुद्धिमान मित्र ने शांत स्वर में कहा कि यदि तुम लोग अपनी विद्या का प्रदर्शन करना ही चाहते हो, तो अवश्य करो, लेकिन पहले मुझे इस पेड़ पर चढ़ जाने दो ताकि मैं सुरक्षित रह सकूँ। इतना कहकर वह तुरंत पास के एक ऊँचे वृक्ष पर चढ़ गया।


कुछ ही क्षणों बाद तीसरे विद्वान ने अपनी विद्या से शेर के शरीर में प्राणों का संचार कर दिया। जैसे ही शेर जीवित हुआ, उसने चारों ओर देखा और तुरंत अपनी भूख मिटाने के लिए उन तीनों विद्वानों पर टूट पड़ा। देखते ही देखते उसने तीनों को मार डाला। पेड़ पर बैठा बुद्धिमान मित्र यह सब देखता रहा और उसकी जान बच गई।
इस प्रकार तीनों विद्वानों की विद्या उनके किसी काम न आई, क्योंकि उनमें व्यावहारिक बुद्धि और दूरदर्शिता का अभाव था। केवल शास्त्रों का ज्ञान होना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेने की समझ भी आवश्यक होती है।

नैतिक शिक्षा:
केवल ज्ञान और विद्या ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि बुद्धिमानी और व्यवहारिक समझ भी जीवन में उतनी ही आवश्यक है

अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो पंचतंत्र की अन्य ज्ञानवर्धक और नैतिक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।

पंचतंत्र भारत की प्राचीन और प्रसिद्ध नीति कथाओं का संग्रह है, जिन्हें आचार्य विष्णु शर्मा द्वारा रचित माना जाता है। इन कहानियों के माध्यम से बुद्धिमानी, मित्रता, नीति, व्यवहार और जीवन की महत्वपूर्ण सीख सरल और रोचक तरीके से दी जाती है। आज भी पंचतंत्र की कथाएँ बच्चों और बड़ों दोनों के बीच समान रूप से लोकप्रिय हैं क्योंकि हर कहानी अपने भीतर एक गहरी नैतिक शिक्षा छुपाए होती है।

 लेखक / मूल रचनाकार: आचार्य विष्णु शर्मा
 प्रस्तुति: Saying Central Team

आपको यह कहानी पसंद आई?

इसे रेट करने के लिए किसी स्टार पर क्लिक करें!

औसत श्रेणी 0 / 5. मतों की गिनती: 0

अभी तक कोई वोट नहीं! इस पोस्ट को रेटिंग देने वाले पहले व्यक्ति बनें।

Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

QUOTE OF THE DAY

RECENT STORIES

SHORT STORIES

FEATURED STORIES

CATEGORIES