पंचतंत्र की कहानी : शेर और बैल
बहुत समय पहले गंगा नदी के किनारे फैले एक विशाल और घने जंगल में पिंगलक नाम का एक शक्तिशाली शेर रहता था। पूरे जंगल में उसका राज चलता था। सभी जानवर उससे डरते भी थे और उसका सम्मान भी करते थे। उसके दरबार में दमनक और करटक नाम के दो सियार रहते थे, जो अपनी चालाकी और चतुराई के लिए जाने जाते थे।
एक वर्ष भीषण गर्मी पड़ी। उसी समय संजीवक नाम का एक मजबूत और स्वस्थ बैल रास्ता भटकते हुए उस जंगल तक पहुँच गया। वह पहले एक किसान के पास रहता था, लेकिन बीमारी की हालत में किसान उसे जंगल के पास छोड़कर चला गया था। कुछ दिनों तक नदी किनारे ठंडी हवा, हरी घास और आराम मिलने से संजीवक पूरी तरह स्वस्थ हो गया। अब वह पहले से भी ज्यादा ताकतवर दिखाई देता था।
एक दिन संजीवक जोर से गर्जना जैसी आवाज़ निकाल रहा था। उसी समय पिंगलक नदी पर पानी पीने आया। जैसे ही उसके कानों में वह भारी आवाज़ पहुँची, वह चौंक गया। उसने पहले कभी ऐसी ध्वनि नहीं सुनी थी। उसके मन में भय पैदा हो गया कि शायद जंगल में उससे भी अधिक शक्तिशाली कोई जीव आ गया है। डर के कारण वह नदी से दूर हट गया और कई दिनों तक उधर जाने की हिम्मत नहीं कर पाया।
दमनक ने शेर की बेचैनी को समझ लिया। उसने अवसर देखते हुए कहा, “महाराज, यदि अनुमति दें तो मैं पता लगाकर आता हूँ कि यह आवाज़ किस जीव की है।”
शेर ने अनुमति दे दी। दमनक जंगल में गया और उसकी मुलाकात संजीवक से हुई। बातचीत करने पर उसे समझ आ गया कि वह कोई खतरनाक जीव नहीं बल्कि एक सीधा-सादा बैल है। दमनक ने तुरंत उसके साथ मित्रता कर ली और मन ही मन एक नई योजना सोचने लगा।
वह वापस शेर के पास पहुँचा और बोला, “महाराज, वह कोई साधारण जीव नहीं है। उसका नाम संजीवक है। वह अत्यंत बुद्धिमान और शक्तिशाली है, लेकिन वह आपकी सेवा करना चाहता है।”
यह सुनकर पिंगलक का डर दूर हो गया। उसने संजीवक को अपने दरबार में बुलवाया। धीरे-धीरे दोनों के बीच अच्छी मित्रता हो गई। शेर को संजीवक की समझदारी और शांत स्वभाव बहुत पसंद आने लगा। समय बीतने के साथ संजीवक शेर का सबसे प्रिय साथी बन गया। अब शेर हर महत्वपूर्ण बात में उसी की राय लेने लगा।
दमनक और करटक यह सब देखकर भीतर ही भीतर जलने लगे। उन्हें लगने लगा कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो दरबार में उनका महत्व समाप्त हो जाएगा। दोनों ने मिलकर शेर और बैल की मित्रता तोड़ने की योजना बनाई।
एक दिन दमनक अकेले शेर के पास पहुँचा और धीरे से बोला, “महाराज, संजीवक अब पहले जैसा विनम्र नहीं रहा। वह सोचता है कि अब वह इतना शक्तिशाली हो गया है कि आपके सिंहासन पर अधिकार कर सकता है।”
यह सुनते ही शेर के मन में संदेह भर गया।
इसके बाद दमनक संजीवक के पास गया और बोला, “तुम्हें सावधान रहना चाहिए। शेर अब तुम पर भरोसा नहीं करता। उसे डर है कि तुम अधिक शक्तिशाली हो रहे हो। इसलिए वह तुम्हें मारने की योजना बना रहा है।”
अब संजीवक भी चिंता और भय से भर गया। दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास पैदा हो चुका था।
कुछ समय बाद जब दोनों आमने-सामने आए तो उनके मन में पहले जैसी मित्रता नहीं थी। शक और क्रोध ने जगह ले ली थी। देखते ही देखते दोनों के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया।
संजीवक ने पूरी बहादुरी से मुकाबला किया, लेकिन अंत में वह शेर की ताकत के सामने टिक नहीं सका। युद्ध में उसकी मृत्यु हो गई।
लड़ाई समाप्त होने के बाद पिंगलक को धीरे-धीरे सच्चाई समझ आने लगी। उसे एहसास हुआ कि उसके अपने ही मंत्रियों ने झूठ और छल से उसकी मित्रता को नष्ट कर दिया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसका प्रिय मित्र हमेशा के लिए उससे दूर जा चुका था।
नैतिक शिक्षा — धूर्त और स्वार्थी लोगों की बातों में आकर सच्चे रिश्तों पर संदेह नहीं करना चाहिए, क्योंकि झूठ और ईर्ष्या सबसे मजबूत मित्रता को भी तोड़ सकते हैं।
2. बन्दर और लकड़ी का खूंटा
बहुत समय पहले एक नगर के बाहर एक भव्य मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था। वहाँ अनेक कारीगर और मज़दूर दिन-रात मेहनत कर रहे थे। मंदिर में लकड़ी का काम अधिक होने के कारण बड़े-बड़े लट्ठों को चीरने का कार्य लगातार चलता रहता था। जगह-जगह आधे कटे हुए शहतीर और लकड़ियाँ पड़ी रहती थीं।
दोपहर होने पर सभी मज़दूर भोजन करने नगर की ओर चले जाते थे। जाते समय वे अपने अधूरे काम को उसी अवस्था में छोड़ देते थे। एक दिन एक बड़ा लट्ठा आधा चिरा हुआ रह गया। उसके बीच में मजदूरों ने एक मजबूत लकड़ी का खूंटा फँसा दिया, ताकि बाद में आरी आसानी से दोबारा चलाई जा सके।
मज़दूरों के जाते ही बंदरों का एक झुंड वहाँ आ पहुँचा। सभी बंदर इधर-उधर कूदने और खेलने लगे। उनमें एक बहुत शरारती बंदर भी था। उसे हर चीज़ में दखल देने और बेवजह छेड़छाड़ करने की आदत थी।
बंदरों के सरदार ने सबको चेतावनी दी, “यह मनुष्यों का कार्यस्थल है। यहाँ रखी वस्तुओं को हाथ मत लगाना।”
सभी बंदर पेड़ों की ओर चले गए, लेकिन वह शरारती बंदर चुपके से वहीं रुक गया। उसकी नज़र आधे चिरे हुए लट्ठे पर पड़ी। वह उत्सुकता से उसके ऊपर चढ़ गया और बीच में फँसे खूंटे को देखने लगा।
पास ही एक आरी रखी थी। उसने उसे उठाकर लकड़ी पर रगड़ना शुरू किया। आरी से “किर्र-किर्र” की आवाज़ आने लगी। बंदर को वह आवाज़ बिल्कुल पसंद नहीं आई। उसने गुस्से में आरी पटक दी और फिर खूंटे को निकालने में लग गया।
अब उसके मन में जिज्ञासा जागी कि यदि इस खूंटे को बाहर निकाल दिया जाए तो क्या होगा। वह दोनों हाथों से खूंटे को पकड़कर पूरी ताकत से खींचने लगा। धीरे-धीरे खूंटा हिलने लगा। यह देखकर बंदर और उत्साहित हो गया।
वह ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ें निकालते हुए खूंटे को बाहर खींचने लगा। उसे यह ध्यान ही नहीं रहा कि उसकी पूँछ लट्ठे के दो फटे भागों के बीच आ गई है।
अचानक उसने पूरी शक्ति लगाकर खूंटे को बाहर खींच लिया।
जैसे ही खूंटा निकला, लकड़ी के दोनों भाग तेज़ी से आपस में बंद हो गए और उसकी पूँछ बीच में बुरी तरह फँस गई।
बंदर दर्द से चीख उठा।
उसी समय मजदूर वापस लौट आए। उन्हें देखकर बंदर घबरा गया। जान बचाने के लिए उसने पूरी ताकत से छलांग लगाई। झटके से उसकी पूँछ टूट गई और वह दर्द से चिल्लाता हुआ जंगल की ओर भाग गया।
यह कहानी सुनाकर करटक बोला, “इसीलिए बिना कारण किसी काम में दखल नहीं देना चाहिए। व्यर्थ की छेड़छाड़ कभी-कभी भारी नुकसान पहुँचा देती है।”
लेकिन दमनक बोला, “केवल डरकर बैठे रहना भी उचित नहीं। बुद्धिमान व्यक्ति अवसर पहचानकर अपनी योग्यता सिद्ध करता है।”
इसके बाद दोनों के बीच राजा पिंगलक की सेवा, राजनीति, बुद्धिमानी और अवसर को लेकर लंबी चर्चा हुई। दमनक ने निश्चय किया कि वह सिंह के भय का कारण जानकर फिर से उसका विश्वास प्राप्त करेगा।
अंततः वह पिंगलक के पास पहुँचा। बातचीत के दौरान उसे पता चला कि सिंह किसी भयानक गर्जना से भयभीत है और जंगल छोड़ने का विचार कर रहा है।
दमनक ने समझाया, “महाराज, केवल आवाज़ सुनकर भयभीत होना उचित नहीं। पहले उसके कारण का पता लगाना चाहिए।”
और फिर उसने सिंह का डर दूर करने के लिए आगे की योजना बनानी शुरू की।
नैतिक शिक्षा — बिना समझे किसी काम में हस्तक्षेप करना नुकसान का कारण बन सकता है, जबकि बुद्धिमानी सही समय पर सही निर्णय लेने में है।
3. सियार और ढोल
बहुत समय पहले किसी जंगल के पास दो राजाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ। कई दिनों तक लड़ाई चलती रही। अंत में एक राजा विजयी हुआ और दूसरा पराजित होकर लौट गया। युद्ध समाप्त होने के बाद दोनों सेनाएँ अपने-अपने नगर वापस चली गईं। लेकिन युद्धभूमि में एक बड़ा ढोल छूट गया।
सेना के साथ रहने वाले भांड और चारण उसी ढोल को बजाकर वीरों की कथाएँ सुनाया करते थे। अब वह ढोल सुनसान जंगल के किनारे अकेला पड़ा था।
कुछ दिनों बाद एक तेज आंधी आई। आंधी के कारण वह ढोल लुढ़कता हुआ एक सूखे पेड़ के नीचे जाकर अटक गया। पेड़ की सूखी टहनियाँ ढोल से सट गईं। जब भी हवा चलती, वे टहनियाँ ढोल से टकरातीं और “ढम-ढम” की गूँजती हुई आवाज़ निकलती।
उसी जंगल में एक सियार घूमता था। एक दिन उसने वह अजीब आवाज़ सुनी। इतनी भारी और डरावनी ध्वनि उसने पहले कभी नहीं सुनी थी। वह भयभीत हो गया और दूर झाड़ियों में छिपकर देखने लगा कि आखिर यह कौन-सा जीव है जो इतनी जोरदार आवाज़ निकालता है।
कई दिनों तक वह दूर से ढोल को देखता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह जीव उड़ता है, दौड़ता है या पेड़ पर चढ़ता है।
एक दिन वह झाड़ी के पीछे छिपा हुआ था कि तभी एक गिलहरी पेड़ से उतरकर सीधे ढोल पर कूद गई। ढोल से हल्की “ढम” की आवाज़ निकली, लेकिन गिलहरी आराम से बैठकर दाने खाने लगी।
यह देखकर सियार ने राहत की साँस ली और बोला, “अच्छा! इसका मतलब यह कोई खतरनाक जीव नहीं है।”
अब वह धीरे-धीरे सावधानी से ढोल के पास पहुँचा। उसने उसे सूँघा, इधर-उधर देखा, लेकिन न कोई सिर दिखाई दिया और न पैर।
तभी अचानक हवा चली। पेड़ की टहनियाँ ढोल से टकराईं और फिर जोरदार “ढम-ढम” की आवाज़ गूँज उठी। सियार डरकर पीछे उछल पड़ा।
कुछ देर बाद उसने खुद को संभाला और सोचने लगा, “अब मैं समझ गया। यह केवल बाहरी खोल है। असली जीव इसके अंदर छिपा बैठा है। इतनी भारी आवाज़ से लगता है कि वह बहुत मोटा और तगड़ा होगा।”
यह सोचकर वह अपनी मांद में पहुँचा और उत्साहित होकर अपनी पत्नी से बोला, “आज मैंने बहुत बड़े शिकार का पता लगाया है। तैयार हो जाओ, आज दावत होगी।”
सियारिन ने पूछा, “तो उसे पकड़कर साथ क्यों नहीं लाए?”
सियार बोला, “मैं मूर्ख नहीं हूँ। वह एक खोल के अंदर छिपा है। अगर मैं अकेले पकड़ने जाता तो वह दूसरी तरफ से भाग जाता।”
रात होने पर दोनों ढोल के पास पहुँचे। तभी हवा चली और ढोल फिर गूँज उठा।
सियार धीरे से बोला, “सुनो इसकी आवाज़! सोचो अंदर बैठा जीव कितना मोटा होगा।”
दोनों ढोल के दोनों ओर बैठ गए और उसकी चमड़ी को दाँतों से काटने लगे। काफी मेहनत के बाद जब छेद बन गया तो सियार बोला, “सावधान! जैसे ही मैं कहूँ, दोनों एक साथ हाथ अंदर डालकर शिकार पकड़ लेना।”
दोनों ने एक साथ हाथ अंदर डाले और भीतर टटोलने लगे।
लेकिन अंदर कुछ भी नहीं था।
अंधेरे में दोनों के हाथ एक-दूसरे के हाथों से टकराए। वे चौंककर चिल्लाए, “अरे! यहाँ तो कुछ भी नहीं है!”
तब उन्हें अपनी मूर्खता का एहसास हुआ। वे निराश होकर सिर पकड़कर बैठ गए।
नैतिक शिक्षा — केवल आवाज़ या बाहरी दिखावे से किसी वस्तु का अनुमान नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि कई बार जो डरावना दिखाई देता है, वह भीतर से बिल्कुल खाली होता है।

4. सियार और ढोल
बहुत समय पहले एक घने जंगल के पास दो शक्तिशाली राजाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ। कई दिनों तक युद्ध चलता रहा। रणभूमि में सैनिकों की आवाज़ें, घोड़ों की टापें और हथियारों की टकराहट गूंजती रही। अंत में एक राजा विजयी हुआ और दूसरा हार गया। युद्ध समाप्त होने के बाद दोनों सेनाएँ अपने-अपने नगर लौट गईं। लेकिन युद्धभूमि में सेना का एक बड़ा ढोल छूट गया।
यह वही ढोल था जिसे सेना के साथ रहने वाले भांड और चारण बजाया करते थे। रात के समय वे इसी ढोल की थाप पर वीर योद्धाओं की बहादुरी की कहानियाँ सुनाते थे। अब वह ढोल सुनसान स्थान पर अकेला पड़ा था।
कुछ दिनों बाद एक भयंकर आंधी आई। तेज़ हवाओं के कारण वह ढोल लुढ़कता हुआ एक सूखे पेड़ के नीचे जाकर अटक गया। पेड़ की सूखी टहनियाँ ढोल से इस प्रकार सट गईं कि हवा चलने पर वे ढोल से टकरातीं और “ढमाढम-ढमाढम” की गहरी आवाज़ निकलती।
उसी जंगल में एक सियार घूमता था। एक दिन उसने वह अजीब और डरावनी आवाज़ सुनी। वह घबरा गया। उसने पहले कभी ऐसी आवाज़ किसी जानवर की नहीं सुनी थी। डर के कारण वह दूर झाड़ियों में छिप गया और सोचने लगा, “यह कौन-सा जीव है जिसकी आवाज़ इतनी भारी और भयानक है?”
अब वह रोज़ दूर से छिपकर ढोल को देखने लगा। वह समझना चाहता था कि यह जीव उड़ता है, दौड़ता है या किसी और प्रकार चलता है।
एक दिन वह झाड़ी के पीछे छिपा हुआ ढोल को देख रहा था। तभी एक गिलहरी पेड़ से उतरकर सीधे ढोल पर कूद गई। ढोल से हल्की “ढम” की आवाज़ निकली, लेकिन गिलहरी आराम से उस पर बैठकर दाने कुतरने लगी।
यह देखकर सियार थोड़ा निडर हुआ। उसने मन ही मन कहा, “अच्छा, तो यह कोई हिंसक जीव नहीं है। अगर ऐसा होता तो गिलहरी इसके पास कैसे बैठती?”
अब वह बहुत सावधानी से ढोल के पास पहुँचा। उसने उसे सूँघा। चारों ओर घूम-घूमकर देखने लगा, लेकिन उसे न कोई सिर दिखाई दिया, न पैर, न आँखें।
तभी अचानक हवा का तेज झोंका आया। सूखी टहनियाँ ढोल से टकराईं और फिर वही जोरदार “ढमाढम” की आवाज़ गूँज उठी।
आवाज़ सुनते ही सियार डरकर पीछे उछल पड़ा। कुछ देर बाद उसने खुद को संभाला और सोचने लगा, “अब समझ आया। यह तो केवल बाहर का खोल है। असली जीव इसके अंदर छिपा बैठा है। आवाज़ इतनी भारी है, इसका मतलब अंदर बैठा जीव बहुत मोटा-ताज़ा होगा।”
यह सोचकर वह खुशी-खुशी अपनी मांद में पहुँचा और अपनी पत्नी से बोला, “सुनो! आज मैं एक शानदार शिकार का पता लगाकर आया हूँ। आज दावत होगी।”
सियारिन ने उत्सुकता से पूछा, “अगर शिकार इतना अच्छा है तो उसे पकड़कर साथ क्यों नहीं लाए?”
सियार ने गर्व से कहा, “मैं मूर्ख नहीं हूँ। वह एक मजबूत खोल के भीतर छिपा बैठा है। उसके दोनों ओर चमड़ी जैसे दरवाज़े हैं। अगर मैं अकेले हाथ डालता तो वह दूसरी ओर से भाग जाता।”
रात को चाँद निकलने पर दोनों ढोल के पास पहुँचे। जैसे ही वे पास आए, हवा चली और टहनियाँ ढोल से टकराईं। फिर वही गहरी “ढमाढम” की आवाज़ निकली।
सियार धीरे से बोला, “सुनो इसकी आवाज़! सोचो, जिसकी आवाज़ इतनी भारी है, वह खुद कितना मोटा और स्वादिष्ट होगा।”
दोनों ढोल के दोनों ओर बैठ गए और अपने तेज दाँतों से ढोल की चमड़ी काटने लगे। काफी देर की मेहनत के बाद चमड़ी फटने लगी।
तब सियार बोला, “सावधान रहना। जैसे ही छेद बड़ा हो, हम दोनों एक साथ हाथ डालकर शिकार को पकड़ लेंगे।”
दोनों ने एक साथ “हूँ!” की आवाज़ की और अपने हाथ ढोल के अंदर डाल दिए। वे अंदर टटोलने लगे, लेकिन भीतर कुछ भी नहीं था।
अंधेरे में दोनों के हाथ एक-दूसरे के हाथों से टकरा गए।
दोनों एक साथ चिल्लाए, “अरे! यहाँ तो कुछ भी नहीं है!”
अब उन्हें समझ आया कि वे केवल आवाज़ से धोखा खा गए थे। अंदर कोई जीव नहीं था। ढोल पूरी तरह खाली था।
दोनों शर्मिंदा होकर अपना माथा पीटने लगे और उदास होकर वहाँ से लौट गए।
नैतिक शिक्षा — केवल आवाज़, दिखावे या अफवाहों से किसी वस्तु का अनुमान नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि कई बार बाहर से डरावनी दिखने वाली चीज़ अंदर से बिल्कुल खाली होती है।
📖 अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो पंचतंत्र की अन्य ज्ञानवर्धक और नैतिक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।
पंचतंत्र भारत की प्राचीन और प्रसिद्ध नीति कथाओं का संग्रह है, जिन्हें आचार्य विष्णु शर्मा द्वारा रचित माना जाता है। इन कहानियों के माध्यम से बुद्धिमानी, मित्रता, नीति, व्यवहार और जीवन की महत्वपूर्ण सीख सरल और रोचक तरीके से दी जाती है। आज भी पंचतंत्र की कथाएँ बच्चों और बड़ों दोनों के बीच समान रूप से लोकप्रिय हैं क्योंकि हर कहानी अपने भीतर एक गहरी नैतिक शिक्षा छुपाए होती है।
✍️ लेखक / मूल रचनाकार: आचार्य विष्णु शर्मा
📖 प्रस्तुति: Saying Central Team






1 thought on “पंचतंत्र की प्रमुख कहानी: शेर और बैल”